धर्म और शिक्षा का क्या संबंध है?

धर्म और शिक्षा का क्या संबंध है?

भूमिका

धर्म और शिक्षा—ये दोनों ही मानव जीवन के दो ऐसे स्तंभ हैं, जिन पर समाज की नैतिकता, संस्कृति और भविष्य टिका होता है। अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या धर्म और शिक्षा अलग-अलग क्षेत्र हैं या एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। आधुनिक समय में शिक्षा को केवल नौकरी और आर्थिक उन्नति से जोड़कर देखा जाने लगा है, जबकि धर्म को पूजा-पाठ या आस्था तक सीमित कर दिया गया है। लेकिन वास्तव में धर्म और शिक्षा का संबंध बहुत गहरा, व्यापक और सार्थक है।

धर्म का वास्तविक अर्थ

धर्म का अर्थ केवल किसी विशेष पंथ, पूजा-पद्धति या कर्मकांड से नहीं है। संस्कृत में ‘धर्म’ शब्द ‘धृ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है—जो धारण करे, जो समाज और व्यक्ति को संभाले। सत्य, करुणा, अहिंसा, न्याय, सेवा और आत्मसंयम जैसे मूल्य धर्म के मूल तत्व हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो धर्म जीवन जीने की कला सिखाता है।

शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना या रोजगार पाना नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है जो व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करे, सोचने-समझने की क्षमता बढ़ाए और उसे जिम्मेदार नागरिक बनाए। भारतीय परंपरा में शिक्षा को “सा विद्या या विमुक्तये”—जो मुक्ति की ओर ले जाए—कहा गया है।

धर्म और शिक्षा का ऐतिहासिक संबंध

प्राचीन भारत में गुरुकुल प्रणाली धर्म और शिक्षा का सर्वोत्तम उदाहरण थी। गुरुकुलों में शिक्षा केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन मूल्यों, अनुशासन, सेवा, आत्मसंयम और सामाजिक कर्तव्यों की शिक्षा भी दी जाती थी। वेद, उपनिषद, गीता, बौद्ध और जैन शिक्षाएँ—सभी शिक्षा और धर्म के समन्वय का प्रमाण हैं।

नैतिक शिक्षा का आधार धर्म

धर्म शिक्षा को नैतिक आधार प्रदान करता है। बिना नैतिकता के शिक्षा अधूरी है। यदि शिक्षा केवल बौद्धिक विकास करे और नैतिक विकास न करे, तो वही शिक्षा समाज के लिए घातक बन सकती है। आज के समय में बढ़ता भ्रष्टाचार, हिंसा और असहिष्णुता इस बात का संकेत है कि शिक्षा में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की कमी है।

आधुनिक शिक्षा में धर्म की भूमिका

आधुनिक शिक्षा प्रणाली में धर्म को अक्सर “अंधविश्वास” या “पिछड़ापन” मानकर अलग कर दिया जाता है। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि धर्म को वैज्ञानिक, तर्कसंगत और मानवीय मूल्यों के रूप में शिक्षा से जोड़ा जाए। सभी धर्मों का मूल संदेश—मानवता, प्रेम, सहअस्तित्व और करुणा—शिक्षा का अभिन्न अंग होना चाहिए।

धर्म शिक्षा को दिशा देता है

शिक्षा व्यक्ति को शक्ति देती है, लेकिन धर्म उस शक्ति को सही दिशा देता है। यदि व्यक्ति शिक्षित है लेकिन धर्मनिष्ठ नहीं है, तो वह अपने ज्ञान का दुरुपयोग कर सकता है। वहीं, धर्मयुक्त शिक्षा व्यक्ति को विनम्र, जिम्मेदार और समाजोपयोगी बनाती है।

युवा पीढ़ी और धर्म-शिक्षा

आज की युवा पीढ़ी तकनीकी रूप से तो अत्यंत सक्षम है, लेकिन मानसिक तनाव, दिशाहीनता और नैतिक द्वंद्व से भी जूझ रही है। यदि शिक्षा के साथ धर्म के मानवीय और नैतिक पक्ष को जोड़ा जाए, तो युवाओं को जीवन का सही उद्देश्य और संतुलन मिल सकता है।

निष्कर्ष

धर्म और शिक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। शिक्षा बिना धर्म के दिशाहीन हो सकती है और धर्म बिना शिक्षा के अंधविश्वास बन सकता है। एक स्वस्थ, सशक्त और सभ्य समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है कि धर्म और शिक्षा का संतुलित और सार्थक समन्वय किया जाए। यही समन्वय मानव को केवल सफल नहीं, बल्कि श्रेष्ठ भी बनाता है।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

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