रक्षाबंधन – सभ्यता का महापर्व
येन बद्धो बली राजा दानवेंद्रो महाबल:।
तेन त्वाम मनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
“रक्षाबंधन अर्थात जिस रक्षा सूत्र से भगवान वामन ने राजा बलि को बांधा था मैं उसी रक्षा सूत्र से तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षा सूत्र तुम स्थिर रहना। है। रक्षा बंधन का पर्व हो या फिर कोई अन्य पूजा अक्सर हम देखते हैं कि जब भी रक्षाबंधन का ये सूत्र कोई किसी को बांधता है तो इस मंत्र का उच्चारण जरुर करता है। आखिर इस मंत्र के मायने क्या हैं? क्या ये मानवीय सभ्यता के प्रारंभिक सिद्धांतों का पहला महावाक्य है। क्या ये मानव और दानवों की दो सभ्यताओं का संधि पत्र है? क्या यह सभ्यता की शुरुआत की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी वैज्ञानिक मानते हैं कि मानव जाति का उद्भव पशुओं के क्रमिक विकास से हुआ है।
रक्षाबंधन शुभ मुर्हूत
रक्षाबंधन पर लगभग 13 घंटे तक शुभ मुर्हूत रहेगा।
दोपहर 1:43 से 4:20 तक राखी बांधने का विशेष फल मिलेगा।
ऐसा ही कुछ सनातन धर्म में विष्णु की दशावतार के क्रमिक अवतरण का भी है। विष्णु के वामन अवतार से पहले के सारे अवतार – मत्स्य, कूर्म, वाराह एवं नृसिंह सभी जल से लेकर पृथ्वी तक पशुओं के विकास की कथा जैसे लगते हैं। पशु सभ्यता और मानवीय सभ्यता में एक बड़ा अंतर धार्मिक और सामाजिक रुप से आता है। वैज्ञानिक डार्विन का सिद्धांत जहां प्राकृतिक चयन का सिद्धांत लेकर आता है। डार्विन कहते हैं सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट। अर्थात जो सबसे मजबूत है वही प्रकृति के प्रकोप से बच सकता है और वही जीवित रह सकता है। लेकिन ये जंगल का कानून है जहां मत्स्य न्याय चलता है।
अर्थात बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। कमजोर प्राणी को मजबूत प्राणी मार डालता है। परंतु सभ्यता का अर्थ इसके एकदम विपरीत होता है। जंगल कानून के विपरीत सभ्य समाज का अर्थ होता है मजबूत द्वारा कमजोर के अधिकारों और उसके जीवन का संरक्षण। यही सभ्यता का आधार है। सभ्य समाज में अल्पसंख्यकों ,वंचितों और दलितों को भी वही अधिकार प्राप्त होते हैं जो सबल और बहुसंख्यकों को हासिल होते हैं। आधुनिक सभ्यता में भी हम इसे विभिन्न देशों के संविधानों में देख सकते हैं जहां कमजोरों को सबलों के बराबर अधिकार और संरक्षण हासिल होते हैं।
स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन का एक साथ
इस बार 19 साल बाद स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन का एक साथ योग बना है,
इससे पहले यह संयोग साल 2000 में बना था
रक्षाबंधन ऐसा ही पर्व है जिसमें एक मजबूत किसी कमजोर की रक्षा का वचन देता है। इस पर्व की शुरुआत का उद्देश्य भी बिल्कुल यही था। इसकी शुरुआत कश्यप की पत्नी अदिति और दिति की संतानों के मध्य संधि से होती है। अदिति से उत्पन्न संतानों देवताओं और दिति से उत्पन्न संतानों दैत्यों के बीच हमेशा संग्राम होता रहता था। इस निरंतर चलने वाले देवासुर संग्रामों में एक बार दैत्य राजा बलि ने इंद्र सहित सारे देवताओं को स्वर्ग से निकाल कर खुद उस पर अधिकार कर लिया। दो उभरती हुई सभ्यताओं के बीच संधि कराने के लिए ही विष्णु ने वामन का अवतार लिया। वामन अवतार पहला अवतार है जब भगवान विष्णु मानव रुप में प्रगट होते हैं।
इसका अर्थ यह था कि अब जंगल का कानून नहीं चलेगा । एक सभ्य तरीके से संसार को सिद्धांतों पर चलाया जाएगा। वामन अवतार के रुप में विष्णु बलि से रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। राजा बलि दान स्वरुप वामन को तीन पग भूमि देते हैं । दो पगों से विष्णु सारे संसार को नाप लेते हैं और उसे वापस देवताओं को दे देते है। लेकिन विष्णु तीसरे पग से राजा बलि के सम्मान की भी रक्षा करते हैं और उसे पाताल का राज्य दे देते हैं। ये तीन पग वस्तुत देवताओं और दैत्यो के बीच सभ्यता की सीमाएं तय करते हैं। स्वर्ग पर देवता राज करेंगे तो पाताल में दैत्यों का राज होगा। यहीं से मानवीय अवतार वामन द्वारा सभ्यता की शुरुआत होती है। नियमबद्ध शासन की शुरुआत होती है।
ये है शुभ मुहूर्त
मान्यताओं के अनुसार रक्षाबंधन के दिन अपराह्न यानी कि दोपहर में राखी बांधनी चाहिए. अगर अपराह्न का समय उपलब्ध न हो तो प्रदोष काल में राखी बांधना उचित रहता है.
रक्षाबंधन की ये कथा ही नहीं इससे जुड़ी अन्य कथाएं भी एक सभ्य समाज की स्थापना की तरफ इशारा करती है। राजा बलि के वचन से जब विष्णु उनके द्वारपाल बन जाते हैं तब माता लक्ष्मी भी रक्षासूत्र के द्वारा ही बलि से अपने पति को पुन: प्राप्त करती हैं। अर्थात एक स्त्री के अपने पति पर अधिकारों की रक्षा की भी शुरुआत होती है। राजा बलि लक्ष्मी को अपनी बहन मान कर विष्णु को अपने द्वारपाल के दायित्व से मुक्त करते हैं।
द्वापर युग में कृष्ण के चोट लग जाती है और द्रौपदी उन्हें हाथों को अपनी फटी साड़ी से बांधती हैं तब भी कृष्ण इसी रक्षा सूत्र से बंधे वचन की रक्षा करने के लिए द्रौपदी को चीरहरण से बचाते हैं। द्रौपदी की रक्षा एक सभ्य समाज में स्त्री की रक्षा से जुड़ा है। जब महाभारत के दरबार में सभ्यता को ताक पर रख कर एक स्त्री के साथ दुष्कर्म करने की चेष्टा की जा रही थी तब कृष्ण ने धर्म और सभ्यता की पुनर्स्थापना की ।
भद्रा का साया न होने से 15 अगस्त को
सूर्योदय से शाम 5:58 तक रहेगा शुभ मुहूर्त
मुगल काल में भी हुमायूं को कर्णावती औऱ जहांगीर को पन्ना की रानी ने राखी भेजकर जब रक्षा की गुहार लगाई थी तब भी दोनों मुगल शासकों ने अपने उसी सभ्य सामाजिक धर्म का पालन किया जिसमें एक सबल एक निर्बल की रक्षा करता है।
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लेखक – अजीत मिश्रा
ईमेल – ajitkumarmishra78@gmail.com
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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