ईसाई धर्म में क्रिसमस और ईस्टर का विशेष महत्व है। ईसाई धर्म ग्रंथ अनुसार, 25 दिसंबर को क्रिसमस डे अथवा प्रभु यीशु का जन्मदिन मनाया जाता है। वहीं, गुड फ्राइडे के तीन दिन बाद ईस्टर संडे मनाया जाता है।
ऐसी मान्यता है कि इस दिन प्रभु यीशु कब्र से जीवित हो उठें। इस साल 12 अप्रैल को ईस्टर मनाया जा रहा है। इस दिन प्रभु यीशु के पुनः जीवित होने पर जश्न और उत्सव मनाया जाता है।
ईस्टर का महत्व
ईसाई धर्म में ईस्टर अति पवित्र पर्व है। इस दिन घरों और गिरिजाघरों में प्रार्थना सभा की जाती है जिसमें प्रभु की महिमा का बखान किया जाता है।
लोग एक दूसरे को प्रभु यीशु के पुनर्जन्म की शुभकामनाएं देते हैं। हालांकि, कोरोना वायरस महामारी के कारण इस साल लोग घरों में रहकर ही ईस्टर डे मना रहे हैं।
ईस्टर संडे की ऐतिहासिक कथा
धार्मिक ग्रंथों में निहित है कि जब प्रभु यीशु को शूली पर चढ़ाया गया तो उनके अनुयायियों में निराशा की लहर दौड़ गई। इसके तीन दिन बाद संडे के दिन वें कब्र से जीवित हो उठें।
प्रभु यीशु के शोक संतप्त अनुयायी अपने घरों में प्रभु यीशु को स्मरण कर रहे थे। तभी उनके पास एक महिला आई और बोली-प्रभु जीवित हो उठें हैं। यह सुन अनुयायियों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। उन्होंने महिला से विस्तार में सब कुछ बताने को कहा।
इसके बाद उस महिला ने कहा-जब वह प्रार्थना करने कब्र पर गई तो देखा कि कब्र का पत्थर अपने स्थान पर नहीं हैं और प्रभु का पार्थिव शरीर कब्र में मौजूद नहीं था।
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उस समय कब्र से देवदूत प्रकट होकर बोले-तुम प्रभु की प्रार्थना करने यहां आई हो। जबकि प्रभु तो जीवित हो उठें हैं। उन्हें कब्र में नहीं अपने आस-पास ढूंढो, वे वहीं मिलेंगे।
इसके बाद देवदूत गायब हो गए। यह सुन वह रोने लगी तभी प्रभु प्रकट होकर बोले-मत रो, मैं जीवित हो उठा हूं। जाओ सबसे कह दो कि परम पिता परमेश्वर के संतान पुनः धरती पर आ गए हैं।
यह कहकर प्रभु अदृश्य हो गए। इस दिन से हर साल गुड फ्राइडे के तीन दिन बाद ईस्टर मनाया जाता है।
प्रभु यीशु का स्वर्ग प्रस्थान ऐसा कहा जाता है कि प्रभु यीशु जीवित होने के बाद 40 दिनों तक धरती पर रहें और इसके बाद पुनः स्वर्ग लोक को लौट गए। इस दरम्यान उन्होंने अपने शिष्यों को ज्ञान के उपदेश दिए और उन्हें धर्म, कर्म, शांति एवं मानवता का पाठ पढ़ाया।
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