RELIGION WORLD — THE INDEPENDENT SCIENTIFIC & INTERFAITH JOURNAL
Navigation

© 2026 Religion World Foundation.

Global Faith • Scientific Heritage • Human Ethics

भगवान महावीर जयंती पर पढ़िए उनके सिद्धांत

भगवान महावीर जयंती पर पढ़िए उनके सिद्धांत

भगवान महावीर जयंती पर पढ़िए उनके सिद्धांत
Visual Archive

भगवान महावीर जयंती पर पढ़िए उनके सिद्धांत

भगवान महावीर जयंती पर पढ़िए उनके सिद्धांत

अहिंसा

प्राणियों को नहीं मारना, उन्हे नहीं सताना। जैसे हम सुख चाहते हैं, कष्ट हमें प्रीतिकर नहीं लगता, हम मरना नहीं चाहते, वैसे ही सभी प्राणी सुख चाहते हैं कष्ट से बचते हैं, और जीना चाहते हैं। हम उन्हें मारने/सताने का भाव मन में न लायें, वैसे वचन न कहें और वैसा व्यवहार/कार्य भी ना करें। मनसा, वाचा, कर्मणा प्रतिपालन करने का महावीर का यही अहिंसा का सिद्धांत है। अहिंसा, अभय और अमन चैन का वातावरण बनाती है।इस सिद्धांत का सार-सन्देश यही है कि प्राणी-प्राणी के प्राणों से हमारी संवेदना जुडे और जीवन उन सबके प्रति सहायी/सहयोगी बनें।

तोप, तलवार से झुका हुआ इंसान एक दिन ताकत अर्जित कर पुनः खडा हो जाता है।

अनेकांत

भगवान महावीर का दूसरा सिद्धांत अनेकांत का है। अनेकांत का अर्थ है- सह-अस्तित्व, सहिष्णुता, अनुग्रह की स्थिति। इसे ऐसा समझ सकते हैं कि वस्तु और व्यक्ति विविध धर्मी हैं।

अपरिग्रह

भगवान महावीर का तीसरा सिद्धांत अपरिग्रह का है। अर्थात संग्रह- यह संग्रह मोह का परिणाम है। जो हमारे जीवन को सब तरफ से घेर लेता है, जकड लेता है, परवश/पराधीन बना देता है वह है परिग्रह। धन पैसा आदि लेकर प्राणी के काम में आने वाली तमाम वस्तु/सामग्री परिग्रह की कोटि में आती है।

आत्म स्वातंत्र्य

भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित एक सिद्धांत आत्म स्वातंत्र्य का है, इसे ही अकर्तावाद या कर्मवाद कहते हैं। अकर्तावाद का अर्थ है – ‘ किसी ईश्वरीय शक्ति/सत्ता से सृष्टि का संचालन नहीं मानना।‘ यह सिद्धांत इसलिये भी प्रासंगिक है कि हमें अपने किये गये कर्म पर विश्वास हो और उसका फल धैर्य, समता के साथ सहन करें। वस्तु का परिणमन स्वतंत्र/स्वाधीन है।

मन में कर्तव्य का अहंकार ना आये और ना ही किसी पर कर्तव्य का आरोप हो। इस वस्तु-व्यवस्था को समझ कर शुभाशुभ कर्मों की परिणति से पार हो आत्मा की स्वच्छ दशा को प्राप्त करें। बस यही धर्म का चतुष्टय भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांतों का सार है। व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है, यह उद्घोष भी महावीर की चिंतन धारा को व्यापक बनाता है। इसका आशय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति मानव से महामानव, कंकर से शंकर और भील से भगवान बन सकता है। नर से नारायण और निरंजन बनने की कहानी ही महावीर का जीवन दर्शन है।

श्रीमती सुशीला पाटनी
आर. के. हाऊस, मदनगंज- किशनगढ

साभार – http://www.vidyasagar.net/

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

Religion World provides information on all religions and presents it impartially. You can send us information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com. You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.

March 28, 2018 2 min read
Share:

Related Historical & Critical Essays

Jainism

वर्धमान से महावीर तक: सच्चे वीर की कथा

वर्धमान से महावीर तक: सच्चे वीर की कथा कुंडलग्राम की धरती पर जब राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के घर वर्धमान का जन्म हुआ, तो वह कोई साधारण…

Read now
Jainism

इस बार प्रभावना की नहीं बल्कि भावना की महावीर जयंती मनाएं – श्रद्धेय ब्रह्मचारी देवेंद्र

श्रद्धेय ब्रह्मचारी देवेंद्र भाई जी ने जैन धर्म की परम्परा के चौबीस वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का 2619 वाँ जन्मकल्याणक महोत्सव जैन समाज सोशल डिस्टेन्सिंग का पूर्णता…

Read now
Jainism

महावीर जयंती विशेष : महावीर स्वामी ने बनाए थे ये 5 महाव्रत

हर साल चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को महावीर जयंती मनाई जाती हैं। जैन धर्म के अनुयायिओं द्वारा महावीर स्वामी के पूजा के साथ ही इस दिन प्रभातफेरी और रथयात्रा…

Read now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *