RELIGION WORLD — THE INDEPENDENT SCIENTIFIC & INTERFAITH JOURNAL
Navigation

© 2026 Religion World Foundation.

Global Faith • Scientific Heritage • Human Ethics

अधिकमास का आध्यात्मिक महत्व 

अधिकमास का आध्यात्मिक महत्व 

अधिकमास का आध्यात्मिक महत्व 
Visual Archive

अधिकमास का आध्यात्मिक महत्व 

अधिकमास का महत्व 

ऋषिकेश, 18 सितम्बर। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी हिंदू धर्म में अधिकमास का आध्यात्मिक महत्व है। इसे मलमास भी कहा जाता है। यह महीना पूर्ण रूप से भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस वर्ष अधिकमास को कई मामलों में काफी शुभ माना गया है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर्ष 2020 का अधिकमास बहुत ही शुभ सुयोग लेकर आया है। 160 वर्षो के पश्चात यह शुभ अवसर आया है। इसके बाद ऐसा संयोग साल 2039 में बनने वाला है। अधिकमास 18 सितंबर 2020 से आरंभ हो रहा है और 16 अक्टूबर 2020 को समाप्त होगा।

अधिकमास का वैज्ञानिक महत्व

अधिकमास तीन वर्ष में एक बार आता है इसका वैज्ञानिक आधार सूर्य और चंद्रमा की चाल से है। सूर्य वर्ष 365 दिन और 6 घंटे का माना जाता है, वहीं. चंद्रमा वर्ष 354 दिन का माना जाता है। इन दोनों वर्षों के बीच 11 दिन का अंतर होता है। यह अंतर 3 साल में 33 दिन अर्थात लगभग एक माह होता है। उसी अंतर के कारण तीन साल में एक बार चंद्रमास आता है।

दूसरे शब्दों में कहा जाये तो यह एक खगोलशास्त्रीय तथ्य है, सूर्य 30.44 दिन में एक राशि को पार कर लेता है और यही सूर्य का सौर महीना है। ऐसे बारह महीनों का समय जो 365.25 दिन का है, एक सौर वर्ष कहलाता है।

अधिकमास खगोलशास्त्रीय घटना – स्वामी चिदानन्द सरस्वती

चंद्रमा का महीना 29.53 दिनों का होता है जिससे चंद्र वर्ष में 354.36 दिन ही होते हैं। यह अंतर 32.5 माह के बाद यह एक चंद्र माह के बराबर हो जाता है। इस समय को समायोजित करने के लिए हर तीसरे वर्ष एक अधिक मास होता है।

purushottam maas

एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या के बीच कम से कम एक बार सूर्य की संक्रांति होती है। यह प्राकृतिक नियम भी है। जब दो अमावस्या के बीच कोई संक्रांति नहीं होती तो वह माह बढ़ा हुआ या अधिक मास होता है। संक्रांति वाला माह शुद्ध माह तथा संक्रांति रहित माह अधिक माह और दो अमावस्या के बीच दो संक्रांति हो जायें तो क्षय माह होता है। क्षय मास कभी कभी होता है। हमारे शास्त्रों में उल्लेख है कि अधिकमास में श्रद्धा के साथ किये गये धार्मिक अनुष्ठान पुण्यफल देने वाले होते है।

अधिकमास का भगवान विष्णु से संबंध 

हिन्दु धर्म शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु हैं और पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है इसलिए अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

फोटो - दैनिक भास्कर
फोटो – दैनिक भास्कर

पुराणों में इस मास को लेकर कई धार्मिक रोचक कथाएं भी दी गई है. कहा जाता है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए. चूंकि अधिकमास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ और इसके अधिपति भगवान विष्णु जी है इसलिये इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास का महीना धार्मिक अनुष्ठान के लिये अत्यंत माना गया है परन्तु अन्य शुभ कार्य नहीं किये जाते।

@religionworldin

[video_ads]

[video_ads2]

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

Religion World provides information on all religions and presents it impartially. You can send us information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com. You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.

September 18, 2020 3 min read
Share: