वर-वधु के विवाह में नाड़ी दोष का महत्व
भारतीय वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत नाड़ी का निर्धारण जन्म नक्षत्र से किया जाता है। हर नक्षत्र में चार चरण होते हैं और 9 नक्षत्रों की एक नाड़ी मानी गई है। जन्म नक्षत्र के आधार पर ही नाडियों को तीन भाग में बाटा गया है, जैसे कि आदि नाड़ी, मध्य नाड़ी और अन्त्य नाड़ी।
ज्योतिष शास्त्र में सभी राशियों को चार वर्णों में विभाजित किया गया है।
ब्राह्मण वर्ण = कर्क, वृश्चिक, मीन
क्षत्रिय वर्ण = मेष, सिह, धनु
वैश्य वर्ण = वृष, कन्या, मकर
शूद्र वर्ण = मिथुन, तुला, कुम्भ
आदि नाडी = अश्विनी, आद्रा, पुर्नवसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद
मध्य नाडी = भरनी, मृगशिर, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़, घनिष्ठा, उत्तराभाद्रपद
अन्त्य नाडी = कृतिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढा, श्रवण और रेवती
नाडी दोष निवारण [ परिहार ] = मांगलिक कन्या को समंदोश वाले वर का दोष नही लगता
नाड़ी दोष निवारण के उपाय—
नाड़ी दोष जैसे विषय पर बात की जाये तो इसका जिक्र आते ही सबका ध्यान सबसे ज्यादा शादी-विवाह मे कुंडली मिलाप के समय लड़का-लड़की की नाड़ी पर जाता है कि दोनों की नाड़ी एक है या अलग। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने इसके पीछे एक समान्य धारणा मानी है की यदि वर और कन्या की नाड़ी एक है, दोनों का जन्म नक्षत्र एक नाड़ी मे आता है तो ये विवाह सही नहीं माना जाता क्यू की यदि इसमे शादी की जाये तो आदि नाड़ी से पति की मृत्यु की संभावना होती है और मध्य नाड़ी से कन्या मृत्यु की संभावना होती है। यही कारण है की नाड़ी दोष को वर्जित माना जाता है, ताकि विवाह के बाद वर-वधू के जीवन मे कोई समस्या ना आए। विवाह के समय कुंडली मिलान में बनने वाले दोषों में से एक है नाड़ी दोष. इस दोष के होने पर वैवाहिक स्थिति कभी ठीक नहीं रहती. साथ ही वर-वधू के जीवन पर मृत्यु का संकट मंडराया रहता है. नाड़ी दोष निवारण के लिए भगवान शिव की पूजा की जाती है. पूरे विधि-विधान से महामृत्युंजय मंत्र का जप करते हुए शिव को प्रसन्न किया जाता है. शिवजी की कृपा से ही नाड़ी दोष शांत होता है।
नाडी दोष की शान्ति संभव है. किन्तु इसमें कुछ शर्तें है…
- उम्र साठ वर्ष से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.
- शादी के बाद अधिक से अधिक आठ वर्ष तक प्रतीक्षा की जा सकती है. बारह वर्ष बीत जाने के बाद कुछ भी नहीं हो सकता है.
- नाडी दोष सूक्ष्मता पूर्वक निर्धारित होना चाहिए. यदि अंत की अंशात्मक स्थिति नहीं बनाती है, तो साक्षात दिखाई देने वाला नाडी दोष भी निरर्थक होता है. अर्थात वह नाडी दोष में आता ही नहीं है.
- पीयूष धारा ग्रन्थ के अनुसार – स्वर्ण दान, गऊ दान, वस्त्र दान, अन्न दान, स्वर्ण की सर्पाकृति बनाकर प्राणप्रतिष्ठा तथा महामृत्युञ्जय मंत्र का जप करवाने से नाड़ी दोष शान्त हो जाता है.
पंडित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं उपरोक्त शर्तों के आधार पर भी प्राथमिक स्तर पर निम्न उपाय किये जा सकते हैं…
जीरकभष्म, बंगभष्म, कमल के बीज, शहद, जिमीकंद, गुदकंद, सफ़ेद दूब एवं चिलबिला का अर्क एक-एक पाव लेकर शुद्ध घी में कम से कम सत्ताईस बार भावना दें.
- सत्ताईसवें दिन उसे निकाल कर अपने बलिस्त भर लबाई का रोल बना लें तथा उसके सत्ताईस टुकडे काट लें.
- इसके अलावा शिलाजीत, पत्थरधन, बिलाखा, कमोरिया एवं शतावर सब एक एक पाव लेकर एक में ही कूट पीस ले.
- नाकीरन पुखराज सात रत्ती का लेकर सोने की अंगूठी में जडवा लें.
- बनाए गए मिश्रण को नित्य सुबह एवं शाम गर्म दूध के साठ निगल लिया करें.
- शतावर आदि के चूर्ण को रोज एक छटाक लेकर गर्म पानी में उबाल लें जब वह ठंडा हो जाय तो उसे और थोड़े पानी में मिलकर रोज सूर्य निकलने के पहले स्नान कर ले.
- उस पुखराज को तर्जनी अंगुली में किसी भी दिन शनि एवं मंगल छोड़ कर पहन लें.
महामृत्युंजय जाप अवश्य करें
वर एवं कन्या दोनो मध्य नाड़ी मे उत्पन्न हो तो पुरुष को प्राण भय रहता है. इसी स्थिति मे पुरुष को महामृत्यंजय जाप करना यदि अतिआवश्यक है. यदि वर एवं कन्या दोनो की नाड़ी आदि या अन्त्य हो तो स्त्री को प्राणभय की सम्भावना रहती है. इसलिए इस स्थिति मे कन्या महामृत्युजय अवश्य करे.
नाड़ी दोष निवारण की पूजा

नाड़ी दोष निवारण की पूजा वर और वधू दोनों को साथ बिठाकर जाती है. इस पूजा में सवा लाख महामृत्युंजय मंत्रों का जप किया जाता है.
इस संकल्प के पश्चात सभी पंडित अपने यजमानों अर्थात जातकों के लिए नाड़ी दोष निवारण मंत्र अर्थात महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना शुरू कर देते हैं तथा प्रत्येक पंडित इस मंत्र के जाप को प्रतिदिन लगभग 8 से 10 घंटे तक करता है जिससे वे इस मंत्र की 125,000 संख्या के जाप को संकल्प के दिन निश्चित की गई अवधि में पूर्ण कर सकें.

निश्चित किए गए दिन पर जाप पूरा हो जाने पर इस जाप तथा पूजा के समापन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है जो लगभग 2 से 3 घंटे तक चलता है. सबसे पहले भगवान शिव, मां पार्वती, भगवान गणेश तथा शिव परिवार के अन्य सदस्यों की पूजा फल, फूल, दूध, दहीं, घी, शहद, शक्कर, धूप, दीप, मिठाई, हलवे के प्रसाद तथा अन्य कई वस्तुओं के साथ की जाती है तथा इसके पश्चात मुख्य पंडित के द्वारा नाड़ी दोष के निवारण मंत्र का जाप पूरा हो जाने का संकल्प किया जाता है जिसमे यह कहा जाता है कि मुख्य आचार्य (पंडित) ने अपने सहायक अमुक अमुक पंडितों की सहायता से इस मंत्र की 125,000 संख्या का जाप निर्धारित विधि तथा निर्धारित समय सीमा में सभी नियमों का पालन करते हुए किया है तथा यह सब उन्होंने अपने यजमानों अर्थात जातकों के लिए किया है जिन्होंने जाप के शुरू होने से लेकर अब तक पूर्ण निष्ठा से पूजा के प्रत्येक नियम की पालना की है तथा इसलिए अब इस पूजा से विधिवत प्राप्त होने वाला सारा शुभ फल उनके यजमानों को प्राप्त होना चाहिए.
इस समापन पूजा के चलते नवग्रहों से संबंधित अथवा नवग्रहों में से कुछ विशेष ग्रहों से संबंधित कुछ विशेष वस्तुओं का दान किया जाता है जो विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकता है तथा इन वस्तुओं में सामान्यतया चावल, गुड़, चीनी, नमक, गेहूं, दाल, खाद्य तेल, सफेद तिल, काले तिल, जौं तथा कंबल इत्यादि का दाने किया जाता है. इस पूजा के समापन के पश्चात उपस्थित सभी देवी देवताओं का आशिर्वाद लिया जाता है तथा तत्पश्चात हवन की प्रक्रिया शुरू की जाती है जो जातकों तथा पूजा का फल प्रदान करने वाले देवी देवताओं अथवा ग्रहों के मध्य एक सीधा तथा शक्तिशाली संबंध स्थापित करती है. औपचारिक विधियों के साथ हवन अग्नि प्रज्जवल्लित करने के पश्चात तथा हवन शुरू करने के पश्चात नाड़ी दोष के निवारण मंत्र का जाप पुन: प्रारंभ किया जाता है तथा प्रत्येक बार इस मंत्र का जाप पूरा होने पर स्वाहा: का स्वर उच्चारण किया जाता है जिसके साथ ही हवन कुंड की अग्नि में एक विशेष विधि से हवन सामग्री डाली जाती है तथा यह हवन सामग्री विभिन्न पूजाओं तथा विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकती है.
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नाड़ी दोष निवारण मंत्र की हवन के लिए निश्चित की गई जाप संख्या के पूरे होने पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण मंत्रों का उच्चारण किया जाता है तथा प्रत्येक बार मंत्र का उच्चारण पूरा होने पर स्वाहा की ध्वनि के साथ पुन: हवन कुंड की अग्नि में हवन सामग्री डाली जाती है.
इस पूजन के अंत में एक सूखे नारियल को उपर से काटकर उसके अंदर कुछ विशेष सामग्री (घी-शक्कर बुरा) भरी जाती है तथा इस नारियल को विशेष मंत्रों के उच्चारण के साथ हवन कुंड की अग्नि में पूर्ण आहुति के रूप में अर्पित किया जाता है तथा इसके साथ ही इस पूजा के इच्छित फल एक बार फिर मांगे जाते हैं.
तत्पश्चात यजमानों अर्थात जातकों को हवन कुंड की 3, 5 या 7 परिक्रमाएं करने के लिए कहा जाता है तथा वर वधू के इन परिक्रमाओं को पूरा करने के पश्चात तथा पूजा करने वाले पंडितों का आशिर्वाद प्राप्त करने के पश्चात यह पूजा संपूर्ण मानी जाती है. हालांकि किसी भी अन्य पूजा की भांति नाड़ी दोष निवारण पूजा में भी उपरोक्त विधियों तथा औपचारिकताओं के अतिरिक्त अन्य बहुत सी विधियां तथा औपचारिकताएं पूरी की जातीं हैं किन्तु उपर बताईं गईं विधियां तथा औपचारिकताएं इस पूजा के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं.
१. पूजा के पहले दिन 5 से 7 ब्राह्मण, पूजा कराने वाले लोग पूजा घर या मंदिर में साथ बैठकर भगवान शिव की आराधना करते हैं. शिव परिवार की पूजा करने के बाद मुख्य पंडितजी अपने सहायकों सहित कन्या और वर की कुंडली में स्थित नाड़ी दोष के निवारण के लिए सवा लाख महामृत्युंजय मंत्र के जप का संकल्प लेते हैं.
२. जप पूरा हो जाने के बाद विधि पूर्वक हवन कर ज्योतिषाचार्यों के परामर्श के अनुसार दान दिया जाता है
३.आमतौर पर यदि वर और कन्या की कुंडली में नाड़ी दोष हो तो विवाह न करने की सलाह दी जाती है. लेकिन कुछ खास परिस्थितियों में जरूरी उपाय करके इस दोष को शांत किया जा सकता है. इसक लिए ब्राह्मण को गाय का दान दिया जाता है.
४.ब्राह्मण को स्वर्ण का दान देने से भी नाड़ी दोष शांत होता है.
५. अपने जन्मदिन पर अपने वजन के बराबर अन्न का दान करने पर नाड़ी दोष के प्रभावों से शांति मिलती है.
६.समय-समय पर ब्राह्मणों को भोजन कराकर वस्त्र दान करने से भी नाड़ी दोष के प्रभावों को शांत किया जा सकता है.
७.पीयूष धारा के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के विवाह में नाड़ी दोष बाधा वन रहा है तो उसे स्वर्ण दान, वस्त्र दान, अन्न दान करना चाहिए. सोने से सर्प की आकृति बनाकर, उसकी विधि पूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा करके महामृत्युंजय मंत्र का जप कराने से नाड़ी दोष शांत होता है.
नाड़ी दोष निवारण के लिए की जाने वाली पूजा के आरंभ होने से लेकर समाप्त होने तक पूजा करवाने वाले जातकों को भी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है. इस अवधि के भीतर दोनों जातकों के लिए प्रत्येक प्रकार के मांस, अंडे, मदिरा, धूम्रपान तथा अन्य किसी भी प्रकार के नशे का सेवन निषेध होता है अर्थात जातकों को इन सभी वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त जातकों को इस अवधि में परस्पर शारीरिक संबंध अथवा किसी भी अन्य व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिएं. इसके अतिरिक्त जातकों को इस अवधि में किसी भी प्रकार का अनैतिक, अवैध, हिंसात्मक तथा घृणात्मक कार्य आदि भी नहीं करना चाहिए. इसके अतिरिक्त जातकों को प्रतिदिन मानसिक संकल्प के माध्यम से नाड़ी दोष निवारण पूजा के साथ अपने आप को जोड़ना चाहिए तथा प्रतिदिन स्नान करने के पश्चात दोनों जातकों को इस पूजा का समरण करके यह संकल्प करना चाहिए कि नाड़ी दोष निवारण पूजा उनके लिए अमुक स्थान पर अमुक संख्या के पंडितों द्वारा नाड़ी दोष निवारण मंत्र के 125,000 संख्या के जाप से की जा रही है तथा इस पूजा का विधिवत और अधिकाधिक शुभ फल उन्हें प्राप्त होना चाहिए. ऐसा करने से जातक मानसिक रूप से नाड़ी दोष निवारण पूजा के साथ जुड़ जाते हैं तथा जिससे इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल और भी अधिक शुभ हो जाते हैं.
— वर एवं कन्या मे से जिसे मारकेश की दशा चल रही हो उसको दशानाथ का उपाय दशाकाल तक अवश्य करना चाहिए.
-विशाखा, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवति, हस्त, स्वाति, आद्र्रा, पूर्वाभद्रपद इन 8 नक्षत्रो मे से किसी नक्षत्र मे वर कन्या का जन्म हो तो नाड़ी दोष नही रहता है.
–उत्तराभाद्रपद, रेवती, रोहिणी, विषाख, आद्र्रा, श्रवण, पुष्य, मघा, इन नक्षत्र मे भी वर कन्या का जन्म नक्षत्र पडे तो नाड़ी दोष नही रहता है. उपरोक्त मत कालिदास का है.
-वर एवं कन्या के राषिपति यदि बुध, गुरू, एवं शुक्र मे से कोई एक अथवा दोनो के राशिपति एक ही हो तो नाड़ी दोष नही रहता है.
–नाड़ी दोष विप्र वर्ण पर प्रभावी माना जाता है. यदि वर एवं कन्या दोनो जन्म से विप्र हो तो उनमे नाड़ी दोष प्रबल माना जाता है. अन्य वर्णो पर नाड़ी पूर्ण प्रभावी नही रहता. यदि विप्र वर्ण पर नाड़ी दोष प्रभावी माने तो नियम नं घ का हनन होता हैं. क्योंकि बृहस्पती एवं शुक्र को विप्र वर्ण का माना गया हैं. यदि वर कन्या के राशिपति विप्र वर्ण ग्रह हों तो इसके अनुसार नाडी दोष नही रहता. विप्र वर्ण की राशियों में भी बुध व षुक्र राशिपति बनते हैं.
–सप्तमेश स्वगृही होकर शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो एवं वर कन्या के जन्म नक्षत्र चरण में भिन्नता हो तो नाडी दोष नही रहता हैं. इन परिहार वचनों के अलावा कुछ प्रबल नाडी दोष के योग भी बनते हैं जिनके होने पर विवाह न करना ही उचित हैं. यदि वर एवं कन्या की नाडी एक हो एवं निम्न में से कोई युग्म वर कन्या का जन्म नक्षत्र हो तो विवाह न करें.
–वर कन्या की एक राशि हो लेकिन जन्म नक्षत्र अलग-अलग हो या जन्म नक्षत्र एक ही हो परन्तु राशियां अलग हो तो नाड़ी नही होता है. यदि जन्म नक्षत्र एक ही हो लेकिन चरण भेद हो तो अति आवश्यकता अर्थात् सगाई हो गई हो, एक दुसरे को पंसद करते हों तब इस स्थिति मे विवाह किया जा सकता है.
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि नाड़ी दोष निवारण के लिए की जाने वाली पूजा जातकों की अनुपस्थिति में भी की जा सकती है तथा जातकों के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की स्थिति में इस पूजा में जातकों की तस्वीरों अर्थात फोटो का प्रयोग किया जाता है जिसके साथ साथ जातकों के नाम, उनके पिता के नाम तथा उसके गोत्र आदि का प्रयोग करके जातकों के लिए इस पूजा का संकल्प किया जाता है. इस संकल्प में यह कहा जाता है कि दोनों जातक किसी कारणवश इस पूजा के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में सक्षम नहीं हैं जिसके चलते पूजा करने वाले पंडितों में से ही दो पंड़ित जातकों के लिए जातकों के द्वारा की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं पूरा करने का संकल्प लेते हैं तथा उसके पश्चात पूजा के समाप्त होने तक वह पंडित ही जातकों की ओर से की जाने वाली सारी क्रियाएं करते हैं जिसका पूरा फल संकल्प के माध्यम से जातकों को प्रदान किया जाता है. प्रत्येक प्रकार की क्रिया को करते समय जातकों की तस्वीर अर्थात फोटो को उपस्थित रखा जाता है तथा उसे सांकेतिक रूप से जातक ही मान कर क्रियाएं की जातीं हैं. उदाहरण के लिए यदि जातक के स्थान पर पूजा करने वाले पंडित को भगवान शिव को पुष्प अर्थात फूल अर्पित करने हैं तो वह पंडित पहले पुष्प धारण करने वाले अपने हाथ को जातक के चित्र से स्पर्श करता है तथा तत्पश्चात उस हाथ से पुष्पों को भगवान शिव को अर्पित करता है तथा इसी प्रकार सभी क्रियाएं पूरी की जातीं हैं. यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि व्यक्तिगत रूप से अनुपस्थित रहने की स्थिति में भी जातकों को पूजा के आरंभ से लेकर समाप्त होने की अवधि तक पूजा के लिए निश्चित किये गए नियमों का पालन करना होता है भले ही दोनों जातक संसार के किसी भी भाग में उपस्थित हों. इसके अतिरिक्त जातकों को उपर बताई गई विधि के अनुसार अपने आप को इस पूजा के साथ मानसिक रूप से संकल्प के माध्यम से जोड़ना भी होता है जिससे इस पूजा के अधिक से अधिक शुभ फल जातकों को प्राप्त हो सकें.
पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जो लोग नाड़ी दोष के बावजूद भी शादी कर लेते है वो लोग इस पूजा को कर लाभ प्राप्त कर सकते है.
इसके लिए सोने का सांप बनवाकर, उसकी पूजा करने के बाद महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए. जप हो जाने के बाद व्यक्ति को अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार सोना, गाय, वस्त्र अथवा अन्न का दान देना चाहिए. इसके उपरांत वे सभी लोग नाड़ी दोष को शांत कर अपना विवाह बिना किसी परेशानी के सफल कर सकते है.
पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शोधित नाडीदोष के सिद्ध हो जाने पर यह नुस्खा बहुत अच्छा काम करता है. किन्तु यदि नाडी दोष अंतिम अंशो पर है तो कोई उपाय या यंत्र-मन्त्र आदि काम नहीं करेगें. क्योकि सूखा हो, गिरा हो, टूटा हो या उपेक्षित हो, यदि कूवाँ होगा तो उसका पुनरुद्धार किया जा सकता है. किन्तु यदि कूवाँ होगा ही नहीं तो उसके पुनरुद्धार की कल्पना भी नहीं की जा सकती.
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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