जानिये क्यूँ मनाया जाता है……..गुड फ्राइडे
गुड फ्राइडे के दिन ईसाई धर्म को मानने वाले अनुयायी गिरजाघर जाकर प्रभु यीशु को याद करते हैं. आज 30 मार्च को गुड फ्राइडे मनाया जा रहा है. दरअसल ‘ऐश वेडनस्डे’ से शुरू होकर ‘गुड फ्राइडे’ तक ये दौर चलता है जिसे ‘लेंट’ भी कहा जाता है। इस दिन गिरिजाघरों में जिस सूली (क्रॉस) पर प्रभु यीशु को चढ़ाया गया था, उसके प्रतीकात्मक रूप को सभी भक्तों के लिए गिरजाघरों में रखा जाता है। जिसे सभी अनुयायी एक-एक कर आकर चूमते हैं. दरअसल आज का दिन इसाई समुदाय के लिए थोडा दुःख भरा होता है. श्रद्धालु प्रभु यीशु द्वारा तीन घंटे तक क्रॉस पर भोगी गई पीड़ा को याद करते हैं. रात के समय कहीं-कहीं काले वस्त्र पहनकर श्रद्धालु यीशु की छवि लेकर मातम मनाते हुए एक चल समारोह निकालते हैं और प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार भी किया जाता है. चूँकि गुड फ्राइडे प्रायश्चित्त और प्रार्थना का दिन है अतः इस दिन गिरजाघरों में घंटियां नहीं बजाई जातीं.
गुड फ्राइडे को अलग अलग नाम से जानते हैं
गुड फ्राइडे को होली फ्राइडे, ब्लैक फ्राइडे और ग्रेट फ्राइडे भी कहते हैं. यह त्यौहार ईसाई धर्म के लोगों द्वारा कैलवरी में ईसा मसीह को सलीब पर चढ़ाने के कारण हुई मृत्यु के उपलक्ष्य में मनाया है. यह त्यौहार पवित्र सप्ताह के दौरान मनाया जाता है, जो ईस्टर सन्डे से पहले पड़ने वाले शुक्रवार को आता है और इसका पालन पाश्कल ट्रीडम के अंश के तौर पर किया जाता है और यह अक्सर यहूदियों के पासोवर के साथ पड़ता है.
चालीस दिन पूर्व शुरू हो जाती है तैयारी
ईसा के पुनरुत्थान के तीन दिन पूर्व पड़ने वाले शुक्रवार को गुड फ्राइडे के रूप में मनाया जाता है. इस दिन भक्तगण उपवास के साथ प्रार्थना और मनन करते हैं. चर्च एवं घरों से सजावट की वस्तुएं हटा ली जाती हैं या उन्हें कपडे़ से ढक दिया जाता है. गुड फ्राइडे की तैयारी प्रार्थना और उपवास के रूप में चालीस दिन पहले ही प्रारम्भ हो जाती है. इस दौरान शाकाहारी और सात्विक भोजन पर जोर दिया जाता है. गुड फ्राइडे के दिन ईसा के अन्तिम सात वाक्यों की विशेष व्याख्या की जाती है जो क्षमा, मेल-मिलाप, सहायता और त्याग पर केन्द्रित हैं.
कैसे मनाया जाता है गुड फ्राइडे?
रोमन कैथोलिक चर्च गुड फ्राइडे को उपवास दिवस के तौर पर मानता है, जबकि चर्च के लैटिन संस्कारों के अनुसार एक बार पूरा भोजन हालांकि वह नियमित भोजन से कम होता है और अक्सर उसमें मांस के बदले मछली खायी जाती है और दो कलेवा यानी अल्पाहार लिया जाता है.
रोमन रीति के अनुसार सामान्यतः पवित्र बृहस्पतिवार की शाम को प्रभु के भोज के उपरांत कोई मास उत्सव नहीं होता जब तक कि ईस्टर निगरानी की अवधि बीत न जाये. प्रभु ईसा मसीह के स्मरण में भोज का कोई उत्सव नहीं होता और वह केवल पस्सिओं ऑफ़ द लोर्ड के सर्विस के दौरान भक्तों में वितरित किया जाता है.
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