महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के दर्शन को पहुंचे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत

- प्राप्त पाथेय रूपी चाबी से खुलते हैं सभी ताले: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
- महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के दर्शन को पहुंचे आर.एस.एस. प्रमुख
- आचार्यश्री ने गुस्से को शांत करने की दी पावन प्रेरणा
- महाश्रमणी साध्वीप्रमुखाजी ने श्रद्धालुओं को किया उत्प्रेरित
23.07.2018 माधावरम, चेन्नई (तमिलनाडु): वर्ष में एकबार आचार्यश्री की सन्निधि में उपस्थित होना, मेरा एक नियम है। यहां आकर हमें वह चाबी (पाथेय) प्राप्त हो जाता है, जिससे सभी ताले खुल जाते हैं। यहां से जो पाथेय प्राप्त होता है उससे केवल स्वयं का ही नहीं, अपितु घर-गृहस्थी को संभालने और देश व समाज को भी संभालने में यहीं उपयोग साबित होता है। सत्य को मानने वाले राष्ट्रसंत हमारे मार्गदर्शक हैं। आपकी प्रेरणा से देश व समाज को एक नई दिशा प्राप्त होती है। मैं ऐसे महातपस्वी महाश्रमणजी को बारम्बार प्रणाम करता हूं। उक्त उद्गार सोमवार को चेन्नई महानगर के माधावरम के चतुर्मास प्रवास स्थल परिसर में बने महाश्रमण समवसरण से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सरसंघचालक (आर.एस.एस. प्रमुख) श्री मोहन भागवत में आचार्यश्री के दर्शन करने व मंगल प्रवचन श्रवण के उपरान्त व्यक्त किए।

दक्षिण की धरा चेन्नई में पहली बार अपना चतुर्मास करने के लिए माधावरम में बने भव्य चतुर्मास प्रवास स्थल में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि अहिंसा यात्रा के प्रणेता विराजमान हो चुके हैं। आचार्यश्री के यहां विराजते ही मानों यह जगह तीर्थस्थल बन गई है और इस तीर्थस्थल में गोते लगाने सबसे पहले विशिष्ट महानुभावाओं का मानों तांता सा लगा हुआ है। प्रवेश के दिन सर्वप्रथम तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने आचार्यश्री के दर्शन किए तो दूसरे दिन तमिलनाडु के प्रथम नागरिक के रूप में महामहिम राज्यपाल ने आचार्यश्री के दर्शन कर पावन पथदर्शन प्राप्त किया।

इसी क्रम में सोमवार को आचार्यश्री की मंगल सन्निधि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख श्री मोहन भागवत पहुंचे। हालांकि आर.एस.एस. प्रमुख तो प्रत्येक वर्ष दर्शन करते हैं। चतुर्मास प्रवास स्थल में बने भव्य महाश्रमण समवसरण के पंडाल में आचार्यश्री का मंगल पदार्पण हुआ। आचार्यश्री ने नमस्कार महामंत्र उच्चरित किया। उसके कुछ मिनटों के पश्चात ही आर.एस.एस. प्रमुख श्री मोहन भागवत आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पधारे। आचार्यश्री के वन्दन करने के उपरान्त मंचासीन हुए। महाश्रमणी साध्वीप्रमुखाजी ने लोगों को पुरुषार्थ करने के लिए उत्प्रेरित किया।

आचार्यश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के जीवन में एक शत्रु गुस्सा है। आदमी को गुस्से से बचने का प्रयास करना चाहिए। अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में आदमी को समान रहने का प्रयास करना चाहिए। अच्छा कार्य करने वाले आदमी पर भी आरोप लगते हैं। कभी किसी का उलाहना भी सुनना भी पड़ सकता है। इन सबके बावजूद आदमी को अपने गुस्से को कम करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को शांति से सोचकर काम करने का प्रयास करना चाहिए। उपशम की साधना के द्वारा आदमी को गुस्से को कम करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने गुस्से को कम करने के लिए श्रद्धालुओं को मंत्र भी प्रदान किया। इसके पूर्व मुख्यमुनिश्री ने गीत का संगान किया। श्री कपूरचंद सेठिया व श्री प्यारेलाल पितलिया ने पुस्तक को श्रीचरणों में समर्पित किया। चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री ललित दूगड़ ने भावाभिव्यक्ति दी। चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री धर्मचंद लूंकड़ व आदि ने आर.एस.एस. प्रमुख को स्मृतिचिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया।



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Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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