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स्वयं को धार प्रदान करने का पुण्य पर्व है, “नवरात्रि”

स्वयं को धार प्रदान करने का पुण्य पर्व है, “नवरात्रि”

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स्वयं को धार प्रदान करने का पुण्य पर्व है, “नवरात्रि”

स्वयं को धार प्रदान करने का पुण्य पर्व है, “नवरात्रि”

स्वजागरण और आत्म बोध का काल है, नवरात्रि, जो प्राचीन काल में अहोरात्रि के नाम से प्रख्यात थी। यह स्वयं से और अपनी ऊर्जा से रूबरू होने की घड़ी है। जंबूद्वीप के भारत खण्ड में अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक का काल नवरात्रि के रूपमें मनाये जाने की परम्परा के सूत्र प्रागैतिहासिक काल से प्राप्त होते हैं। दो ऋतुओं के संधिकाल का यह नौ दिनों का बेहद लंबा पर्व स्वयं में बेहद विलक्षण और अदभुत है। इस पर्व को देवी ‘अम्बा’ का पर्व कहा गया है। अम्बा शब्द ‘अम्म’ और ‘बा’ के युग्म से बना है। कुछ द्रविड़ भाषाओं में अम्म का अर्थ जल और बा का मतलब अग्नि से है। लिहाज़ा अम्बा का शाब्दिक अर्थ बनता है, जल से उत्पन्न होने वाली अग्नि अर्थात् विद्युत। इसलिये कहीं कहीं नवरात्रि को विद्युत की रात्रि यानि शक्ति की रात्रि भी कहा जाता है

नवरात्रि की प्रत्येक रात्रि हमारी स्वयं की सुप्त आंतरिक क्षमताओं और ऊर्जाओं के भिन्न भिन्न पहलुओं को उद्घाटित करती है, जिसे मान्यतायें नौ प्रकार की शक्तियों या देवियों की संज्ञा देती है। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी , कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री, ये दरअसल किसी अन्य लोक में रहने वाली देवी से पहले हमारी अपनी ही ऊर्जा के नौ विलक्षण स्वरूप हैं।

शैलपुत्री अपनें अस्त्र त्रिशूल की भाँति हमारे त्रीलक्ष्य, धर्म, अर्थ और मोक्ष के साथ मनुष्य के मूलाधार चक्र पर सक्रीय बल है, वहीं ब्रह्मचारिणी अपनी कमंडल यानि पूर्व कर्म या प्रारब्ध और माला अर्थात् नवीन कर्म के साथ कुंडलिनी शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वाधिष्ठान चक्र की शक्ति हैं। हमारे मणिपुर चक्र अर्थात् नाभि चक्र की ऊर्जा चंद्रघंटा जीवन के ढेरों सुगंधों और ब्रम्हाण्डिय ध्वनियों के संग अपने हस्त के बंद कमल के रूप में कीचड़ में भी पवित्रता व स्निग्धता के साथ अनेक लक्ष्य के साथ भी एकजुटता की द्योतक हैं, वहीं अनाहत चक्र यानि ह्रदय चक्र पर गतिशील ऊर्जा, कूष्माण्डा के हाथ के शस्त्र, कमंडल, पुष्प,अमृत कलश, चक्र व गदा के साथ धनुष-बाण अनेक माध्यमों से समस्त सिद्धियों और निधियों को समेट कर एक लक्ष्य की ओर अग्रसर होने का संकेत है। विशुद्ध चक्र यानि कंठ चक्रपर क्रियाशील शक्ति स्कन्दमाता अपने हस्त के खिलते पंकज के रूप में एक केंद्र पर चेतना के विस्तार को परिलक्षित करती है।आज्ञा चक्र की ऊर्जा, जो कात्यायनी कहलाती है, अपने अस्त्र तलवार के धार की तरह तीसरे तिल से आगे बढ़ कर जीवात्मा को अपने तत्व शब्द को थाम कर अपनी परम चेतना सदगुरु यानि प्रभु में समाहित होने की प्रेरणा देती है। कालरात्रि मुख्यतः सहस्त्रार चक्र का निचला बल है, जो अपने शस्त्र कृपाण से हमारे बन्धनों को काट कर, काल (समय) जिन्हें इस जगत का ईश्वर भी कहा जाता है, की सहमति और कृपा प्रदान करके जीवात्मा को इस स्थूल शरीर से परे जाने के लिए प्रेरित करती है। महागौरी सहस्त्रार चक्र की मध्यशक्ति है, जो अभय मुद्रा, वर मुद्रा, डमरू और शूल से हमें महाध्वनि अर्थात् परम नाद से जोड़ने में सहायक होती है।सहस्त्रार की उच्च ऊर्जा सिद्धिदात्री अपनी अष्टसिद्धियों, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्यप, ईशित्व और वशित्व की सहायता से हमें तृतीय द्वार से आगे बंकनाल तक सदगुरु में मिलाकर इस निचली परत के ऊपर मोक्ष की ओर गति प्रदान करती है।

यह पर्व नितांत वैज्ञानिक अवधारणों पर विकसित है। अपूर्ण आध्यात्मिक सामान्य ज्ञान इसे शक्ति प्राप्त करने से, लड़ने और संघर्ष के विस्तार से जोड़ कर देखता है। संघर्ष का अर्थ बाह्य युद्ध नहीं है, ना ही शक्ति प्राप्ति का अर्थ किसी देवी के खाते से शक्ति का स्थानांतरण है। यहां शक्ति से आशय स्वयं की महाऊर्जा से है, अंतर्मन की शक्ति से है।

नवरात्रि का दिव्य पर्व शक्ति को किसी पंडाल में स्थापित करने से ज़्यादा बाहर बिखरी हुई अपनी ही ऊर्जा को खुद में समेटने की बेला है। इसकी त्रिरात्रि स्वपरिचय और ज्ञान बोध की, तीन रात शक्ति संकलन और संचरण यानी फैलाव की और त्रिनिशा अर्थ प्राप्ति की कही गयी हैं। ये नौ दिन किसी तलवार को नहीं, स्वयं को धार प्रदान करने की अदभुत बेला है। वैज्ञानिक चिंतन कहता है कि हम बाह्य मस्तिष्क का सिर्फ़ कुछ प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाते हैं। हमारे बाह्य मस्तिष्क यानि चेतन मस्तिष्क से हमारा अचेतन मस्तिष्क नौगुणा ज़्यादा क्षमतावान है। इसलिए समस्त आध्यात्मिक साधनायें स्वयं में जाने की ही अनुशंसा करती है। आध्यात्म में नवरात्रि का पर्व अपने उसी नौ गुनी क्षमता के पुनर्परिचय का काल है।

सदगुरु श्री

(स्वामी  आनन्द जी)

आध्यात्मिक गुरु 

saddgurushrii@saddguru.com

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September 20, 2017 5 min read
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