बच्चों के लिए क्या है धर्म का अर्थ ?
आज 14 नवम्बर है यानि बाल दिवस. आप सब सोच रहे होंगे कि रिलिजन वर्ल्ड में बाल दिवस से सम्बंधित लेख क्यों? दरअसल यहां आज हम आपको यह बताने का प्रयास करेंगे की बच्चों के लिए धर्म का अर्थ क्या है.
मेरी बेटी 6 साल की है जिसे शायद धर्म का सही अर्थ नहीं पता होगा लेकिन उसने मुझसे कहा, कि स्कूल में “Our Festivals” चैप्टर पढाया गया है जिसमें हर धर्म के त्यौहार और देवस्थलों की जानकारी दी गयी थी. यहाँ उनको धर्म को त्यौहार से जोड़ कर पढाया गया. तो मेरी समझ से मेरी बेटी की सोच धर्म को लेकर यही तक सीमित रहेगी, जब तक मैं या उसके शिक्षक उसे इससे आगे की जानकारी नहीं देंगे.
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दिनेश जोशी जी ने बताया कि उनके बच्चे के लिए धर्म वही है जो आसानी से जीना सिखा दे . उनकी इस बात से मैं सहमत हूँ. मेरे हिसाब से धर्म रुढियों से, परम्पराओं और कट्टरपंथी विचारों से नहीं बंधा होना चाहिए. उसमें खुल के जीने की आज़ादी होनी चाहिए.
सक्षम गुप्ता नाम के बच्चे ने भी अपना मत रखा, उसने कहा, “धर्म मुझे यह सिखाता है कि कभी भी कुछ छल कपट न करना, दूसरों से कभी कोई चीटिंग न करना, गलत काम न करना, हमेशा सही रस्ते पर चलना, बड़ों से मार्गदर्शन लेना.”
इस कोट से आप सब एक बात तो समझ चुके होंगे कि बच्चों का मन निश्चल होता है. हम जो बच्चों को आम जीवन में सिखाते है उसे ही वो आत्मसात कर लेते हैं जैसे हम बच्चों से कहते हैं झूठ नहीं बोलना चाहिए या चोरी नहीं करनी चाहिए नहीं तो भगवन जी नाराज़ हो जायेंगे या फिर अगर आपने कोई गलत काम किया तो भगवन आपको पनिश करेंगे. एक तरह से देखा जाये तो धर्म को डर बनाकर हम बच्चे को कुछ सिखा रहे हैं लेकिन वहीँ इसका सकारात्मक पहलु देखें तो बच्चे अपने आसपास के समाज से जुड़े रहकर धर्म को आत्मसात कर रहे और मेरी नज़र में यह गलत भी नहीं है.
राजेश शुक्ल जी ने अपने बच्चों से जब धर्म का अर्थ पूछा तो उनकी बेटी मैत्रयी शुक्ला ने जवाब दिया, “धर्म का मतलब यह होता है,जब हम किसी व्यक्ति को पूजते ही नही हैं वल्कि उसी की राह पर चलते हैं और साथ ही साथ इसके कई रूप हैं जैसे गुरुनानक,विष्णु जी,लॉर्ड बुद्ध जी”।
वहीँ उनके बेटे यथार्थ शुक्ल का जवाब था, “धर्म सुकून देता है.” सोचिये अगर धर्म बच्चों को सुकून देने लगे तो धर्म का स्वरुप स्वयं ही सार्थक हो गया.
बाल मनोचिकित्सक प्रांजलि मल्होत्रा से रिलिजन वर्ल्ड ने बात की. उन्होंने कहा कि “बच्चों पर धर्म थोपना नहीं चाहिए बल्कि धर्म के सामाजिक सरोकारों से उन्हें परिचित कराना चाहिए.” उन्होंने आगे कहा, “बच्चों का मन गीली मिटटी के सामान होता है आप उन्हें जिस रंग में ढालेंगे वो ढल जायेंगे, ऐसे में समाज की, स्कूलों की, और माता-पिता सभी की यह नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वो अलग अलग धर्म के बारे में नहीं बल्कि धर्म के स्वरुप से बच्चों का परिचय कराएं.”
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जहां तक मेरा विचार है तो हर धर्म किसी न किसी संस्कृति से जुड़ा हुआ है और हम सभी को अपने बच्चों में इन्ही संस्कृति का बीजारोपण करना है. संस्कृति किसी भी धर्म की क्यूँ न हो वो एक दुसरे से जोड़ना सिखाती है. धर्म कोई भी हो किसी न किसी माध्यम से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. तो हमें चाहिए कि अपने बच्चों को धर्म की एक नयी परिभाषा सिखाएं जिसमें सामाजिक और सांस्कृतिक सद्भाव नज़र आये और किसी भी प्रकार का वैमनस्य उनको छूने भी न पाए.
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