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5 जून 2020 को चंद्र ग्रहण : किन बातों का रखें ध्यान ?

5 जून 2020 को चंद्र ग्रहण : किन बातों का रखें ध्यान ?

5 जून 2020 को चंद्र ग्रहण : किन बातों का रखें ध्यान ?
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5 जून 2020 को चंद्र ग्रहण : किन बातों का रखें ध्यान ?

5 जून 2020 को चंद्र ग्रहण : किन बातों का रखें ध्यान ?

  • ग्रहण काल मे सम्भलकर करें कुशा का प्रयोग, रखें इन बातों का ध्‍यान

इस वर्ष जून- जुलाई 2020 के मध्‍य तीन ग्रहण लगने जा रहे हैं। 5 जून 2020 को चंद्र ग्रहण, 21 जून 2020 को सूर्य ग्रहण और फिर 5 जुलाई 2020 को चंद्र ग्रहण लगेगा। ग्रहण काल से पहले ही सूतक लग जाते हैं। ग्रहण के दौरान निकलने वाली नकारात्‍मक ऊर्जा से बचाव के सभी उपाय किये जाते हैं। कुश एक प्रकार का घास होता है। सदियों से हिन्दुओं में कुश का इस्तेमाल पूजा के लिए किया जाता रहा है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से कुश घास को पवित्र माना जाता है। लेकिन पूजा के अलावा भी औषधि के रुप में कुश का अपना एक महत्व होता है शायद इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। चलिये जानते हैं कि कुश का किस प्रकार आयुर्वेद में औषधि के रुप में प्रयोग किया जाता है।

मंदिरों से लेकर घरों तक हर वस्‍तु की शुद्धि के लिए तमाम साधन उपयोग में लाए जाते हैं। इन्‍हीं साधनों में सबसे अहम है कुशा का प्रयोग। ग्रहण काल में हर वस्‍तु में कुशा डालने की मान्‍यता है। कुशा का महत्‍व सनातन धर्म के साथ ही वैज्ञानिक दृष्टि से भी बहुत अधिक है।

कुश के प्रकार 

शास्त्रों में दस प्रकार के कुशों का वर्णन मिलता है…

कुशा: काशा यवा दूर्वा उशीराच्छ सकुन्दका:।
गोधूमा ब्राह्मयो मौन्जा दश दर्भा: सबल्वजा:।।

कुशा की उत्पत्ति कैसे हुई ?

मत्स्य पुराण (22/89) में ऐसा वर्णित है की कुशा भगवान् विष्णु के शरीर से उत्पन्न से उत्पन्न हुई है, इसी कारणवश कुश को अत्यन्त पवित्र हैं। उसमे उल्लेखित एक कथा के अनुसार जब भगवान् श्रीहरि ने वराह अवतार धारण किया, तब हिरण्याक्ष का वध करने के बाद जब पृथ्वी को जल से बाहर निकाला और उसको अपने निर्धारित स्थान पर स्थापित किया, उसके बाद वराह भगवान् ने भी पशु प्रवृत्ति के अनुसार अपने शरीर पर लगे जल को झाड़ा तब उंके शरीर के रोम (बाल) पृथ्वी पर गिरे और कुश के रूप में बदल गये।

कुश की उत्त्पत्ति को ले करके एक मान्यता यह भी है कि जब सीता जी पृथ्वी में समाई थीं, तो श्री राम जी ने जल्दी से दौड़ कर उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता जी के केश ही आ पाए। यह केश ही कुशा के रूप में परिणत हो गई।

ग्रहणकाल में ऐसे करें कुशा का प्रयोग

कुशा ऊर्जा का कुचालक है। इसीलिए सूर्य व चंद्रग्रहण के समय इसे भोजन और पानी में डाल दिया जाता है जिससे ग्रहण के समय पृथ्वी पर आने वाली किरणें कुश से टकराकर परावर्तित हो जाती हैंं। ऐसा करने से भोजन व पानी पर उन किरणों का विपरीत असर नहीं पड़ता।पंडित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं की इस दौरान व्‍‍यक्ति को कुशा का तिनका अपने शरीर से स्‍पर्श करते हुए भी रखना चाहिए। पुरुष अपने कान के ऊपर कुशा का तिनका लगा सकते हैं वहीं महिलाएं अपनी चोटी में इसे धारण करके रखें। कुशा की पवित्री उन लोगों को जरूर धारण करनी चाहिए, जिनकी राशि पर ग्रहण पड़ रहा है।

जानिए हिन्दू धर्म में कुशा का महत्‍व

कुश या कुशा से बने आसन पर बैठकर तप, ध्यान और पूजन आदि धार्मिक कर्म-कांडों से प्राप्त ऊर्जा धरती में नहीं जा पाती क्योंकि धरती व शरीर के बीच कुश का आसन कुचालक का कार्य करता है। पंडित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की अध्यात्म और कर्मकांड शास्त्र में प्रमुख रूप से काम आने वाली वनस्पतियों में कुशा का प्रमुख स्थान है। जिस प्रकार अमृतपान के कारण केतु को अमरत्व का वर मिला है, उसी प्रकार कुशा भी अमृत तत्‍व से युक्त है। यह पौधा पृथ्वी का पौधा न होकर अंतरिक्ष से उत्पन्न माना गया है। मान्यता है कि जब सीता जी पृथ्वी में समाई थीं तो राम जी ने जल्दी से दौड़ कर उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता जी के केश ही आ पाए। ये केश राशि ही कुशा के रूप में परिणत हो गई। केतु शांति विधानों में कुशा की मुद्रिका और कुशा की आहूतियां विशेष रूप से दी जाती हैं। रात्रि में जल में भिगो कर रखी कुशा के जल का प्रयोग कलश स्थापना में सभी पूजा में देवताओं के अभिषेक, प्राण प्रतिष्ठा, प्रायश्चित कर्म, दशविध स्नान आदि में किया जाता है।

1-शास्त्र में कहा गया है कि,“दर्भो य उग्र औषधिस्तं ते बध्नामि आयुषे”,अर्थात कुशा या दर्भ तत्काल फल देने वाली औषधि है,उसे आयु वृद्धि के निमित्त धारण करना चाहिये।

2-जो मनुष्य दर्भ धारण कर कल्याण युक्त कार्य करता है,उसके बाल नहीं झड़ते और ह्रदय में आघात नहीं पहुँचता है।

3-दर्भ दैवी गुणों से उत्पन्न एवं युक्त है,इसलिए दैवी कार्यों में दैवी वातावरण की प्राप्ति कराता है।

4-दायें हाथ में दो कुशा से निर्मित पवित्री धारण करनी चाहिये।

5-बायें हाथ में तीन कुशा से निर्मित पवित्री धारण करनी चाहिये।

6-एक कुशा यज्ञोपवीत में,एक कुशा शिखा में और दोनो पावों के नीचे कुशा रखना चाहिये।

7-कुशा ऋतुओं से सूर्य चन्द्रमा पृथ्वी और अंतरिक्ष से होने वाले गर्मी सर्दी आदि के प्रभाव से हाथ,पाँव और मस्तिष्क की रक्षा करता है।

8-वैज्ञानिक भाषा में कुशा को विद्युत् प्रवाह के संक्रमण में बाधक बताया गया है,अर्थात यह बाहरी विद्युत् प्रवाह से शरीर की रक्षा करता है।

9-हमारे शरीर के पञ्च भागों अर्थात दोनों हाथ,पाँव और मस्तिष्क की विद्युत् प्रवाही तत्वों से कुशा रक्षा करता है,अतः पूजा काल में इन पांच स्थानों की कुशा द्वारा रक्षा करनी चाहिये।

कुशा प्रयोग में रखें इन बातों की रखें

देव पूजा में प्रयुक्त कुशा का पुन: उपयोग किया जा सकता है, परन्तु पितृ एवं प्रेत कर्म में प्रयुक्त कुशा अपवित्र हो जाती है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार देव पूजन, यज्ञ, हवन, यज्ञोपवीत, ग्रहशांति पूजन कार्यो में रुद्र कलश एवं वरुण कलश में जल भर कर सर्वप्रथम कुशा डालते हैं। कलश में कुशा डालने का वैज्ञानिक पक्ष यह है कि कलश में भरा हुआ जल लंबे समय तक जीवाणु से मुक्त रहता है।

समझें कुशा आसन के महत्व को

कुशा से बने आसन पर बैठ कर साधना करने से आरोग्य, लक्ष्मी प्राप्ति, यश और तेज की वृद्घि होती है। साधक की एकाग्रता भंग नहीं होती। कुशा मूल की माला से जाप करने से अंगुलियों के एक्यूप्रेशर बिंदु दबते रहते हैं, जिससे शरीर में रक्त संचार ठीक रहता है। भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को लायी गयी कुशा वर्ष भर तक पवित्र रहती है।

धार्मिक कार्यों में कुशा का बहुत महत्व है। कुशा को ज्यादातर पूर्वजों के श्राद्ध में या फिर ग्रहण के दौरान घर में मौजूद खाने-पीने की चीजों में डालने के लिए किया जाता है। ग्रहण के दौरान खाने-पीने की चीजों में कुशा डालने से ग्रहण की अशुभ किरणों से खाद्य पदार्थ को बचाया जाता है। आइये जानते हैं कि कैसे कुशा एक लाभकारी वस्तु है।

पूजा या अनुष्ठान करते समय कुशा के आसान पर बैठना महत्वपूर्ण बताया जाता है। इससे शरीर में शक्ति का संचार होता है।कुशा के आसन पर पूजा और अनुष्ठान करने से दौरान शरीर में आनी वाली सकारात्मक ऊर्जा धरती में नहीं जाती है इसलिए इसे लाभकारी बताया गया है।

कुशा के आसन पर बैठकर पूजा करनेे से रूके हुए काम बिना किसी विलंब के पूरे होते हैं साथ ही मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि कुशा के उपयोग से तुरंत फल प्राप्त होता है और वेदों में भी इसका उल्लेख है जो लाभकारी बताया गया है।

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Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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June 4, 2020 7 min read
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