अंतिम अपडेट: 31 अगस्त 2026
हलषष्ठी 2026 में 2 सितंबर, बुधवार को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है और जन्माष्टमी से ठीक दो दिन पहले आता है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था, इसलिए इसे बलराम जयंती भी कहा जाता है। इस लेख में हम बताएंगे कि हलषष्ठी 2026 की सही तारीख और मुहूर्त क्या है, इसका धार्मिक महत्व क्या है, व्रत कैसे किया जाता है, और इससे जुड़ी पौराणिक कथा क्या कहती है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- हलषष्ठी 2026 की तारीख: 2 सितंबर, बुधवार
- षष्ठी तिथि प्रारंभ: 2 सितंबर सुबह 6:12 बजे | समाप्ति: 3 सितंबर सुबह 4:25 बजे
- यह पर्व जन्माष्टमी से दो दिन पहले, भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी को मनाया जाता है
- यह भगवान बलराम की जयंती के रूप में भी जाना जाता है, जिनका मुख्य शस्त्र हल और मूसल है
- अलग-अलग क्षेत्रों में इसे हल छठ, हरछठ, ललही छठ, कमरछठ (छत्तीसगढ़), रंधन छठ, चंदन छठ और तिन्नी छठ जैसे नामों से जाना जाता है
- इस दिन माताएं संतान की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और हल से जुता हुआ अनाज ग्रहण नहीं करतीं
हलषष्ठी क्या है और इसका महत्व
हलषष्ठी हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला पर्व है। इसका सीधा संबंध भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी से है, जिनका प्रमुख अस्त्र हल (हल-मूसल) है। मान्यता है कि इसी तिथि को बलराम जी का जन्म हुआ था, इसीलिए किसान इस दिन हल की पूजा करते हैं और खेती में हल के महत्व को स्मरण करते हैं। यह पर्व मुख्य रूप से मातृशक्ति और संतान-कल्याण से भी जुड़ा है — माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और स्वस्थ जीवन की कामना से व्रत रखती हैं।
हलषष्ठी 2026: तारीख और शुभ मुहूर्त
| विवरण | समय |
|---|---|
| हलषष्ठी की तारीख | 2 सितंबर 2026, बुधवार |
| षष्ठी तिथि प्रारंभ | 2 सितंबर, सुबह 6:12 बजे |
| षष्ठी तिथि समाप्ति | 3 सितंबर, सुबह 4:25 बजे |
| जन्माष्टमी से पहले | 2 दिन |
सटीक मुहूर्त आपके शहर के आधार पर कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।
व्रत और पूजा विधि
हलषष्ठी के दिन माताएं संतान की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस दिन हल से जुती हुई कोई भी फसल या अनाज नहीं खाया जाता, क्योंकि पर्व का मूल भाव ही हल के प्रति सम्मान और उससे जुड़ी पवित्रता को दर्शाना है। इसकी जगह महुआ, कांस के चावल, भैंस का दूध-दही और तालाब में उगने वाली चीज़ों का सेवन किया जाता है। पूजा में हल, मूसल और बलराम जी की प्रतीकात्मक पूजा की जाती है, और व्रत कथा सुनना अनिवार्य माना जाता है।
क्षेत्रीय नाम और भिन्नताएं
यह पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग नामों और थोड़ी भिन्न परंपराओं के साथ मनाया जाता है:
- उत्तर भारत: हल छठ, हरछठ, ललही छठ
- छत्तीसगढ़: कमरछठ या खमर छठ के नाम से विशेष पहचान, जहां यह प्रमुख पारिवारिक पर्व माना जाता है
- अन्य क्षेत्र: रंधन छठ, चंदन छठ, तिन्नी छठ, बलदेव छठ
नाम भले अलग हों, लेकिन हर जगह मूल भाव एक ही है — हल और बलराम जी के प्रति सम्मान, और संतान के कल्याण की कामना।
पौराणिक व्रत कथा
प्राचीन काल में एक ग्वालिन रहती थी, जिसका प्रसव होने वाला था। प्रसव पीड़ा के बीच भी उसे दूध-दही बेचने की चिंता सता रही थी, इसलिए वह घड़े सिर पर रखकर निकल पड़ी। रास्ते में पीड़ा असहनीय होने पर वह एक झरबेरी की झाड़ी की ओट में गई और वहीं उसने एक पुत्र को जन्म दिया। व्यापार की चिंता में वह नवजात को वहीं छोड़कर दूध-दही बेचने चली गई, और जल्दी में गाय व भैंस का दूध मिलाकर लोगों को केवल भैंस का दूध बताकर बेच दिया।
इसी बीच पास के खेत में हल जोत रहे किसान के बैल अचानक भड़क उठे, और हल का फल नवजात को लग गया, जिससे बालक की मृत्यु हो गई। किसान ने दुखी होकर झरबेरी के कांटों से बच्चे के शरीर पर टांके लगाए और वहां से चला गया। जब ग्वालिन लौटी और बच्चे को मृत देखा, तो उसे एहसास हुआ कि यह उसके झूठ बोलकर मिलावटी दूध बेचने का परिणाम है। पश्चाताप में उसने गांव जाकर हर उस स्त्री को सच बताया जिसे उसने मिलावटी दूध बेचा था। स्त्रियों ने उसकी ईमानदारी और पश्चाताप देखकर उसे क्षमा कर आशीर्वाद दिया। जब वह वापस झरबेरी के पास पहुंची, तो उसने अपने पुत्र को जीवित पाया।
कथा का संदेश: यह कथा सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के महत्व को दर्शाती है — विशेष रूप से उन कार्यों में जो सीधे दूसरों के भरोसे और स्वास्थ्य से जुड़े हों (जैसे भोजन और दूध बेचना)। यही कारण है कि इस दिन व्रत के साथ यह कथा सुनने की परंपरा है।
निष्कर्ष
हलषष्ठी 2026 में 2 सितंबर को मनाई जाएगी और यह भगवान बलराम के जन्म, हल के प्रति सम्मान और मातृ-वात्सल्य का प्रतीक पर्व है। चाहे इसे हल छठ कहें, हरछठ या कमरछठ — मूल भावना संतान-कल्याण और सत्यनिष्ठा की ही है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. हलषष्ठी 2026 में कब है?
हलषष्ठी 2026 में 2 सितंबर, बुधवार को मनाई जाएगी। षष्ठी तिथि 2 सितंबर सुबह 6:12 बजे से शुरू होकर 3 सितंबर सुबह 4:25 बजे तक रहेगी।
2. हलषष्ठी को और किन नामों से जाना जाता है?
इसे हल छठ, हरछठ, ललही छठ, कमरछठ (छत्तीसगढ़), रंधन छठ, चंदन छठ, तिन्नी छठ और बलदेव छठ जैसे नामों से भी जाना जाता है।
3. हलषष्ठी व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?
इस दिन हल से जुती हुई कोई भी फसल या अनाज नहीं खाया जाता। इसके बजाय महुआ, कांस के चावल और भैंस के दूध-दही का सेवन किया जाता है।
4. हलषष्ठी का भगवान बलराम से क्या संबंध है?
मान्यता है कि भगवान बलराम का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था, इसलिए इस दिन को बलराम जयंती भी कहा जाता है। हल उनका प्रमुख अस्त्र है।
5. हलषष्ठी की व्रत कथा किसलिए सुनी जाती है?
व्रत कथा एक ग्वालिन की कहानी है जो सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का महत्व बताती है। इसे व्रत के दौरान सुनना शुभ और पूर्णफलदायी माना जाता है।
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Editorial Review Note
Reviewed by Bhavya Srivasava on August 31, 2026.
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