मिच्छामी दुक्कड़म द्वारा, यह कहने की कोशिश की जा रही है, ‘मिथ्या में दुष्कृतम’ मतलब , ‘मेरे बुरे कर्म (दुष्कृत) फलहीन हो (मिथ्या)।’ मिच्छामी दुक्कड़म के अर्थ से हम समझ सकते हैं ,यह एक क्षमापना पर्व है ।
यह वाक्य हमसे हुई उन गलतियों के लिए पश्चाताप व्यक्त करने का एक तरीका है। यह पश्चाताप, प्रतिक्रमण है (कबूल करना, क्षमा मांगना और पुनरावृत्ति न करने का संकल्प करना) जो संवत्सरी के दिन किया जाता है।
मिच्छामी दुक्कड़म् प्राकृत भाषा का शब्द
प्राकृत भाषा में काफी जैन ग्रंथों की रचना हुई है। ‘मिच्छामी दुक्कड़म्’ भी प्राकृत भाषा का शब्द है। पर्युषण महापर्व जैन धर्मावलंबियों में आत्मशुद्धि का पर्व है। इस तरह पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि के साथ मनोमालिन्य दूर करने तथा सभी से क्षमा-याचना मांगने का सुअवसर प्रदान करने वाला महापर्व है।
आचार्य महाश्रमण के अनुसार- क्षमापना से चित्त में आह्लाद का भाव पैदा होता है और आह्लाद भावयुक्त व्यक्ति मैत्रीभाव उत्पन्न कर लेता है और मैत्रीभाव प्राप्त होने पर व्यक्ति भाव विशुद्धि कर निर्भय हो जाता है। जीवन में अनेक व्यक्तियों से संपर्क होता है तो कटुता भी वर्षभर के दौरान आ सकती है। व्यक्ति को कटुता आने पर उसे तुरंत ही मन में साफ कर देनी चाहिए और संवत्सरी पर अवश्य ही साफ कर लेना चाहिए।
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विदेशों में भी मनाते हैं क्षमापना पर्व
जैन धर्म के पयुर्षण पर्व से विदेश भी अछूता नहीं है। यहां रहने वाले जैन धर्मावलंबी भी इन दिनों तप-आराधना करके ‘मिच्छामी दुक्कड़म्’ का पर्व मनाते हैं और अपने से दूर रहने वाले अपने सगे-संबंधी तथा परिचितों-मित्रों से माफी मांगकर क्षमापना पर्व को मनाते हैं। यह पर्व भारत के अलावा दुनिया में अन्य कई जगहों, जैसे अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, जापान व अन्य अनेक देशों में भी यह पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं।
माना जाता है कि क्षमा देने से आप अन्य समस्त जीवों को अभयदान देते हैं और उनकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। तब आप संयम और विवेक का अनुसरण करेंगे, आत्मिक शांति अनुभव करेंगे और सभी जीवों और पदार्थों के प्रति मैत्रीभाव रखेंगे। आत्मा तभी शुद्ध रह सकती है, जब वह अपने से बाहर हस्तक्षेप न करे और बाहरी तत्व से विचलित न हो। क्षमाभाव ही इसका मूलमंत्र है।
भगवान महावीर ने कहा है-
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्तिमे सव्व भुएस् वैरं ममझं न केणई।
अर्थात सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ मेरा बैर नहीं है। यह वाक्य परंपरागत जरूर है, मगर विशेष आशय रखता है। इसके अनुसार क्षमा मांगने से ज्यादा जरूरी क्षमा करना है।
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