कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) सावन में भगवान शिव को समर्पित प्रमुख धार्मिक यात्राओं में से एक है। कांवड़ यात्रा 2026 (Kanwar Yatra 2026) के दौरान भी लाखों शिवभक्त गंगाजल कांवड़ में भरकर शिवालयों तक पहुंचते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। लेकिन कांवड़ यात्रा क्या है (What is Kanwar Yatra) और इसकी शुरुआत किसने की? इस सवाल पर हिंदू परंपरा में चार प्रमुख मान्यताएं मिलती हैं, परशुराम, श्रवण कुमार, भगवान राम और रावण।
भगवान परशुराम
पहली मान्यता भगवान परशुराम से जुड़ी है और इसका संबंध बागपत के पुरा महादेव मंदिर से बताया जाता है। पुराणिक परंपरा में वर्णित कथा के अनुसार, महर्षि जमदग्नि के आदेश पर परशुराम ने अपनी माता रेणुका का वध किया। बाद में पिता के वरदान से उन्होंने रेणुका को पुनर्जीवित कर दिया।
स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार, मातृहत्या के दोष से मुक्ति के लिए परशुराम ने भगवान शिव की आराधना की और गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक किया। इसी कारण पुरा महादेव की परंपरा में उन्हें पहला कांवड़िया माना जाता है। हालांकि, इस पूरी कथा को पहली कांवड़ यात्रा के रूप में स्थापित करने वाला स्पष्ट पुराणिक प्रमाण नहीं मिलता।

श्रवण कुमार
दूसरी मान्यता श्रवण कुमार (Shravan Kumar) से जुड़ी है। उनकी कथा वाल्मीकि रामायण में मिलती है, जहां वे अपने वृद्ध और नेत्रहीन माता-पिता को तीर्थयात्रा पर लेकर जाते हैं। माता-पिता के लिए पानी लेने के दौरान राजा दशरथ के बाण से उनकी मृत्यु हो जाती है।
श्रवण द्वारा माता-पिता को कंधे पर लेकर यात्रा करने की कथा को बाद की लोकपरंपरा में कांवड़ से जोड़ा गया। हालांकि, रामायण में उनके द्वारा गंगाजल लाकर शिव का जलाभिषेक करने का उल्लेख नहीं है।

भगवान राम
एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान राम ने सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम में शिव का अभिषेक किया था। आज भी सुल्तानगंज से देवघर तक कांवड़ यात्रा होती है। लेकिन भगवान राम द्वारा यह यात्रा करने का स्पष्ट उल्लेख वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलता। इसलिए इसे बैद्यनाथ धाम की धार्मिक परंपरा माना जाता है।

रावण
अनुसार, समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव ने हलाहल विष ग्रहण किया और रावण ने गंगाजल से उनका अभिषेक किया। कुछ परंपराएं इसे कांवड़ यात्रा की शुरुआत से जोड़ती हैं। हालांकि, रावण द्वारा कांवड़ में गंगाजल लाने की यह विशिष्ट कथा किसी प्राचीन पुराण में स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं है।

तो पहला कांवड़िया कौन?
चारों कथाएं कांवड़ परंपरा के अलग-अलग पहलुओं को दर्शाती हैं। परशुराम की शिवभक्ति, श्रवण की माता-पिता की सेवा, राम की तीर्थपरंपरा और रावण की अनन्य शिवभक्ति।
इसलिए शास्त्रीय दृष्टि से किसी एक को निश्चित रूप से पहला कांवड़िया कहना संभव नहीं है। सावन 2026 (Sawan 2026) की कांवड़ यात्रा को इन प्राचीन धार्मिक और लोक परंपराओं के संगम के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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