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धनतेरस के पीछे की क्या है पौराणिक कथा

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धनतेरस के पीछे की क्या है पौराणिक कथा

धनतेरस के पीछे की क्या है पौराणिक कथा

धनतेरस’ शब्द को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है. हिंदी में धन का अर्थ होता है धन और शब्द ‘तेरा’ का अर्थ है तेरह. इस प्रकार धनतेरस के दिन, हिन्दू देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती हैं, जो धन की देवी हैं. धनतेरस से हिंदू लोग दिवाली के बेहद लोकप्रिय त्योहार की शुरूआत करते हैं. हिंदू कैलेंडर के अनुसार दिवाली की शुरुआत के रूप में चिह्नित होने के अलावा, धनतेरस कार्तिक महीने का तेरहवें दिन भी होता है. धनतेरस देश भर में हिंदू परिवारों और दुनिया के लिए एक शुभ अवसर होता है.

यह भी पढ़ें-दीपोत्सव का महापर्व : आचार्य चन्दना जी, वीरायतन परिवार

क्या है पौराणिक कथा

एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे, लक्ष्मी जी ने भी साथ चलने का आग्रह किया. विष्णु जी बोले- ‘यदि मैं जो बात कहूं, वैसे ही मानो, तो चलो.’

लक्ष्मी जी ने स्वीकार किया और भगवान विष्णु, लक्ष्मी जी सहित भूमण्डल पर आए.

कुछ देर बाद एक स्थान पर भगवान विष्णु लक्ष्मी से बोले- ‘जब तक मैं न आऊं, तुम यहां ठहरो. मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत देखना.’

विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी जी को कौतुक उत्पन्न हुआ कि आख‍िर दक्षिण दिशा में क्या है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं दक्षिण में क्यों गए, कोई रहस्य जरूर है.

लक्ष्मी जी से रहा न गया, जैसे ही भगवान ने राह पकड़ी, वैसे ही मां लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं. कुछ ही दूर पर सरसों का खेत दिखाई दिया. वह खूब खि‍ला हुआ और लहलहा रहा था. वे उधर ही चलीं. सरसों की शोभा से वे मुग्ध हो गईं और उसके फूल तोड़कर अपना शृंगार किया और आगे चलीं.

आगे गन्ने (ईख) का खेत खड़ा था. लक्ष्मी जी ने चार गन्ने लिए और रस चूसने लगीं. उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मी जी पर नाराज होकर शाप दिया- ‘मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानीं और यह किसान की चोरी का अपराध कर बैठीं. अब तुम उस किसान की 12 वर्ष तक इस अपराध की सजा के रूप में सेवा करो.’ ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए.

लक्ष्मी किसान के घर रहने लगीं. वह किसान अति दरिद्र था. लक्ष्मीजी ने किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले इस मेरी बनाई देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तुम जो मांगोगी मिलेगा. किसान की पत्नी ने लक्ष्मी के आदेशानुसार ही किया.

पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया और लक्ष्मी से जगमग होने लगा. लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया. किसान के 12 वर्ष बड़े आनन्द से कट गए.

12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं. विष्णुजी, लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया. लक्ष्मी भी बिना किसान की मर्जी वहां से जाने को तैयार न थीं.

तब विष्णुजी ने एक चतुराई की. विष्णुजी जिस दिन लक्ष्मी को लेने आए थे, उस दिन वारुणी पर्व था. इसलिए किसान को वारुणी पर्व का महत्व समझाते हुए भगवान ने कहा कि तुम परिवार सहित गंगा में जाकर स्नान करो और इन कौड़ियों को भी जल में छोड़ देना.

जब तक तुम नहीं लौटोगे, तब तक मैं लक्ष्मी को नहीं ले जाऊंगा. लक्ष्मीजी ने किसान को चार कौड़ियां गंगा के देने को दी. किसान ने वैसा ही किया. वह सपरिवार गंगा स्नान करने के लिए चला. जैसे ही उसने गंगा में कौड़ियां डालीं, वैसे ही चार हाथ गंगा में से निकले और वे कौड़ियां ले लीं.

तब किसान को आश्चर्य हुआ कि वह तो कोई देवी है. तब किसान ने गंगाजी से पूछा ‘हे माता! ये चार भुजाएं किसकी हैं?’ गंगाजी बोलीं ‘हे किसान! वे चारों हाथ मेरे ही थे. तूने जो कौड़ियां भेंट दी हैं, वे किसकी दी हुई हैं?’

किसान ने कहा- ‘मेरे घर जो स्त्री आई है, उन्होंने ही दी हैं.’ इस पर गंगाजी बोलीं कि तुम्हारे घर जो स्त्री आई है वह साक्षात लक्ष्मी हैं और पुरुष विष्णु भगवान हैं.

तुम लक्ष्मी को जाने मत देना, नहीं तो पुन: निर्धन हो जाआगे. यह सुन किसान घर लौट आया. वहां लक्ष्मी और विष्णु भगवान जाने को तैयार बैठे थे. किसान ने लक्ष्मीजी का आंचल पकड़ा और बोला कि मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा.

तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है, पर ये तो चंचला हैं. कहीं ठहरती ही नहीं, इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके.

इनको मेरा शाप था, जो कि 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं. तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है.

किसान हठपूर्वक बोला कि नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा. तुम कोई दूसरी स्त्री यहां से ले जाओ. तब लक्ष्मीजी ने कहा – हे किसान! तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूं जैसा करो. कल तेरस है, मैं तुम्हारे लिए धनतेरस मनाऊंगी. तुम कल घर को लीप-पोतकर, स्वच्छ करना.

रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सांयकाल मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रुपया भरकर मेरे निमित्त रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी. किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी. मैं इस दिन की पूजा करने से वर्ष भर तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी. मुझे रखना है तो इसी तरह प्रतिवर्ष मेरी पूजा करना.

यह कहकर वे दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं और भगवान देखते ही रह गए.

अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथानुसार पूजन किया. उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया. इसी भांति वह हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा करने लगा.

यह भी पढ़ें-धनतेरस का धन : धन्वन्तरी और धनदेवता कुबेर का दिन

जानें धनतेरस का महत्व

धनतेरस हिंदु परिवारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि धनतेरस के शुभ दिन पर लोग नए बर्तन, सोना/चांदी खरीदना शुभ मनाते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि यह कहा जाता है कि देवी लक्ष्मी खुश होकर परिवारों पर धन की वर्षा होती है.
धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी इस दिन का विशेष महत्व है. शास्त्रों में इस बारे में कहा है कि जिन परिवारों में धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती. घरों में दीपावली की सजावट भी आज ही से प्रारम्भ हो जाती है.

इस दिन घरों को स्वच्छ कर, लीप-पोतकर, चौक, रंगोली बना सायंकाल के समय दीपक जलाकर लक्ष्मी जी का आवाहन किया जाता है. इस दिन पुराने बर्तनों को बदलना व नए बर्तन खरीदना शुभ माना गया है. इस दिन चांदी के बर्तन खरीदने से तो अत्यधिक पुण्य लाभ होता है.

इस दिन हल जुती मिट्टी को दूध में भिगोकर उसमें सेमर की शाखा डालकर लगातार तीन बार अपने शरीर पर फेरना तथा कुमकुम लगाना चाहिए.

कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, कुआं, बावली, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाना चाहिए. हमारे देश में सर्वाधिक धूमधाम से मनाए जाने वाले त्योहार दीपावली का प्रारंभ धनतेरस से हो जाता है. इसी दिन से घरों की लिपाई-पुताई प्रारम्भ कर देते हैं. दीपावली के लिए विविध वस्तुओं की खरीद आज की जाती है. इस दिन से कोई किसी को अपनी वस्तु उधार नहीं देता. इसके उपलक्ष्य में बाजारों से नए बर्तन, वस्त्र, दीपावली पूजन हेतु लक्ष्मी-गणेश, खिलौने, खील-बताशे तथा सोने-चांदी के जेवर आदि भी खरीदे जाते हैं.

धनतेरपर क्‍या है पूजा का मुहूर्त
धनतेरस पर पूजा का समय – 19:32 अपराह्न से 20:18 बजे तक
प्रदोष काल –17:49 बजे से 20:18 अपराह्न
वृषभ काल – 19:32 अपराह्न से 21:33 बजे तक
17 अक्‍टूबर, 2017 को त्रयोदशी तिथि सुबह 12 बजकर 26 मिनट पर शुरू होगी.
18 अक्‍टूबर, 2017 को त्रयोदशी तिथि सुबह 8 बजे समाप्‍त होगी.
सूर्योदय के बाद शुरू होने वाले प्रदोषकाल के दौरान लक्ष्मी पूजा की जानी चाहिए.

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By Shweta October 16, 2017 7 min read
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