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पितरों को श्रद्धा दें, वे शक्ति देंगे : पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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पितरों को श्रद्धा दें, वे शक्ति देंगे : पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी

पितरों को श्रद्धा दें, वे शक्ति देंगे : पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी

प्राणियों का शास्त्रीय वर्गीकरण शरीरधारी और अशरीर दो भागों में किया गया है। अशरीरी वर्ग में— (1) पितर (2) मुक्त (3) देव (4) प्रजापति हैं। शरीरधारियों में (1) उद्भिज (2) स्वेदज (3) अंडज (4) जरायुज हैं।

चौरासी लाख योनियां शरीरधारियों की हैं। वे स्थूल जगत में रहती हैं और आंखों से देखी जा सकती हैं। दिव्य जीव जो आंखों से नहीं देखे जा सकते हैं उनका शरीर दिव्य होता है। सूक्ष्म जगत में रहते हैं। इनकी गणना तत्वदर्शी मनीषियों ने अपने समय में 33 कोटि की थी। तेतीस कोटि का अर्थ उनके स्तर के अनुरूप तेतीस वर्गों में विभाजित किये जा सकने योग्य भी होता है। कोटि का एक अर्थ वर्ग या स्तर होता है। दूसरा अर्थ है—करोड़। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि उस दिव्य सत्ताधारियों की गणना तेतीस करोड़ की संख्या में सूक्ष्मदर्शियों ने की होगी। जो हो उनका अस्तित्व है—कारण और प्रभाव भी।

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जीवों के विकास क्रम को देखने से पता चलता है कि कितनी ही प्राचीन जीव जातियां लुप्त होती हैं और कितने ही नये प्रकार के जीवधारी अस्तित्व में आते हैं। फिर देश काल के प्रभाव से भी उनकी आकृति प्रकृति इतनी बदलती रहती है कि एक वर्ग को ही अनेक वर्गों का माना जा सके। फिर कितने ही जीव ऐसे हैं जिन्हें अनादि काल से जन-सम्पर्क से दूर अज्ञात क्षेत्रों में ही रहना पड़ा है और उनके सम्बन्ध में मनुष्य की जानकारी नहीं के बराबर है। कुछ प्राणी ऐसे हैं जो खुली आंखों से नहीं देखे जा सकते। सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से ही उन्हें हमारी खुली आंखें देख सकती हैं। इतने छोटे होने पर भी उनका जीवन-क्रम अन्य शरीरधारियों से मिलता जुलता ही चलता रहता है।

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अपनी पृथ्वी बहुत बड़ी है उस पर रहने वाले जलचर— थलचर— नभचर कितने होंगे, इसकी सही गणना कर सकना स्थूल बुद्धि और मोटे ज्ञान साधनों से सम्भव नहीं हो सकती, केवल मोटा अनुमान ही लगाया जा सकता है, पर सूक्ष्मदर्शियों के असाधारण एवं अतीन्द्रिय ज्ञान से साधारणतया अविज्ञान समझी जाने वाली बातें भी ज्ञात हो सकती हैं। ऋषियों की सूक्ष्म दृष्टि ने अपने समय में जो गणना की होगी उसे अविश्वसनीय ठहराने का कोई कारण नहीं जब कि जीवन शास्त्रियों की अद्यावधि खोज ने भी लगभग उतनी ही योनियां गिनली हैं। इसमें कुछ ही लाख की कमी है जो शोध प्रयास जारी रहने पर नवीन उपलब्धियों के अनवरत सिलसिले को देखते हुए कुछ ही समय में पूरी हो सकती है, वरन् उससे भी आगे निकल सकती है।

लेखक – पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

साभार – ऑल वर्ल्ड गायत्री परिवार (AWGP)


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September 12, 2017 3 min read
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