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जैन धर्म और परंपरा में क्या है योग का महत्त्व…

जैन धर्म और परंपरा में क्या है योग का महत्त्व…

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जैन धर्म और परंपरा में क्या है योग का महत्त्व…

18 जून; जैन परंपरा के प्रथम तीर्र्थंकर ऋषभदेव जी प्रथम योगी के रूप में सामने आते हैं. पुराणों में ऋषभदेव जी का भी उल्लेख होता है. ऋषभदेव जी ने ध्यान-योग की ऐसी कला सिखाई कि चौबीसवें तीर्थंकर महावीर तक सभी ने उन्हीं आसनों और ध्यान-मुद्राओं का पालन किया.

गौर करने वाली बात यह है कि आज तक पुरातत्व महत्व की जितनी भी जैन मूर्तियां प्राप्त हुई हैं, वे या तो पद्मासन की मुद्रा में हैं या खड्गासन की. लेकिन नासाग्र दृष्टि जैन योग मुद्रा की प्रमुख विशेषता है. मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई के दौरान कायोत्सर्ग मुद्रा में एक योगी की मूर्ति के अवशेष प्राप्त हुए थे. जैन संस्कृति में कायोत्सर्ग योग की एक प्रमुख विधा है.

आचार्य शुभचंद्र ने ज्ञानार्णव नामक ग्रंथ में आसन-प्राणायाम तथा ध्यान की सभी विधियों का सूक्ष्म विवेचन किया. आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा प्रवर्तित प्रेक्षाध्यान एवं जीवन-विज्ञान योग प्रचलित है. योग की विधि ‘सामयिक’ तथा ‘प्रक्रिमण’ आज जैन उपासना में प्रचलित है.

RW

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June 13, 2018 1 min read
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