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कांवड़ यात्रा की शुरुआत सबसे पहले किसने की थी? जानिए भगवान परशुराम से जुड़ी पौराणिक मान्यता

कांवड़ यात्रा की शुरुआत सबसे पहले किसने की थी? जानिए भगवान परशुराम से जुड़ी पौराणिक मान्यता

कांवड़ यात्रा की शुरुआत सबसे पहले किसने की थी? जानिए भगवान परशुराम से जुड़ी पौराणिक मान्यता
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कांवड़ यात्रा की शुरुआत सबसे पहले किसने की थी? जानिए भगवान परशुराम से जुड़ी पौराणिक मान्यता

सावन का महीना आते ही देशभर में भगवान शिव की भक्ति का अनूठा उत्साह देखने को मिलता है। लाखों शिवभक्त पवित्र नदियों से गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। इस धार्मिक परंपरा को कांवड़ यात्रा कहा जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कांवड़ यात्रा की शुरुआत सबसे पहले किसने की थी और पहला कांवड़िया कौन था?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम को पहला कांवड़िया माना जाता है। हालांकि कुछ परंपराएं यह श्रेय लंकापति रावण, श्रवण कुमार और भगवान श्रीराम को भी देती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। आइए इन सभी पौराणिक कथाओं को विस्तार से जानते हैं।

भगवान परशुराम और पहली कांवड़ यात्रा

सबसे प्रचलित लोकमान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम ने सबसे पहले पवित्र गंगाजल कांवड़ में भरकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। कहा जाता है कि उन्होंने त्रेतायुग में गढ़मुक्तेश्वर से पवित्र गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के पुरा महादेव (बागपत) स्थित शिवलिंग का अभिषेक किया।

इसी घटना को कांवड़ यात्रा की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि आज भी लाखों कांवड़िए गढ़मुक्तेश्वर से जल लेकर पुरा महादेव में जलाभिषेक करते हैं और तभी से सावन में गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाने की परंपरा प्रचलित हुई।

क्या रावण था पहला कांवड़िया? समुद्र मंथन से जुड़ी कथा

कुछ पौराणिक परंपराओं में लंकापति रावण को पहला कांवड़िया माना जाता है। कथा के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया था, जिससे उनके शरीर में असहनीय ताप उत्पन्न हो गया। शिव के परम भक्त रावण ने कांवड़ में पवित्र गंगाजल भरकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया, जिससे विष की तपन शांत हुई।

इसी कारण कई विद्वान कांवड़ यात्रा की परंपरा का मूल इसी प्रसंग में मानते हैं। सावन में जलाभिषेक का विशेष महत्व भी इसी कथा से जुड़ा हुआ है — मान्यता है कि सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

श्रवण कुमार की कांवड़: मातृ-पितृ भक्ति की मिसाल

कुछ विद्वान त्रेतायुग के श्रवण कुमार को पहला कांवड़िया मानते हैं। कथा के अनुसार, श्रवण कुमार अपने नेत्रहीन माता-पिता को कांवड़ (बहंगी) में बैठाकर तीर्थ यात्रा पर ले गए थे। मान्यता है कि वे उन्हें हरिद्वार लाए, गंगा स्नान कराया और लौटते समय अपने साथ गंगाजल भी लेकर गए।

कंधे पर कांवड़ उठाकर की गई इस यात्रा को कई परंपराओं में कांवड़ यात्रा का आरंभिक स्वरूप माना जाता है।

भगवान श्रीराम और कांवड़ यात्रा

एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। यही कारण है कि सुल्तानगंज से देवघर की कांवड़ यात्रा आज भी देश की सबसे प्रसिद्ध कांवड़ यात्राओं में से एक मानी जाती है।

तो पहला कांवड़िया कौन था?

परशुराम, रावण, श्रवण कुमार और श्रीराम — चारों से जुड़ी कथाएं अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में प्रचलित हैं। किसी एक कथा को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता; इन्हें धार्मिक आस्था और लोकमान्यता के रूप में ही समझा जाना चाहिए। फिर भी, सबसे व्यापक लोकमान्यता भगवान परशुराम को ही पहला कांवड़िया मानती है।

कांवड़ यात्रा 2026 कब से कब तक है?

इस वर्ष कांवड़ यात्रा 2026 की शुरुआत सावन माह के पहले दिन गुरुवार, 30 जुलाई 2026 से होगी और इसका समापन 28 अगस्त 2026 (श्रावण पूर्णिमा) को होगा। अधिकांश श्रद्धालु सावन शिवरात्रि — मंगलवार, 11 अगस्त 2026 को शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाकर अपनी यात्रा पूर्ण करेंगे।

इस दौरान हरिद्वार, गौमुख, गंगोत्री और सुल्तानगंज से जल लेकर करोड़ों शिवभक्त अपने-अपने शिवालयों की ओर प्रस्थान करेंगे।

सावन महीना 2026

कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व

सावन का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है। श्रद्धालु इस दौरान गंगा, गंगोत्री, हरिद्वार, गौमुख, सुल्तानगंज और अन्य पवित्र नदियों से जल लेकर अपने-अपने शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं।

धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमों के साथ कांवड़ यात्रा करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

कांवड़ यात्रा के नियम

कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु कई धार्मिक नियमों का पालन करते हैं—

  • सात्विक भोजन ग्रहण करना।
  • मांस, मदिरा और नशे से दूर रहना।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करना।
  • कांवड़ को भूमि पर सीधे न रखना।
  • स्वच्छता और अनुशासन बनाए रखना।
  • “बोल बम” और “हर हर महादेव” के जयघोष के साथ यात्रा पूरी करना।

आज की कांवड़ यात्रा

आज कांवड़ यात्रा दुनिया की सबसे बड़ी वार्षिक धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु उत्तर भारत सहित देश के विभिन्न हिस्सों में पैदल यात्रा कर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। प्रशासन भी यात्रा के दौरान सुरक्षा, चिकित्सा, यातायात और सुविधाओं की व्यापक व्यवस्था करता है।

कांवड़ यात्रा के नियम

रावण की कांवड़ यात्रा

निष्कर्ष

कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि श्रद्धा, अनुशासन, सेवा और भगवान शिव के प्रति समर्पण का प्रतीक है। पहला कांवड़िया चाहे भगवान परशुराम को माना जाए, रावण को या श्रवण कुमार को — हर कथा इस यात्रा को और भी विशेष बनाती है। सावन में की जाने वाली यह पवित्र यात्रा आज भी करोड़ों शिवभक्तों की आस्था का सबसे बड़ा उत्सव बनी हुई है।

कांवड़ यात्रा से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

पहला कांवड़िया कौन था?

सबसे प्रचलित लोकमान्यता के अनुसार भगवान परशुराम पहले कांवड़िया थे, जिन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव (बागपत) में शिवलिंग का जलाभिषेक किया। कुछ परंपराएं रावण, श्रवण कुमार और भगवान श्रीराम को भी पहला कांवड़िया मानती हैं।

कांवड़ यात्रा 2026 कब से शुरू होगी?

कांवड़ यात्रा 2026 की शुरुआत गुरुवार, 30 जुलाई 2026 से होगी और समापन 28 अगस्त 2026 (श्रावण पूर्णिमा) को होगा।

कांवड़ का जल कब चढ़ाया जाएगा 2026 में?

अधिकांश श्रद्धालु सावन शिवरात्रि — मंगलवार, 11 अगस्त 2026 को शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाकर कांवड़ यात्रा पूर्ण करेंगे।

रावण को पहला कांवड़िया क्यों माना जाता है?

पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को धारण करने के बाद भगवान शिव के शरीर में तीव्र ताप उत्पन्न हुआ था। शिवभक्त रावण ने कांवड़ में गंगाजल भरकर शिव का जलाभिषेक किया और विष की तपन शांत की। इसी कारण कुछ परंपराएं रावण को पहला कांवड़िया मानती हैं।

कांवड़ यात्रा के मुख्य नियम क्या हैं?

कांवड़ यात्रा के दौरान सात्विक भोजन, मांस-मदिरा और नशे से दूरी, ब्रह्मचर्य का पालन, कांवड़ को भूमि पर सीधे न रखना तथा स्वच्छता और अनुशासन बनाए रखना प्रमुख नियम हैं। यात्रा “बोल बम” और “हर हर महादेव” के जयघोष के साथ पूर्ण की जाती है।

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

Reviewed by Bhavya Srivasava on July 17, 2026.

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July 17, 2026 6 min read
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