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कुम्भ मेला : क्या होता है अखाड़ा, बाड़ा, प्रयागवाल और कल्पवास ?

कुम्भ मेला : क्या होता है अखाड़ा, बाड़ा, प्रयागवाल और कल्पवास ?

कुम्भ मेला : क्या होता है अखाड़ा, बाड़ा, प्रयागवाल और कल्पवास ?
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कुम्भ मेला : क्या होता है अखाड़ा, बाड़ा, प्रयागवाल और कल्पवास ?

कुम्भ मेला : क्या होता है अखाड़ा, बाड़ा, प्रयागवाल और कल्पवास ?

अखाड़ा

अखाड़ा शब्द को सुनते ही जो दृश्य मानस पटल पर उतरता है वह मल्लयुद्ध का है। किन्तु यहाँ भाव शब्द की अन्वति और वास्तविक अर्थ से संबोधित है। “अखाड़ा” शब्द “अखण्ड” शब्द का अपभ्रंश है जिसका अर्थ न विभाजित होने वाला है। आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा हेतु साधुओं के संघों को मिलाने का प्रयास किया था, उसी प्रयास के फलस्वरूप सनातन धर्म की रक्षा एवं मजबूती बनाये रखने एवं विभिन्न परम्पराओं व विश्वासों का अभ्यास करने वालों को एकजुट करने तथा धार्मिक परम्पराओं को अक्षुण्ण रखने के लिए विभिन्न अखाड़ों की स्थापना हुई। अखाड़ों से सम्बन्धित साधु-सन्तों की विशेषता यह होती है कि इनके सदस्य शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगत होते हैं।

अखाड़ा सामाजिक व्यवस्था, एकता और संस्कृति तथा नैतिकता का प्रतीक है। समाज में आध्यात्मिक महत्व मूल्यों की स्थापना करना ही अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य है। अखाड़ा मठों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना करना है, इसीलिए धर्म गुरुओं के चयन के समय यह ध्यान रखा जाता था कि उनका जीवन सदाचार, संयम, परोपकार, कर्मठता, दूरदर्शिता तथा धर्ममय हो। भारतीय संस्कृति एवं एकता इन्हीं अखाड़ों के बल पर जीवित है। अलग-अलग संगठनों में विभक्त होते हुए भी अखाडे़ एकता के प्रतीक हैं। अखाड़ा मठों का एक विशिष्ट प्रकार नागा संन्यासियों का एक विशेष संगठन है। प्रत्येक नागा संन्यासी किसी न किसी अखाड़े से सम्बन्धित रहते हैं। ये संन्यासी जहाँ एक ओर शास्त्र पारांगत थे वहीं दूसरी ओर शस्त्र चलाने का भी इन्हें अनुभव था।

वर्तमान में अखाड़ों को उनके इष्ट-देव के आधार पर निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  • शैव अखाड़े इस श्रेणी के इष्ट भगवान शिव हैं। ये शिव के विभिन्न स्वरूपों की आराधना अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर करते हैं।
  • वैष्णव अखाड़े इस श्रेणी के इष्ट भगवान विष्णु हैं। ये विष्णु के विभिन्न स्वरूपों की आराधना अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर करते हैं।
  • उदासीन अखाड़ा सिक्ख सम्प्रदाय के आदि गुरु श्री नानकदेव के पुत्र श्री चंद्रदेव जी को उदासीन मत का प्रवर्तक माना जाता है। इस पन्थ के अनुयाई मुख्यतः प्रणव अथवा ‘ॐ’ की उपासना करते हैं।

अखाड़ों की व्यवस्था एवं संचालन हेतु पाँच लोगों की एक समिति होती है जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश व शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है । अखाड़ों में संख्या के हिसाब से सबसे बड़ा जूना अखाड़ा है इसके बाद निरञ्जनी और तत्पश्चात् महानिर्वाणी अखाड़ा है । उनके अध्यक्ष श्री महंत तथा अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामण्डेलेश्वर के रुप में माने जाते हैं। महामण्डलेश्वर ही अखाड़े में आने वाले साधुओं को गुरु मन्त्र भी देते हैं। पेशवाई या शाही स्नान के समय में निकलने वाले जुलूस में आचार्य महामण्डलेश्वर और श्रीमहंत रथों पर आरूढ़ होते हैं, उनके सचिव हाथी पर, घुड़सवार नागा अपने घोड़ों पर तथा अन्य साधु पैदल आगे रहते हैं। शाही ठाट-बाट के साथ अपनी कला प्रदर्शन करते हुए साधु-सन्त अपने लाव-लश्कर के साथ अपने-अपने गन्तव्य को पहुँचते हैं।

अखाड़ों में आपसी सामंजस्य बनाने एवं आंतरिक विवादों को सुलझाने के लिए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् का गठन किया गया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् ही आपस में परामर्श कर पेशवाई के जुलूस और शाही स्नान के लिए तिथियों और समय का निर्धारण मेला आयोजन समिति, आयुक्त, जिलाधिकारी, मेलाधिकारी के साथ मिलकर करता है।

आज इन अखाड़ों को बहुत ही श्रद्धा-भाव से देखा जाता है। सनातन धर्म की पताका हाथ में लिए यह अखाड़े धर्म का आलोक चहुँओर फैला रहे हैं। इनके प्रति आम जन-मानस में श्रद्धा का भाव शाही स्नान के अवसर पर देखा जा सकता है, जब वे जुलूस मार्ग के दोनों ओर इनके दर्शनार्थ एकत्र होते हैं तथा अत्यंत श्रद्धा से इनकी चरण-रज लेने का प्रयास करते हैं।

दण्डी बाड़ा

हाथ में दण्ड जिसे ब्रम्ह दण्ड कहते है, धारण करने वाले संन्यासी को दण्डी संन्यासी कहा जाता है। दण्डी संन्यासियों का संगठन दण्डी बाड़ा के नाम से जाना जाता है। “दण्ड संन्यास” सम्प्रदाय नहीं अपितु आश्रम परम्परा है। दण्ड संन्यास परम्परा के अन्तर्गत दण्ड संन्यास लेने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण को है। प्रथम दण्डी संन्यासी के रुप में भगवान नारायण ने ही दण्ड धारण किया है।

“नारायणं पद्य भवं वशिष्ठं, शक्तिं च तत्पुत्र पाराशरं च
व्यासं शुकं गौड़ पदं महन्तं गोविन्द योगिन्द्रमथास्य शिष्यं
श्री शंकराचार्यमथास्य पद्य पादं ए हस्तामलकं च शिष्यं
तं त्रोटकं वार्तिककार मनमानस्य गुरु सततं मानतोऽस्मि।।”

तत्पश्चात् भगवान आदि गुरु शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की और इन चारों मठों में धर्माचार्यों की नियुक्ति की। तदुपरान्त धर्म की रक्षा के लिए भगवान आदि शंकराचार्य ने दशनाम संन्यास की स्थापना की, जिनमें तीन (आश्रम, तीर्थ, सरस्वती) दण्डी संन्यासी हुए और सात अखाड़ों के रुप में स्थापित हुए। उपर्युक्त तीन नामों में सर्वप्रथम आश्रम आता है। इनका प्रधान मठ शारदा मठ है, इनके देवता सिद्धेश्वर और देवी भद्रकाली होती हैं तथा इनके आचार्य विश्वरुपाचार्य हैं। इनके ब्रम्हचारी की उपाधि ‘स्वरुप’ है। इन्हीं में दूसरा नाम तीर्थ आता है जो आश्रम के ही समस्त आचरण को अपनाते हैं। तीसरा नाम सरस्वती है, जो शृंगेरी मठ के अनुयायी होते हैं।

आचार्य बाड़ा

आचार्य बाड़ा सम्प्रदाय ही रामानुज सम्प्रदाय नाम से भी जाना जाता है। इस सम्प्रदाय के पहले आचार्य शठकोप हुए जो सूप बेचा करते थे। “शूर्पं विक्रीय विचार शठकोप योगी”। उनके शिष्य मुनिवाहन हुए। तीसरे आचार्य यामनाचार्य हुए। चौथे आचार्य रामानुज हुए। उन्होंने कई ग्रन्थ बनाकर अपने सम्प्रदाय का प्रचार किया। तभी से इस सम्प्रदाय का नाम श्री रामानुज सम्प्रदाय हो गया। इस सम्प्रदाय के अनुयायी नारायण की आराधना करते है और लक्ष्मी को अपनी देवी मानते हैं। कावेरी नदी पर ये अपना तीर्थ मानते हैं और त्रिदंड धारण करते हैं।

आचार्य बाड़ा संप्रदाय में ब्रह्मचारी दीक्षा आठ वर्ष से अधिक आयु के बालकों को दी जाती। इसके बाद उन्हें वेद अध्ययन कराया जाता है। सामवेद को ये अपना वेद मानते हैं । आराधना के कई चरणों की परीक्षा के बाद ही उन्हें संन्यास दिया जाता है। उन्हें इस बात की स्वतंत्रता है कि पढ़ाई पूरी होने पर वे चाहे तो गृहस्थ हो सकते हैं परन्तु संन्यासी होने के बाद परिवार से नाता छूट जाता है।

संन्यासियों को पंच संस्कार की दीक्षा दी जाती है- 1. जिनमें शंख चक्र गरम करके हाथ के मूल में स्पर्श कराया जाता है, 2. माथे पर चंदन का त्रिपुंड टीका धारण कराया जाता है 3, सन्तों का भगवान के नाम पर नामकरण किया जाता है 4. तत्पश्चात उन्हें गुरु मंत्र दिया जाता है, एवं 5. यज्ञ संस्कार के बाद उन्हें संप्रदाय की परंपरा से जोड़ा जाता है।

आचार्य बाड़ा संप्रदाय शरणागति के छह सिद्धान्तों पर आधारित है जो निम्नलिखित है –

  • अनुकूलता का संकल्प
  • प्रतिकूलता का वर्जन
  • भगवान रक्षा करेंगे का दृढ़ विश्वास
  • सब कुछ भगवान
  • आत्मान्छिेद
  • कार्यपन्णता

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है आचार्य बाड़ा विशिष्ट द्वैत वाद का उत्कृष्ट उदाहरण है तथा यह सम्प्रदाय अपने और ईश्वर को अलग मान अपने इष्ट की आराधना करता है।

प्रयागवाल

इतिहास में प्रसिद्ध तीर्थराज प्रयागराज की प्राचीनता के साथ-साथ प्रयागवालों का भी निकट का सम्बन्ध है। प्रयागराज के अति प्राचीन निवासी होने के कारण इनका नाम प्रयागवाल पड़ा। कुम्भ मेला व माघ मेला में आने वाले तीर्थयात्री प्रयागवाल द्वारा बसाये जाते रहे हैं और वे ही इनका धार्मिक कार्य करते हैं, जिसका विषद् वर्णन मत्स्य पुराण तथा प्रयाग महात्म्य में है। प्रयागराज में आने वाले प्रत्येक तीर्थयात्री का एक विशेष तीर्थ पुरोहित होता है। तीर्थयात्री और पुरोहित का सम्बन्ध गुरु-शिष्य परम्परा का द्योतक है। तीर्थयात्री के धार्मिक गुरु रूप माने जाने वाले इन प्रयागवालों को ही त्रिवेणी क्षेत्र में दान लेने का एक मात्र अधिकार है। जिला गजेटियर में मि० नेमिल ने लिखा है-

जो यात्री प्रयाग में आता है, उसका समस्त प्रकार का धार्मिक कर्मकाण्ड प्रयागवाल ही कराता है। सर्वप्रथम बेनीमाधव भेंट तत्पश्चात् संकल्प कराया जाता है। इसके बाद तीर्थयात्रियों का मुण्डन होता है। मुण्डन के पश्चात् स्नान और फिर पिण्ड दान, शय्यादान, गोदान व भूमिदान कराया जाता है। समस्त प्रकार के दान-उपदान प्रयागवाल द्वारा ही कराये जाते हैं। यात्रियों के परिवार की वंशावली उनसे सम्बन्धित तीर्थ पुरोहित की बही में मिलता है। प्रयागवालों के यजमान क्षेत्र व स्नान दान के आधार पर चलते हैं और यह अपने यजमानों की वंशावली सुरक्षित रखते हैं। तीर्थ पुरोहित अपने क्षेत्र के यजमानों की वंशावली तत्काल खोज लेते हैं। यजमान उनकी मोटी बहियों में अपने पूर्वजों के नाम, हस्ताक्षर आदि देखकर प्रसन्न होते हैं। प्रयागवाल शासन से मामूली शुल्क पर भूमि प्राप्त करता है, उस पर टेन्ट या कुटिया की व्यवस्था करता है। इसमें अपने तीर्थयात्रियों को ठहराता है और इससे दान स्वरूप जो लेता है, उसी से अपनी जीविका का निर्वाह करता है।

प्रयागवालों का संगठन प्रयागवाल सभा के नाम से जाना जाता है। यजमानों को टिकाने के लिए भूमि तथा संगम के निकट प्रयागवाल हेतु भूमि का आवंटन प्रयागवाल सभा के माध्यम से होता है। प्रयागवाल तख्तों की संख्या निश्चित है। प्रयागवाल अपने तख्त पर बहियों का बड़ा सा बक्सा रखते हैं तथा इन्हीं तख्तों पर आने वाले श्रद्धालुओं द्वारा धार्मिक अनुष्ठान एवं कर्मकाण्ड कराये जाते हैं। प्रयागवाल पहचान के लिए एक ऊँचे बाँस पर अपना निशान या झंडा लगाते हैं। तीर्थयात्री इसी झंडे को देखकर अपने प्रयागवाल के पास पहुँचते हैं।

कल्पवास

कुम्भ मेले के दौरान संगम तट पर कल्पवास का विशेष महत्व है। पद्म पुराण एवं ब्रह्म पुराण के अनुसार कल्पवास की अवधि पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी से प्रारंभ होकर माघ मास की एकादशी तक है। पद्म पुराण में महर्षि दत्तात्रेय ने कल्पवास की पूर्ण व्यवस्था का वर्णन किया है। उनके अनुसार कल्पवासी को इक्कीस नियमों का पालन करना चाहिए। ये नियम हैं – सत्यवचन, अहिंसा, इन्द्रियों का शमन, सभी प्राणियों पर दयाभाव, ब्रह्मचर्य का पालन, व्यसनों का त्याग, सूर्योदय से पूर्व शैय्या-त्याग, नित्य तीन बार सुरसरि-स्न्नान, त्रिकालसंध्या, पितरों का पिण्डदान, यथा-शक्ति दान, अन्तर्मुखी जप, सत्संग, क्षेत्र संन्यास अर्थात संकल्पित क्षेत्र के बाहर न जाना, परनिन्दा त्याग, साधु सन्यासियों की सेवा, जप एवं संकीर्तन, एक समय भोजन, भूमि शयन, अग्नि सेवन न कराना। जिनमें से ब्रह्मचर्य, व्रत एवं उपवास, देव पूजन, सत्संग, दान का विशेष महत्व है।

ब्रह्मचर्य

ब्रह्मचर्य का तात्पर्य है ब्रह्म में विचरण करना अर्थात स्वयं ब्रह्म होने की ओर अग्रसर हो जाना। सरल शब्दों में कहा जाए तो कामासक्ति का त्याग ही ब्रह्मचर्य है। जैसे विलासिता पूर्ण व्यसनों का त्याग, गरिष्ट भोज्य पदार्थों का त्याग, कम वासना का त्याग ब्रह्मचर्य पालन के मुख्य अंग हैं।

व्रत एवं उपवास

व्रत एवं उपवास कल्पवास का अति महत्वपूर्ण अंग है| कुम्भ के दौरान विशेष दिनों पर व्रत रखने का विधान किया गया है। व्रतों को दो कोटियों में विभाजित किया गया है – नित्य एवं काम्य। नित्य व्रत से तात्पर्य बिना किसी अभिलाषा के ईश्वर प्रेम में किये व्रतों से है, जिसकी प्रेरणा अध्यात्मिक उत्थान पे होती है। वहीँ काम्य व्रत किसी अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिए किये गये व्रत होते हैं। व्रत के दौरान धर्म के दसों अंगों का पूर्ण पालन किया जाना आवश्यक होता है। मनु के अनुसार ये दस धर्म हैं – धैर्य, क्षमा, स्वार्थपरता का त्याग, चोरी न करना, शारीरिक पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धिमता, विद्या, सत्य वाचन एवं अहिंसा। इसके सम्बन्ध में एक श्लोक में वर्णन भी मिलता है।

धृतिः क्षमा दमोअस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।

देव पूजन

ऐसी मान्यता हैं की कुम्भ के समय देवतागण स्वयं संगम तट पर विचरण करते हैं इस समय श्रद्धा भाव से उनका ध्यान करने से कल्याण होता है। देव पूजन में श्रद्धा का भाव सर्वोपरी है, यदि भक्ति में श्रद्धा का भाव ही न हो तो वह कदापि फलदायी नहीं होती।

दान

कुम्भ के दौरान दान का बड़ा महत्व है। यहाँ दान देने वाले एवं लेने वाले, दोनों को लाभ होता है अतः कुम्भ में दिया दान त्याग से भी श्रेष्ठ माना गया है। कुम्भ में गो-दान, वस्त्र दान, द्रव्य दान, स्वर्ण दान आदि का बड़ा महत्व है। सम्राट हर्षवर्धन तो यहाँ हर बारह वर्ष पर अपना सर्वस्व दान दे देते थे।

सत्संग

सत्संग का शाब्दिक अर्थ है सत्य की संगत में रहना। कुम्भ के समय श्रद्धालुओं को सन्तों के सानिध्य में रहना चाहिए, उनके प्रवचनों को सुनना चाहिए, निस्वार्थ भाव एवं ऊंच-नीच का आडम्बर समाप्त हो सके और मनुष्य उत्कृष्ट जीवन उद्देश्य की ओर अग्रसर हो सके ।

श्राद्ध एवं तर्पण

श्राद्ध से तात्पर्य श्रद्धा पूर्वक पितरों को पिण्ड दान देने से है। श्राद्धकर्म पुरोहितों के माध्यम से कराया जाने वाला कर्म है। जिसके लिए प्रयागराज में विशेषकर पुरोहित होते हैं जिनके पास श्राद्ध कर्म करवाने हेतु आये व्यक्ति की वंशावली होती है। तर्पण कर्म के लिए पुरोहित की अनिवार्यता नहीं होती यदि व्यक्ति समूचित प्रक्रिया का समस्त सम्पादन कर सकता है तो यह कर्म स्वयंद्वारा भी किया जा सकता है।

वेणी-दान

प्रयागराज में वेणी दान का बड़ा महत्व है। इसमें व्यक्ति अपनी शिखा के बाल छोड़कर समस्त बाल गंगा में अर्पित कर देता है। ऐसी मान्यता हैं की केश के मूल में पाप निवास करता है ऐसे में लोकमान्यता है कि प्रयाग में कुम्भ मेले से बेहतर स्थान व समय वेणी दान के लिए नहीं हो सकता है।

कल्पवास के दौरान साफ सुथरे श्वेत वस्त्रो को धारण करना चाहिए। पीले एव सफ़ेद रंग का वस्त्र श्रेष्ठकर होता है। इस प्रकार से आचरण कर मनुष्य अपने अंतःकरण एवं शरीर दोनों का कायाकल्प कर सकता है।

  • ये सारी जानकारी https://kumbh.gov.in/ से ली गई है, आप इस वेबसाइट पर जाकर और सूचना पा सकते है। 

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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December 27, 2018 11 min read
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