रक्षाबंधन आज भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के संकल्प से जुड़ा सबसे लोकप्रिय त्योहार है। सावन पूर्णिमा के दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है, आरती करती है और उसकी लंबी उम्र व सुख-समृद्धि की कामना करती है। भाई भी बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सबसे पहली राखी किसने बांधी थी? क्या हजारों साल पहले भी भाई-बहन एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधते थे? और क्या वेदों या पुराणों में आज के रक्षाबंधन का कोई उल्लेख मिलता है?
इन सवालों का जवाब थोड़ा दिलचस्प है, क्योंकि प्राचीन ग्रंथों में रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन आधुनिक रक्षाबंधन की तरह भाई-बहन के बीच राखी बांधने की परंपरा को किसी एक घटना से जोड़ना आसान नहीं है।
वेदों में मिलता है रक्षा-सूत्र का उल्लेख
रक्षा-सूत्र की परंपरा को काफी प्राचीन माना जाता है। TV9 की रिपोर्ट के अनुसार वैदिक परंपरा में ऋषि अपने शिष्यों और यजमानों की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधते थे।
इस दौरान विशेष वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता था। इसका उद्देश्य व्यक्ति की रक्षा और मंगलकामना से जुड़ा था।
इससे यह समझा जा सकता है कि कलाई पर पवित्र धागा बांधने की परंपरा केवल आधुनिक समय की शुरुआत नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें प्राचीन धार्मिक अनुष्ठानों में दिखाई देती हैं।
अथर्ववेद में रक्षा-सूत्र से जुड़ा मंत्र
रक्षा-सूत्र की चर्चा करते समय एक प्रसिद्ध मंत्र का उल्लेख मिलता है—
“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
इस मंत्र में राजा बलि का उदाहरण देते हुए रक्षा के लिए सूत्र बांधने की बात कही गई है।
आज भी कई धार्मिक अवसरों पर रक्षा-सूत्र या कलावा बांधते समय इस मंत्र का प्रयोग किया जाता है। हालांकि इसे आधुनिक भाई-बहन वाली राखी का सीधा ऐतिहासिक प्रमाण मानना उचित नहीं है।
राजा बलि और भगवान विष्णु से जुड़ी कथा
राखी की प्राचीन कथाओं में राजा बलि और भगवान विष्णु की कहानी सबसे प्रसिद्ध है।
पौराणिक कथा के अनुसार, असुरराज बलि बेहद शक्तिशाली और दानवीर राजा थे। उन्होंने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था।
इसके बाद भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी।
बलि ने उनकी मांग स्वीकार कर ली। भगवान वामन ने विराट रूप धारण किया और दो पग में पृथ्वी और आकाश को नाप लिया। तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में रख दिया।
कथा के अनुसार भगवान ने उन्हें पाताल लोक भेज दिया, लेकिन उनकी भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर उन्हें विशेष वरदान भी दिया।
लक्ष्मी जी ने राजा बलि को बांधी थी राखी?
एक अन्य प्रसिद्ध पौराणिक कथा इसी प्रसंग से जुड़ी है।
मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु राजा बलि को दिए गए वचन के कारण उनके साथ रहने लगे। इससे माता लक्ष्मी चिंतित हुईं। तब नारद जी ने उन्हें राजा बलि को रक्षा-सूत्र बांधकर अपना भाई बनाने का सुझाव दिया।
माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधी और उन्हें अपना भाई माना। इसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु को अपने साथ वापस ले जाने का अनुरोध किया।
राजा बलि ने इस रिश्ते का सम्मान किया और भगवान विष्णु को जाने दिया।
इसी कथा को कई परंपराओं में राखी के प्राचीन धार्मिक संदर्भों में गिना जाता है।
इंद्र की कलाई पर भी बांधा गया था रक्षा-सूत्र
रक्षाबंधन की प्राचीन परंपराओं से जुड़ी एक अन्य कथा देवराज इंद्र और उनकी पत्नी शची की है।
भविष्य पुराण से जुड़ी परंपरा के अनुसार देवताओं और दैत्यों के बीच युद्ध के दौरान इंद्र की स्थिति कमजोर हो गई थी। तब गुरु बृहस्पति के निर्देश पर इंद्र की पत्नी शची ने उनकी कलाई पर मंत्र से सिद्ध रक्षा-सूत्र बांधा।
कथा के अनुसार इसके बाद देवताओं को युद्ध में विजय प्राप्त हुई।
यह प्रसंग बताता है कि प्राचीन धार्मिक परंपरा में रक्षा-सूत्र केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं था। इसे सुरक्षा, विजय और मंगलकामना से भी जोड़ा जाता था।
क्या द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को बांधी थी राखी?
रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथाओं में श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा भी शामिल है।
लोकप्रिय मान्यता के अनुसार जब श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त निकला तो द्रौपदी ने अपने वस्त्र का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा का वचन निभाया और चीरहरण के समय उनकी लाज बचाई।
हालांकि इस प्रसंग को आधुनिक अर्थों में रक्षाबंधन की पहली राखी कहना उचित नहीं होगा। यह कथा मुख्य रूप से भाई-बहन जैसे स्नेह और रक्षा के भाव से जोड़ी जाती है।
क्या यही थी दुनिया की पहली राखी?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।
किसी एक व्यक्ति को “दुनिया में सबसे पहले राखी बांधने वाला” बताने का ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
प्राचीन भारतीय परंपराओं में रक्षा-सूत्र, कलावा और पवित्र धागा बांधने की रस्म अलग-अलग धार्मिक अवसरों पर होती रही है। बाद के समय में इसी तरह की परंपराओं का संबंध भाई-बहन के रिश्ते और रक्षाबंधन से अधिक मजबूत हुआ।
इसलिए “पहली राखी” के रूप में किसी एक पौराणिक घटना को निश्चित ऐतिहासिक शुरुआत कहना सही नहीं होगा।
क्या प्राचीन समय में राखी सिर्फ भाई को बांधी जाती थी?
नहीं। प्राचीन परंपराओं में रक्षा-सूत्र का दायरा काफी व्यापक था।
इसे—
- गुरु द्वारा शिष्य को
- पुरोहित द्वारा यजमान को
- पत्नी द्वारा पति को
- राजा की रक्षा के लिए
- धार्मिक अनुष्ठानों में
बांधने की परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
बाद में लोक परंपरा में इसका सबसे लोकप्रिय रूप बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बांधना बन गया।
राजा और प्रजा के बीच भी थी राखी की परंपरा
इतिहास और लोक परंपराओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि सामंती काल में प्रजा राजा को राखी बांधती थी। इसका भाव था कि राजा अपनी प्रजा का रक्षक है।
आज भी कई धार्मिक पुरोहित अपने यजमानों की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधते हैं और बदले में उन्हें दक्षिणा दी जाती है।
इससे पता चलता है कि राखी का मूल भाव केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रक्षा, विश्वास और सामाजिक संबंध से भी जुड़ा रहा है।
रानी कर्णावती और हुमायूं की राखी की कहानी
रक्षाबंधन के इतिहास से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूं की भी है।
कहा जाता है कि 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के मेवाड़ पर आक्रमण के दौरान रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी थी।
लोकप्रिय कथा के अनुसार हुमायूं ने राखी को भाई-बहन के रिश्ते के रूप में स्वीकार किया और मदद के लिए आगे बढ़ा। हालांकि उपलब्ध समकालीन फारसी दस्तावेजों में इस घटना का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए इसे लोकप्रिय ऐतिहासिक कथा के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
सिकंदर की पत्नी और राजा पोरस की कहानी भी है मशहूर
राखी से जुड़ी एक और लोकप्रिय कहानी सिकंदर और राजा पोरस की है।
कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी रोक्साना ने राजा पोरस को राखी भेजकर सिकंदर की रक्षा करने का अनुरोध किया था। इसके बाद पोरस ने कथित रूप से उसे भाई का रिश्ता दिया।
लेकिन इस कहानी के भी प्राचीन भारतीय स्रोतों में स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। इसलिए इसे इतिहास की प्रमाणित घटना के बजाय लोकप्रिय लोककथा के रूप में देखना चाहिए।
1905 में रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया राखी को नया सामाजिक अर्थ
रक्षाबंधन का इतिहास केवल धार्मिक कथाओं तक सीमित नहीं है।
साल 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी को भाईचारे और सामाजिक एकता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करने का आह्वान किया था।
इस दौरान लोगों ने एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर एकता और आपसी भाईचारे का संदेश दिया।
इस तरह राखी ने धार्मिक परंपरा से आगे बढ़कर सामाजिक एकता और बंधुत्व का प्रतीक भी रूप लिया।
आज राखी का अर्थ क्या है?
आज रक्षाबंधन मुख्य रूप से भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का त्योहार है।
बहन राखी बांधकर भाई के अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करती है। भाई बदले में बहन की रक्षा और हर मुश्किल में उसके साथ खड़े रहने का संकल्प लेता है।
हालांकि समय के साथ राखी का अर्थ भी व्यापक हुआ है। आज लोग इसे केवल खून के रिश्ते तक सीमित नहीं रखते, बल्कि स्नेह, दोस्ती, सामाजिक सद्भाव और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में भी देखते हैं।
निष्कर्ष
रक्षाबंधन की जड़ें काफी पुरानी हैं। वेदों में रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा के संदर्भ मिलते हैं, जबकि पुराणों और धार्मिक कथाओं में राजा बलि, भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी तथा इंद्र-शची जैसे प्रसंगों से रक्षा-सूत्र को जोड़ा जाता है।
लेकिन यह कहना कि “सबसे पहली राखी फलां व्यक्ति ने बांधी थी”, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है। आधुनिक भाई-बहन वाले रक्षाबंधन का स्वरूप लंबे समय में विकसित हुआ है।
इसलिए राखी की सबसे बड़ी पहचान उसके किसी एक ऐतिहासिक आरंभ में नहीं, बल्कि उसके रक्षा, प्रेम, विश्वास और रिश्तों को मजबूत करने वाले भाव में है।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
Religion World provides information on all religions and presents it impartially. You can send us information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com. You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.
