मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित चौसठ योगिनी मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और रहस्यमयी मंदिरों में से एक माना जाता है। नर्मदा नदी के किनारे भेड़ाघाट की पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर अपनी अनोखी गोलाकार वास्तुकला, योगिनी परंपरा और भगवान शिव-पार्वती की दुर्लभ प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह स्थान शैव, शाक्त और तांत्रिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
कहां स्थित है चौसठ योगिनी मंदिर?
चौसठ योगिनी मंदिर मध्य प्रदेश के भेड़ाघाट (जबलपुर) में नर्मदा नदी के निकट एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को कई सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। ऊपर पहुंचने पर यहां से नर्मदा घाटी और आसपास का प्राकृतिक दृश्य अत्यंत मनोहारी दिखाई देता है।
क्यों प्रसिद्ध है यह मंदिर?
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी वृत्ताकार (Circular) संरचना है। मंदिर के चारों ओर बने कक्षों में योगिनियों की मूर्तियां स्थापित थीं। हालांकि समय के साथ कई प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, फिर भी यह मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
शिव-पार्वती की अनोखी प्रतिमा
मंदिर के मध्य स्थित गर्भगृह में भगवान शिव और माता पार्वती की एक दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है। अधिकांश शिव मंदिरों में जहां शिवलिंग की पूजा होती है, वहीं यहां शिव-पार्वती का संयुक्त विग्रह विशेष आकर्षण का केंद्र है। इस प्रतिमा में दोनों नंदी पर विराजमान दिखाई देते हैं, जो इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग पहचान देता है।
क्या है चौसठ योगिनियों का महत्व?
हिंदू परंपरा में योगिनियों को देवी शक्ति के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है। विभिन्न धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ये देवी दुर्गा या पार्वती की दिव्य शक्तियों का विस्तार मानी जाती हैं।
भारत में योगिनी मंदिरों की परंपरा 9वीं से 12वीं शताब्दी के बीच विशेष रूप से विकसित हुई थी। जबलपुर का यह मंदिर उसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
तंत्र साधना से क्या है संबंध?
इतिहासकारों के अनुसार, चौसठ योगिनी मंदिर तांत्रिक उपासना परंपरा से जुड़ा रहा है। ऐसे मंदिर खुले आकाश (Roofless) या विशेष गोलाकार संरचना में बनाए जाते थे, जहां शक्ति उपासना और तांत्रिक साधना की जाती थी।
हालांकि आज यह मंदिर मुख्य रूप से एक ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर है तथा यहां सामान्य श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती के दर्शन के लिए आते हैं।
मंदिर का इतिहास
माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में कलचुरी शासकों के शासनकाल में हुआ था। यह भारत के सबसे बड़े योगिनी मंदिरों में से एक माना जाता है। सदियों के दौरान कई मूर्तियां क्षतिग्रस्त हुईं, लेकिन मंदिर की मूल संरचना आज भी इसकी प्राचीन भव्यता की गवाही देती है।
सावन में बढ़ जाता है धार्मिक महत्व
सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु चौसठ योगिनी मंदिर पहुंचकर भगवान शिव और माता पार्वती के दर्शन करते हैं तथा सुख, समृद्धि और परिवार की मंगलकामना करते हैं।
यात्रा के दौरान ध्यान रखें
- सुबह या शाम के समय दर्शन करना अधिक सुविधाजनक रहता है।
- सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, इसलिए आरामदायक जूते पहनें।
- वर्षा ऋतु में फिसलन से सावधानी रखें।
- मंदिर परिसर की स्वच्छता और ऐतिहासिक धरोहर का सम्मान करें।
निष्कर्ष
जबलपुर का चौसठ योगिनी मंदिर केवल एक प्राचीन धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, स्थापत्य कला, शक्ति उपासना और शिव भक्ति का अद्भुत संगम है। यहां स्थित शिव-पार्वती की दुर्लभ प्रतिमा, योगिनी परंपरा और तंत्र साधना से जुड़ा इतिहास इस मंदिर को भारत के सबसे अनोखे तीर्थ स्थलों में शामिल करता है। सावन के पावन महीने में यहां दर्शन करना श्रद्धालुओं के लिए एक विशेष आध्यात्मिक अनुभव माना जाता है।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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