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क्यों महत्वपूर्ण है कल्पवास? जानिये कल्पवास का पौराणिक महत्त्व और वैज्ञानिक आधार

क्यों महत्वपूर्ण है कल्पवास? जानिये कल्पवास का पौराणिक महत्त्व और वैज्ञानिक आधार

क्यों महत्वपूर्ण है कल्पवास? जानिये कल्पवास का पौराणिक महत्त्व और वैज्ञानिक आधार
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क्यों महत्वपूर्ण है कल्पवास? जानिये कल्पवास का पौराणिक महत्त्व और वैज्ञानिक आधार

क्यों महत्वपूर्ण है कल्पवास ? जानिये इसका पौराणिक महत्त्व और वैज्ञानिक आधार

ठिठुरती सर्दी में गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के मिलन स्थल पर कल्पवास की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। तीर्थराज प्रयाग में संगम के निकट हिन्दू माघ महीने में कल्पवास करते हैं। मान्यता है कि प्रयाग में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ शुरू होने वाले एक मास के  एक कल्प अर्थात ब्रह्मा के एक दिन का पुण्य मिलता है। इस वर्ष  2 जनवरी को पौष पूर्णिमा के साथ आरंभ हो चुका है। वहीं कुछ लोग मकर संक्रांति से भी आरंभ करते हैं।

आइए जानते हैं कल्पवास दरअसल है क्या? उसका पौराणिक महत्व क्या है। क्या इसका कोई वैज्ञानिक आधार भी है। आइये जानते हैं…

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अर्थ

कल्पवास का अर्थ होता है संगम के तट पर निवास कर वेदाध्ययन और ध्यान करना। प्रयाग इलाहाबाद कुम्भ मेले में कल्पवास का अत्यधिक महत्व माना गया है। कल्पवास पौष माह के 11वें दिन से माघ माह के 12वें दिन तक रहता है।

क्यों और कब से

कल्पवास वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है। कल्पवास का विधान हजारों वर्षों से चला आ रहा है। जब तीर्थराज प्रयाग में कोई शहर नहीं था तब यह भूमि ऋषियों की तपोस्थली थी। प्रयाग में गंगा-जमुना के आसपास घना जंगल था। इस जंगल में ऋषि-मुनि ध्यान और तप करते थे. ऋषियों ने गृहस्थों के लिए का विधान रखा। उनके अनुसार इस दौरान गृहस्थों को अल्पकाल के लिए शिक्षा और दीक्षा दी जाती थी।

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क्या है नियम

कल्पवास के दौरान जो भी गृहस्थ कल्पवास का संकल्प लेकर आया है वह पर्ण कुटी (झोपड़ी)में रहता है। इस दौरान दिन में एक ही बार भोजन किया जाता है तथा मानसिक रूप से धैर्य, अहिंसा और भक्तिभावपूर्ण रहा जाता है।

पद्म पुराण में इसका उल्लेख है। संगम तट पर वास करने वाले को सदाचारी, शान्त मन वाला तथा जितेन्द्रिय होना चाहिए। कल्पवासी के मुख्य कार्य है:-

  • तप

  • होम

  • दान

यहां झोपड़ियों (पर्ण कुटी) में रहने वालों की दिनचर्या सुबह गंगा-स्नान के बाद संध्यावंदन से प्रारंभ होती है और देर रात तक प्रवचन और भजन-कीर्तन जैसे आध्यात्मिक कार्यों के साथ समाप्त होती है।

लाभ – ऐसी मान्यता है कि जो कल्पवास की प्रतिज्ञा करता है वह अगले जन्म में राजा के रूप में जन्म लेता है लेकिन जो मोक्ष की अभिलाषा लेकर कल्पवास करता है उसे अवश्य मोक्ष मिलता है।

विधि

कल्पवास की शुरुआत के पहले दिन तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजन होती है। कल्पवासी अपने टेंट के बाहर जौ का बीज रोपित करता है। कल्पवास की समाप्ति पर इस पौधे को कल्पवासी अपने साथ ले जाता है. जबकि तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।

वैज्ञानिक कसौटी पर कल्‍पवास 

यदि वैज्ञानिक कसौटी पर कसा जाए तो पता चलता है कि हमारा शरीर जब रोग फैलाने वाले बैक्टीरिया, वायरस जैसे सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आते हैं तो हमारा शरीर उनके खिलाफ एंटीबॉडी बनाता है। एंटीबॉडी प्रोटीन के बने वे कण हैं जो हमारे शरीर की कोशिकाओं में बनते हैं और बीमारियों से शरीर की रक्षा करते हैं। कुंभ स्नान और कल्पवास के जरिए कल्पवासियों का शरीर पहले तो प्रकृति में कल्पवास करने आए दूसरे कल्पवासियों के शरीर में मौजूद नए रोगों और रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनके शरीरों में इन रोगों के खिलाफ एंटीबॉडीज बननी शुरू हो जाती हैं। बार-बार स्नान करने से शुरूआती दिनों में ही शरीर में बड़ी मात्रा में एंटीबॉडी बनती हैं। इसका असर यह होता है कि शरीर में रोग पनप नहीं पाता बल्कि उसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पैदा होने लगती है। इस तरह से डेंगू, चिकनगुनिया, टीबी और ऐसी दूसरी बीमारियों के खिलाफ शरीर मजबूत हो जाता है।

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Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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January 10, 2019 4 min read
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