होलिका-दहन के संदर्भ में कई कथाएं प्रचलित हैं. उसी तरह इस पर्व को मनाने की परंपराएं व प्रथाएं भी भिन्न-भिन्न हैं. यहां हम मथुरा के ‘फालेन’ और ‘जटवारी’ गांव की विशेष होलिका दहन का जिक्र करेंगे. जहां होलिका की धधकती आग में स्थानीय पंडे प्रवेश करते हैं, और सकुशल बाहर आते हैं. आइये जाने क्या है ये परंपराएं…
समूचे ब्रजमण्डल में होली का पर्व पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. यहां की लट्ठमार, लड्डू-जलेबी, छड़ीमार, रंगों एवं फूलों की होली पूरे विश्व में लोकप्रिय है. 40 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व के दरम्यान शहर के लगभग सभी कृष्ण मंदिरों में फाग की धुनें गूंजती हैं और अबीर-गुलाल उड़ाये जाते हैं. इन 40 दिनों तक पूरा शहर मानों कृष्णमय हो जाता है. यहां कोसी से करीब 58 किमी दूर ‘फालेन’ नामक गांव में बड़े अनूठी किस्म की होलिका-दहन मनायी जाती है. इसकी तैयारियां करीब एक माह पूर्व ही शुरु हो जाती हैं. होली की अति प्राचीन पारंपरिक कथा से प्रभावित ‘फालेन’ का यह अनूठा पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है.
प्रचलित कथा

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क्या है परंपरा?

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गांव के एक पण्डे द्वारा भक्त प्रह्लाद के आशीर्वाद से सुसज्जित माला को कौशिक परिवार का अमुक सदस्य को धारण करवाया जाता है. इसके पश्चात ही वह होलिका की पवित्र अग्नि में प्रवेश करता है और धधकते अंगारों पर चलते हुए सकुशल बाहर निकल आता है। इस दौरान सारा गांव ढोल-नगाड़ों और रसियों की आवाज़ से गुंजायमान हो उठता है। आस्था और अदम्य साहस का अनोखा करिश्मा देख यहां मौजूद श्रद्धालु दांतो तले उंगलियां दबा लेते हैं.
जटवारी में होलिका दहन

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