रक्षाबंधन भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और आपसी रिश्ते के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके सुखी एवं सुरक्षित जीवन की कामना करती है।
लेकिन जब अलग-अलग धर्मों के लोग इस त्योहार से जुड़े सवाल पूछते हैं, तो एक सवाल अक्सर सामने आता है—क्या मुस्लिम व्यक्ति राखी बांध सकता है या पहन सकता है? इस विषय पर इस्लाम में धार्मिक दृष्टिकोण क्या कहता है, इसे समझना जरूरी है।
रक्षाबंधन 2026 कब मनाया जाएगा?
साल 2026 में रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त की सुबह शुरू होकर 28 अगस्त की सुबह समाप्त होगी। राखी बांधने का शुभ समय सुबह 5:57 बजे से 9:48 बजे तक बताया गया है।
इस बार रक्षाबंधन के दिन चंद्र ग्रहण भी पड़ रहा है, हालांकि रिपोर्ट के अनुसार यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा और इसलिए यहां इसका धार्मिक सूतक मान्य नहीं होगा।
क्या मुसलमान राखी बांध सकते हैं?
इस सवाल का जवाब इस्लामी धार्मिक दृष्टिकोण से समझना जरूरी है। एक रिपोर्ट में मुफ्ती सलाउद्दीन कासमी के हवाले से बताया गया है कि इस्लाम में राखी बांधने या रक्षाबंधन मनाने का धार्मिक आधार नहीं मिलता।
एक रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामी दृष्टिकोण में राखी को हिंदू धार्मिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है और मुस्लिम व्यक्ति के लिए इसे धार्मिक रस्म के तौर पर अपनाना जायज नहीं माना गया है।
हालांकि, अलग-अलग मुस्लिम विद्वानों और समुदायों में सांस्कृतिक एवं पारिवारिक संदर्भ को लेकर विचार अलग हो सकते हैं। इसलिए इसे पूरे मुस्लिम समुदाय की व्यक्तिगत प्रथाओं पर लागू होने वाला एकमात्र सामाजिक नियम नहीं माना जाना चाहिए।
इस्लाम में गैर-इस्लामी धार्मिक परंपराओं को लेकर क्या दृष्टिकोण है?
इस्लामी धार्मिक व्याख्याओं में अपने धार्मिक त्योहारों और धार्मिक रस्मों की अपनी विशिष्ट पहचान पर जोर दिया जाता है।
एक रिपोर्ट में इसे ‘तशब्बुह’ की अवधारणा से जोड़ा गया है, जिसका अर्थ दूसरे धार्मिक समुदाय की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं की नकल या अनुकरण से संबंधित है। इसी आधार पर रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ इस्लामी विद्वान गैर-इस्लामी धार्मिक त्योहारों की धार्मिक रस्मों में भाग लेने को उचित नहीं मानते।
क्या भाई-बहन का रिश्ता इस्लाम में महत्वपूर्ण है?
राखी की धार्मिक रस्म और भाई-बहन के रिश्ते को अलग-अलग समझना जरूरी है।
इस्लाम में परिवार, रिश्तेदारी और भाई-बहनों के साथ अच्छे व्यवहार को महत्व दिया जाता है। इसलिए किसी भाई या बहन के प्रति प्रेम, सम्मान, सहयोग और जिम्मेदारी की भावना अपने आप में अलग विषय है।
विवाद मुख्य रूप से राखी को एक धार्मिक रस्म के रूप में अपनाने से जुड़ा है।
यानी भाई-बहन के बीच प्रेम और सम्मान रखना एक बात है, जबकि किसी दूसरे धर्म की धार्मिक परंपरा को धार्मिक अनुष्ठान के रूप में अपनाना अलग विषय है।
क्या राखी पहनना और रक्षाबंधन मनाना एक ही बात है?
दोनों को पूरी तरह एक जैसा समझना जरूरी नहीं है।
रक्षाबंधन मूल रूप से एक हिंदू धार्मिक-सांस्कृतिक पर्व है, जिसमें राखी बांधने की विशेष रस्म होती है। वहीं किसी व्यक्ति की कलाई पर कोई साधारण धागा या ब्रेसलेट होना अपने आप में रक्षाबंधन की धार्मिक रस्म नहीं माना जा सकता।
इसलिए किसी विशेष स्थिति में धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू अलग-अलग समझना जरूरी है।
2026 में रक्षाबंधन को लेकर क्या खास है?
रक्षाबंधन 2026 में 28 अगस्त को पड़ रहा है। इस बार इस तारीख से जुड़ी एक और खगोलीय घटना चर्चा में है—इसी दिन साल का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण भी होगा।
ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए भारतीय धार्मिक परंपरा के अनुसार इसके सूतक को लेकर विशेष प्रभाव नहीं माना जाएगा।
क्या दूसरे धर्मों के लोग रक्षाबंधन मना सकते हैं?
रक्षाबंधन का सामाजिक और सांस्कृतिक रूप कई जगह धार्मिक सीमाओं से बाहर भी दिखाई देता है। भारत में अलग-अलग समुदायों के लोग भाई-बहन जैसे रिश्तों और सामाजिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में इस पर्व से जुड़ते रहे हैं। कुछ मुस्लिम परिवारों में भी सांस्कृतिक या पारिवारिक संदर्भ में राखी से जुड़े उदाहरण मिलते हैं।
लेकिन यदि सवाल इस्लामी धार्मिक नियम के नजरिए से पूछा जाए, तो संबंधित विद्वान की व्याख्या और व्यक्ति की धार्मिक परंपरा को ध्यान में रखना जरूरी है।
रक्षाबंधन का मूल संदेश क्या है?
रक्षाबंधन का मूल भाव भाई-बहन के बीच प्रेम, विश्वास और जिम्मेदारी से जुड़ा है। बहन भाई की मंगलकामना करती है और भाई उसके साथ खड़े रहने का संकल्प व्यक्त करता है।
यही वजह है कि यह त्योहार भारत में धार्मिक पहचान के साथ-साथ एक मजबूत पारिवारिक और सामाजिक परंपरा के रूप में भी जाना जाता है।
निष्कर्ष
रक्षाबंधन 2026 में 28 अगस्त को मनाया जाएगा। मुस्लिम व्यक्ति द्वारा राखी पहनने या रक्षाबंधन की रस्म में शामिल होने को लेकर इस्लामी विद्वानों की धार्मिक व्याख्याएं महत्वपूर्ण हैं।एक रिपोर्ट में मुफ्ती सलाउद्दीन कासमी के हवाले से बताया गया है कि इस्लाम में राखी बांधने की धार्मिक अनुमति नहीं मानी जाती, क्योंकि यह हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़ी रस्म है।
वहीं, भाई-बहन के बीच प्रेम, सम्मान और पारिवारिक संबंध अपने आप में अलग विषय हैं। इसलिए इस मुद्दे को समझते समय धार्मिक नियम, व्यक्तिगत आस्था और सांस्कृतिक परंपरा—इन तीनों के बीच अंतर करना जरूरी है।
यह जानकारी विभिन्न धार्मिक मान्यताओं और उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। किसी व्यक्तिगत धार्मिक निर्णय के लिए संबंधित धर्म के योग्य विद्वान से सलाह लेना बेहतर है।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
Religion World provides information on all religions and presents it impartially. You can send us information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com. You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.
