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आखिर क्यों नहीं देखना चाहिए गणेश चतुर्थी का चांद?

आखिर क्यों नहीं देखना चाहिए गणेश चतुर्थी का चांद?

आखिर क्यों नहीं देखना चाहिए गणेश चतुर्थी का चांद?
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आखिर क्यों नहीं देखना चाहिए गणेश चतुर्थी का चांद?

आखिर क्यों नहीं देखना चाहिए गणेश चतुर्थी का चांद?

क्या आप जानते हैं गणेश चतुर्थी के दिन रात को चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए ।अगर आपने गौ माता के पैर लगा हुआ स्थान हो, उसमें जल भरा हो और उसके अंदर अगर आपने चंद्रमा का चांद देख लिया हो तो आपको चोरी माथे आएगी।आपके ऊपर चोरी का आरोप या मिथ्या कलंक जरूर लग सकता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि एक दफा गणेश जी के लंबोदर और गजमुख को देखकर चांद को हंसी आ गई। गणेश जी इससे नाराज को गए और चांद से कहा कि तुम्हें अपने रूप का अहंकार हो गया है इसलिए अब तुम्हारा क्षय हो जाएगा। जो भी तुम्हें देखेगा उसे कलंक लगेगा, इसलिए गणपति चतुर्थी का जो चांद होता है गणेश चौथ का चांद नहीं देख देखते हैं।।कहा जाता है कि यही गणेश चतुर्थी का चांद भगवान श्री कृष्ण ने देख लिया था उनको भी समयन्तक मणी चोरी करने का आरोप भगवान श्रीकृष्ण पर भी लगा था ।

यह है प्रचलित कथा

शास्त्रों के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने अनजाने में चांद को देख लिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि इन पर एक व्यक्ति की हत्या का आरोप लगा। भगवान श्री कृष्ण को इस आरोप से मुक्ति पाने के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।नारद जी से जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने ऊपर लगे झूठे आरोपों का कारण पूछा तब नारद जी ने श्री कृष्ण भगवान से कहा कि यह आरोप भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन चांद को देखने के कारण लगा है। इस चतुर्थी के दिन चांद को देखने से कलंक लगने की वजह नारद जी ने यह बताई की, इस दिन गणेश जी ने चन्द्रमा को शाप दिया था। इस संदर्भ में कथा है कि चन्द्रमा को अपने रूप का बहुत अभिमान था। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी के गजमुख एवं लबोदर रूप को देखकर चन्द्रमा ने हंस दिया। गणेश जी इससे नाराज हो गये और चन्द्रमा को शाप दिया कि आज से जो भी तुम्हें देखेगा उसे झूठा कलंक लगेगा।गणेश जी के शाप से चन्द्रमा दुःखी हो गये और घर में छुप कर बैठ गये। चन्द्रमा की दुःखद स्थिति को देखकर देवताओं ने चन्द्रमा को सलाह दिया कि मोदक एवं पकवानों से गणेश जी की पूजा करो। गणेश जी के प्रसन्न होने से शाप से मुक्ति मिलेगी। तब चन्द्रमा ने गणेश जी की पूजा की और उन्हें प्रसन्न किया। गणेश जी ने कहा कि शाप पूरी तरह समाप्त नहीं होगा ताकि अपनी गलती चन्द्रमा को याद रहे। दुनिया को भी यह ज्ञान मिले की किसी के रूप रंग को देखकर हंसी नहीं उड़ानी चाहिए। इसलिए अब से केवल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन जो भी चन्द्रमा को देखेगा उसे झूठा कलंक लगेगा।

क्या करें कि चन्द्रमा को इस देखने पर नहीं लगे कलंक

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चन्द्रमा बहुत ही सुन्दर होती है। इसे देखने की चाहत है तो संध्या के समय हाथ में फल अथवा दही लेकर चन्द्रमा का दर्शन करें। ऐसा करने पर चन्द्रमा को देखने से कलंक नहीं लगता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि एक अन्य विधि यह है कि पूरे भाद्रपद मास में हर दिन चन्द्रमा को देखें। जानबूझ कर अथवा अनजाने में ही भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन करेगा, वह अभिशप्त होगा। उसे बहुत दुःख उठाना पड़ेगा। गणेश पुराण के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा देख लेने पर कलंक अवश्य लगता हैं। ऐसा गणेश जी का वचन हैं।भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन न करें । पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार यदि भूल से चंद्र दर्शन हो जाये तो उसके निवारण के निमित्त श्रीमद्‌भागवत के 10वें स्कंध, 56-57वें अध्याय में उल्लेखित स्यमंतक मणि की चोरी कि कथा का श्रवण करना लाभकारक हैं। जिससे चंद्रमा के दर्शन से होने वाले मिथ्या कलंक का ज्यादा खतरा नहीं होगा। यदि अनिच्छा से चंद्र-दर्शन हो जाये तो व्यक्ति को निम्न मंत्र से पवित्र किया हुआ जल ग्रहण करना चाहिये। मंत्र का 21, 54 या 108 बार जप करें। ऐसा करने से वह तत्काल शुद्ध हो निष्कलंक बना रहता हैं।

मंत्र निम्न है…

सिंहः प्रसेनमवधीत्‌ , सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मा रोदीस्तव, ह्येष स्यमन्तकः ॥

अर्थात: सुंदर सलोने कुमार! इस मणि के लिये सिंह ने प्रसेन को मारा हैं और जाम्बवन्त ने उस सिंह का संहार किया हैं।अतः तुम रो मत। अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार हैं। चौथ के चन्द्रदर्शन से कलंक लगता है | इस मंत्र-प्रयोग अथवा स्यमन्तक मणि कथा के वचन या श्रवण से उसका प्रभाव कम हो जाता है |भगवान गणेश को ख़ुश करने के लिए ‘ॐ गं गणपतये नम:’ मंत्र का जप करने और गुड़ मिश्रित जल से गणेशजी को स्नान कराने एवं दूर्वा व सिंदूर की आहुति देने से विघ्न-निवारण होता है तथा मेधाशक्ति बढ़ती है ।

यह भी पढ़ें – कई विशेषताओं के परिचायक हैं ‘गणेशजी’ के अंग

RW

Editorial Review Note

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September 1, 2019 5 min read
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