जगन्नाथ पुरी को ‘धरती का अंतिम तीर्थ’ क्यों कहा जाता है?
भारत की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा में चारधामों का विशेष स्थान है—बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम् और जगन्नाथ पुरी। इन सभी में भी जगन्नाथ पुरी को एक विशिष्ट उपाधि मिली है—‘धरती का अंतिम तीर्थ’। यह सिर्फ श्रद्धा का शब्द नहीं, बल्कि इतिहास, आध्यात्मिकता, भूगोल और अलौकिक मान्यताओं का अद्भुत संगम है। लेकिन आखिर पुरी को ‘अंतिम तीर्थ’ क्यों कहा जाता है? इसके पीछे कई रहस्य, आस्थाएँ और परंपराएँ जुड़ी हुई हैं।
चारधाम यात्रा का अंतिम पड़ाव
चारधाम यात्रा को जीवन की सबसे पुण्यदायी यात्राओं में माना जाता है। इस यात्रा का अंतिम पड़ाव जगन्नाथ पुरी है।
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बद्रीनाथ उत्तर में
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द्वारका पश्चिम में
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रामेश्वरम् दक्षिण में
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और पुरी पूर्व में स्थित है
पुराणों में कहा गया—
“जिसने चारों धामों का दर्शन किया, और अंत में पुरी में महाप्रभु का दर्शन किया, वह मोक्ष का पात्र बन जाता है।” इस कारण पुरी को ‘अंतिम धाम’ या ‘अंतिम तीर्थ’ कहा गया।
मोह और माया से मुक्ति का स्थान
पुराण बताते हैं कि भगवान विष्णु का पूर्ण रूप—जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा—पुरी में स्वयं प्रकट होते हैं। पुरी को वह स्थान माना गया है जहाँ
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आत्मा संसार के बंधन से मुक्त होती है
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मन अंतिम बार ईश्वर के समक्ष समर्पित होता है
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जन्म-मरण के चक्र से परे होने का अवसर प्राप्त होता है
इसलिए मान्यता है— “जीवन की अंतिम आध्यात्मिक पूर्णता पुरी में ही मिलती है।”
कलियुग में पूर्ण मोक्ष का केंद्र
भविष्यपुराण और स्कंदपुराण में उल्लेख है कि कलियुग में मोक्ष सिर्फ पुरी में सहज है, क्योंकि यहाँ जगन्नाथ स्वयं अपने भक्तों को स्वीकारते हैं। यहाँ एक प्रसिद्ध मान्यता है:
“कलियुग का द्वार पुरी से खुलता है और वही बंद होता है।” यानी कलियुग की मुक्ति-ऊर्जा का केंद्र पुरी है।
महासागर का पवित्र संगम
पुरी एक अनोखी जगह है जहाँ
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धर्म
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प्रकृति
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आध्यात्मिक ऊर्जा
एक साथ दिखाई देती हैं।
यहाँ का महानदीप (Golden Beach) हिंद महासागर से मिलता है और मान्यता है कि “महासागर मोक्ष के मार्ग को अंतिम रूप से शुद्ध करता है।” अर्थात् आत्मा जब अंतिम तीर्थ में पहुँचती है, तो समुद्र उसे ईश्वर के पास ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
जगन्नाथ रथयात्रा – अंतिम समर्पण का पर्व
पुरी का सबसे बड़ा आकर्षण है—विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा। क्यों ‘अंतिम तीर्थ’ इससे जुड़ा है? क्योंकि रथयात्रा का प्रतीक है—
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अहंकार का विसर्जन
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अंतिम समर्पण
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ईश्वर को जीवन की बागडोर सौंपना
महापुरुषों ने कहा है: “रथयात्रा का दर्शन, जीवन की यात्रा का अंतिम चरण है—जहाँ मन ईश्वर में विलीन हो जाता है।”
देवी महालक्ष्मी का विशेष निवास
पुरी को लक्ष्मी पीठ भी कहा गया है। कथा है कि लक्ष्मीजी ने पुरी को अपना स्थायी निवास बनाया क्योंकि यहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं। स्थान देवी-देवताओं का स्थायी निवास माना जाए, वह अंतिम और सर्वोच्च तीर्थ ही माना जाता है।
अनेक रहस्य जो इसे ‘अंतिम तीर्थ’ बनाते हैं
पुरी उन दुर्लभ स्थानों में से है जहाँ विज्ञान भी अधीर हो जाता है—
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मंदिर के ऊपर पताका सदैव हवा की विपरीत दिशा में लहराती है
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पुरी में समुद्र कभी-कभी कई किलोमीटर पीछे हट जाता है
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मंदिर की छाया जमीन पर नहीं दिखती
इन रहस्यमयी घटनाओं ने सदियों से इसे दिव्य तीर्थ का दर्जा दिया है।
‘अंतिम तीर्थ’ की आध्यात्मिक व्याख्या
धर्मशास्त्र कहते हैं— “जीवन का अंतिम सत्य ईश्वर है और ईश्वर की अंतिम अनुभूति जगन्नाथ पुरी में होती है।” इसलिए पुरी को मानव जीवन की अंतिम आध्यात्मिक मंज़िल माना गया है। जो व्यक्ति जीवन में एक बार भी महाप्रभु जगन्नाथ के दर्शन कर लेता है, उसका जीवन पूर्ण माना जाता है।
जगन्नाथ पुरी को ‘धरती का अंतिम तीर्थ’ कहने का कारण केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि इसके पीछे आध्यात्मिक रहस्य, पुराणों की भविष्यवाणियाँ, प्रकृति के अद्भुत चमत्कार और भगवान के विशेष स्वरूप की कृपा जुड़ी है। चारधाम की यात्रा का अंतिम पड़ाव होना, कलियुग में मोक्ष का सबसे आसान मार्ग माना जाना, रथयात्रा की दैवीय परंपरा और समुद्र तट पर स्थित इस धाम की पवित्र ऊर्जा—ये सब मिलकर पुरी को एक ऐसा स्थान बनाते हैं, जहाँ जीवन की आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण होती है।
पुरी सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि वह धाम है जहाँ हर भक्त अपनी अंतिम आशा, अंतिम प्रार्थना और अंतिम समर्पण लेकर पहुँचता है। यही कारण है कि जगन्नाथ पुरी को वास्तव में “धरती का अंतिम तीर्थ” कहा जाता है—वह पवित्र स्थान जहाँ आत्मा को अपना अंतिम विश्राम और परम लक्ष्य प्राप्त होता है।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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