कामाख्या मंदिर का प्रसिद्ध अम्बुवाची मेला आरम्भ
गुवाहाटी, 23 जून; कामाख्या मंदिर को आलौकिक शक्तियों और तंत्र सिद्धि का प्रमुख स्थान माना जाता है। माता के सभी शक्तिपीठों में से कामाख्या शक्तिपीठ को सर्वोत्तम कहा जाता है। माता सती के प्रति भगवान शिव का मोह भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 51 भाग किए थे।
जिस-जिस जगह पर माता सती के शरीर के अंग गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए। कहा जाता है कि यहां पर माता सती का योनि भाग गिरा था, उसी से कामाख्या महापीठ की उत्पत्ति हुई।
कामाख्या शक्तिपीठ गुवाहाटी (असम) के पश्चिम में 8 कि.मी. दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है. 22 जून से मंदिर में अंबूबाची पर्व आरम्भ हो चूका है. ऐसी मान्यता है कि इस अवधि के मध्यस्थ कामाख्या माँ रजस्वाला रहती हैं इसी क्रम में मंदिर का पट 22 जून से 24 जून तक बन्द रहता है और ब्रह्मपुत्र नदी का जल भी लाल हो जाता है। मंदिर का पट 25 जून को प्रातः 05:30 बजे खुल जाता है और श्रद्धालु 06 बजे सुबह से रात्रि 10 बजे तक पूजा-अर्चना करने के लिए स्वतंत्र रहते हैं। कामाख्या मां की पूजा से मन व आत्मा को परम शान्ति मिलती है तथा कन्या पूजन से चमत्कारिक अनुभव प्राप्त होता है। मां कामाख्या मन्दिर एवं पीठ का रहस्य है जो भी प्राणी (कामाख्या मन्दिर) यहां आकर दर्शन कर लेता है, उसके कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है। साधना का कोई बन्धन हो तो वह खुल जाता है। किसी के शाप से शापित हो तो मां के यहां का जल पीने से वह शाप मुक्त हो जाता है। इसलिए देश के विभिन्न भागों से यहां तंत्रिक और साधक जुटते हैं. आस-पास की गुफाओं में रहकर वह साधना करते हैं।
क्या है अम्बुवाची मेला ?
अम्बुवाची मेला को अम्बुवाची नाम से भी जाना जाता है। इसको अमेठी और तांत्रिक जन्म क्षमता का पर्व मनाया समझ कर मनाया जाता है। अम्बुबासी शब्द अंबु और बाती दो शब्दों के मेल से बना है जिसमें अंबु का अर्थ है पानी जबकि बाची का अर्थ है उतफूलन। शायद इसीलिए यह स्त्रियों की शक्ति और उनकी जन्म क्षमता को दर्शाता है। यह मेला हर साल यहां मनाया जाता है जिसको महाकुंभ भी कहा जाता है।
शक्तियों का होता है प्रदर्शन
कामाख्या मंदिर के अम्बुबाची मेले के दौरान तांत्रिक शक्तियों को काफी महत्व दिया जाता है। यहां सैकड़ों तांत्रिक अपने एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं। यह तांत्रिक मेले के दौरान लोगों को वरदान देने के साथ-साथ उनकी सहायता भी करते हैं।ऐसा माना जाता है कि कोई भी व्यक्ति जब तक पूरन तांत्रिक नहीं बन जाता तब तक वह कामाख्या देवी के सामने माथा ना टेके वरना इससे देवी नाराज हो सकती है।
पशुओं की दी जाती है बलि
हालांकि पशुओं की बलि देना देश में वर्जित है परंतु यहां बकरे और भैंस की बलि देना आम बात है। पशुओं की बलि देकर और भंडारा करने के बाद ही कामाख्या देवी प्रसन्न होती हैं। इस मंदिर में जाने से हर प्रकार के काले जादू और श्राप से छुटकारा मिल जाता है।
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