क्यों पटाखे और अनार है सेहत के दुश्मन : बारूद से खतरनाक होती दीपावली
दीपावली का शाब्दिक अर्थ है दीपों की कतार. सामान्य रूप से हम कह सकते हैं की दीपावली यानि रोशनी का त्यौहार. लेकिन इस रोशनी के त्यौहार को हम सभी ने शोर शराबे और धुदम घोटने वाला त्यौहार बनाकर रख दिया है. मैंने हम सभी इसलिए कहा क्योंकि पर्यावरण को दूषित करने में कहीं न कहीं आप और हम सभी ज़िम्मेदार है. रिलिजन वर्ल्ड द्वारा नो टू क्रैकर्स की मुहिम चलायी गयी है. हम आशा करते हैं कि आप सभी इसमें हमारा सहयोग करेंगे. लेकिन इस मुहीम चलने के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है… वो है पटाखों से फैलने वाला ज़हर… जी हां… आज हम आपको पटाखों में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की जानकारी देंगे. जिसे जानने के बाद आप पटाखे जलाना बंद कर देंगे.
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कैसे बनते हैं पटाखे
दिल्ली और एनसीआर में दिवाली पर पटाखे नहीं बिकेंगे. ये बैन 1 नवंबर 2017 तक बरकरार रहेगा. दिवाली पर पटाखों से निकलने वाली रोशनी और पटाखों की तेज़ आवाज़ से आप बड़े खुश होते होंगे. लेकिन क्या आपको पता है ये किस प्रकार के खतरनाक रसायनों से मिलकर बनता है.
बारूद 3 रसायनों के मिश्रण से बनता है. जब गंधक, शोरा और लकड़ी के कोयले के चूरे को आपस में मिलाया जाता है तो बारूद बनता है. बारूद बनाने के लिए सब से आवश्यक रसायन है शोरा. अंगरेजी में शोरा को ‘साल्ट पीटर’ कहते हैं. वैज्ञानिक शोरा को ‘पोटैशियम नाइट्रेट’ कहते हैं. वैसे शोरा शब्द फारसी भाषा का है. जनसाधारण में शोरे को क्षार कहा जाता है. शोरा एक प्रकार से नमक का खार होता है, जिसे मिट्टी से प्राप्त किया जाता है. आजकल शोरा सोडियम नाइट्रेट और पोटैशियम क्लोराइड से बनाया जाता है.
वैज्ञानिकों ने परीक्षणों से ज्ञात किया है कि कोई भी वस्तु ऑक्सीजन के बिना नहीं जल सकती, लेकिन बारूद ऑक्सीजन के बिना जलता है. कुछ वस्तुएं ऐसी भी होती हैं जो जलने के लिए स्वयं ऑक्सीजन उत्पन्न करती हैं. बारूद भी ऐसी ही वस्तु है. इस में मिलाए गए गंधक और कोयले के चूरे को जलाने के लिए ऑक्सीजन शोरे से मिलती है. ऐसी स्थिति में बारूद को जलाने के लिए वायुमंडल की ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती.
बारूद का आविष्कारक यूरोप कहा जाता है, लेकिन वास्तव में बारूद का आविष्कार चीन में हुआ था. प्राचीन काल में चीन में कीमियागार पारसमणि की गोलियां बनाने के लिए दिनरात रासायनिक प्रयोग किया करते थे. कई हजार वर्ष पहले कीमियागरों के प्रयोग से बारूद का जन्म हुआ. किसी कीमियागर ने शोरे, गंधक और लकड़ी के कोयले के चूरे को मिलाया तो अचानक विस्फोट हुआ और बारूद का आविष्कार हो गया.
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चीन के एक चिकित्सक सुन सिम्याओ की 618 में लिखी एक पुस्तक से बारूद की जानकारी मिलती है. उस समय चीन में बारूद को ‘हुओयाओ’ कहा जाता था. एक हजार ईस्वी में बारूद को हथगोलों और रौकेटों में इस्तेमाल किया जाने लगा था. ईसा की 11वीं सदी में चीन में रौकेट बनने लगे थे. रौकेटों को चीनी भाषा में ‘हुओ छिंएग’ कहा जाता था.
कुछ वर्ष बाद लोहे की नलियों में बारूद भर कर हथियार बनाए जाने लगे. लोहे की तोपें भी बारूद से बनने लगीं. मंगोल योद्धाओं के माध्यम से बारूद की जानकारी 13वीं सदी में यूरोप में पहुंची. भारत में भी बाबर तोपों के साथ आया था.
आसमान में फूटने वाले पटाखे भी हानिकारक होते हैं यह आपको यह लेख पढ़कर समझ आ जायेगा. आपने देखा होगा जब कोई रॉकेट आसमान पर जा के फूटता है तो कई प्रकार के रंग छोड़ता है. इनमें रोशनी डालने के लिए भी खास तरह के रसायनों का प्रयोग किया जाता है. अलग-अलग रसायनों के हिसाब से ही पटाखों के रंगों की रोशनी तय होती है.
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आइये आपको बताते हैं कि किस रंग में कौन सा रसायन पड़ता है..
हरे रंग के लिए बोरियम नाइट्रेट

पटाखे में ग्रीन रोशनी निकालने के लिए बेरियम नाइट्रेट का इस्तेमाल होता है. ये विस्फोटक पदार्थ का भी काम करता है. बारूद में मिश्रण होने पर ये रंग बदलता है. हरे रंग में बदलने से जब पटाखे को आग लगाई जाती है तो उसमें से हरे रंग की ही रोशनी निकलती है. इसका इस्तेमाल ज्यादातर आतिशबाजी में किया जाता है.
लाल रंग के लिए सीजियम नाइट्रेट

पटाखे से लाल रंग की रोशनी निकालने के लिए उसमें सीजियम नाइट्रेट डाला जाता है. इस रसायन को बारूद के साथ मिलाने पर इसका रंग लाल पड़ जाता है. इसके बाद मिश्रण को ठोस बनाकर पटाखे में भरा जाता है. आग लगाने पर इसमें से लाल रंग की रोशनी बाहर आती है. इसका प्रयोग ज्यादातर अनार और रॉकेट में किया जाता है. जिसमें से ज्यादा रोशनी निकलती है.
पीले रंग के लिए सोडियम नाइट्रेट

पटाखों के बारूद के साथ इसे मिलाकर एक ठोस पदार्थ तैयार किया जाता है. इसमें नाइट्रेट की मात्रा बढ़ाई जाती है. इससे इसका रंग और भी गाढ़ा पीला हो जाता है. यही कारण है कि आग लगाने के बाद ये पीले रंग की रोशनी छोड़ता है. इसका इस्तेमाल अमूमन हर पटाखे में होता है. जमीं पर घूमने वाली चकरी में इसका यूज़ अधिक होता है.
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अनार को कैसे बनाते हैं आकर्षक

पटाखों के धुएं में लगभग 75 फीसद पोटेशियम नाइट्रेट, दस फीसद सल्फर तथा 15 फीसद तक कार्बन की मात्रा होती है. पटाखों में कॉपर, बैडमियम लेड, नाइट्रेट, जिंक नाइट्रेट, मैग्निशयम,सोडियम, चारकोल, सल्फर, एल्यूमीनियम परकलोरेट, बेरियम नाइट्रेट तथा काला पाउडर जैसे रसायनों का भी इस्तेमाल होता है. इनका ज्यादातर इस्तेमाल अलग-अलग अनार में होता है. अनार को आकर्षक बनाने के लिए ये किया जाता है.
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Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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