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स्वस्तिक के उपयोग/लाभ : सकारात्मकता ऊर्जा, सफलता और समृद्धि का चिन्ह

स्वस्तिक के उपयोग/लाभ : सकारात्मकता ऊर्जा, सफलता और समृद्धि का चिन्ह

स्वस्तिक के उपयोग/लाभ : सकारात्मकता ऊर्जा, सफलता और समृद्धि का चिन्ह
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स्वस्तिक के उपयोग/लाभ : सकारात्मकता ऊर्जा, सफलता और समृद्धि का चिन्ह

स्वस्तिक के उपयोग/लाभ : : सकारात्मकता ऊर्जा, सफलता और समृद्धि का चिन्ह 

स्वस्तिक से सकारात्मक ऊर्जा अधिक होने से वास्तुदोष समाप्त होते है। हर मांगलिक कार्य पर जिस स्वस्तिक की रचना हल्दी कुमकुम और सिंदूर से की जाती है, जिसे सतिया भी कहा जाता है जिसे भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है और जिसमें समस्त देवी-देवताओं के वास की मान्यता है। हिंदू धर्म के लोगों की आस्था के इस प्रतीक को धन वैभव और सुख समृद्धि प्रदान करने वाला माना जाता है।

किसी भी धार्मिक काम में या किसी भी पूजा में घर के मुख्यद्वार पर या बाहर की दीवार स्वस्तिक का निशान बनाकर स्वस्ति वाचन करते हैं। स्वस्तिक श्रीगणेश का ही प्रतीक स्वरूप है। किसी भी पूजन कार्य काे शुरू करने से पहले स्वस्तिक का चिन्ह जरूरी होता है। ज्योतिषी एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शास्त्रों के अनुसार श्री गणेश प्रथम पूजनीय हैंए और स्वस्तिक का पूजन करने का मतलब है कि हम श्रीगणेश का पूजन कर उनसे विनती करते हैं कि हमारा पूजन कार्य सफल हो।

वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के मुख्य द्वार पर श्रीगणेश का चित्र या स्वस्तिक बनाने से घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है। ऐसे घर में हमेशा गणेशजी कृपा रहती है और धन-धान्य की कमी नहीं होती। साथ ही स्वस्तिक धनात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक है, इसे बनाने से हमारे आसपास से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। इसका प्रयोग रसोईघर, तिजोरी, स्टोर, प्रवेशद्वार, मकान, दुकान, पूजास्थल एवं कार्यालय में किया जाता है। यह तनाव, रोग, क्लेश, निर्धनता एवं शत्रुता से मुक्ति दिलाता है।

वास्तु अनुसार दिशाएं दस मानी जाती हैं लेकिन मुख्य दिशाएं पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण ये चार ही हैं, इन चारों दिशाओं के अधिपति देवता अग्नि, इंद्र, वरुण एवं सोम माने जाते हैं। दिशाओं के देवताओं के साथ-साथ सप्तऋषियों की हिंदूमें बहुत मान्यता है। इन सभी की पूजा और आशीर्वाद के लिये स्वस्तिक का प्रयोग किया जाता है। स्वस्तिक की संरचना भी सभी दिशाओं के महत्व को दर्शाती है। इसलिये इसे दिशाओं का प्रतीक माना जाता है। 

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स्वास्तिक का अर्थ है शुभ और अच्छा होना। स्वास्तिक कल्याणकारी और शुभ होता है। घर के सारे कष्टों को दूर करता है स्वास्तिक। मां लक्ष्मी और भगवान गणेश जी का प्रतिक चिन्ह होता है स्वास्तिक। इसलिए किसी भी पूजा को शुरू करने से पहले स्वास्तिक बनाया जाता है। 

स्वस्तिक की चार रेखाएं ऋग्, यजु, साम और अथर्व आदि चारों वेद, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि चारों सिद्धांत एवं ज्ञान, कर्म, योग और भक्ति आदि चारों मार्गों की भी प्रतीक हैं। इस प्रकार से मनुष्य के जीवन चक्र जिसमें शैशव, किशोरावस्था, जवानी और बुढापा या कहें जीवन के चारों आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास का प्रतीक भी स्वस्तिक माना जाता है। 

इतना ही नहीं प्राणी मात्र की गति जो कि नरक, त्रियंच, मनुष्य और देव आदि चार ही होती हैं इनका एवं सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग आदि चारों युगों का द्योतक भी स्वस्तिक को माना जाता है। स्वस्तिक की संरचना गणित के धन चिन्ह यानि जोड़ यानि योग को दर्शाती हैं इस तरह यह योग और जोड़ का प्रतीक भी माना जाता है। स्वास्तिक 27नक्षत्रों को सन्तुलित करके सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। यह चिह्न नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसका भरपूर प्रयोग अमंगल व बाधाओं से मुक्ति दिलाता है।

स्वस्तिक को ‘साथिया’ या ‘सातिया’ भी कहा जाता है। वैदिक ऋषियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर कुछ विशेष चिह्नों की रचना की। मंगल भावों को प्रकट करने वाले और जीवन में खुशियां भरने वाले इन चिह्नों में से एक है स्वस्तिक। उह्नोंने स्वस्तिक के रहस्य को सविस्तार उजागर किया और इसके धार्मिक, ज्योतिष और वास्तु के महत्व को भी बताया। आज स्वस्तिक का प्रत्येक धर्म और संस्कृति में अलग-अलग रूप में इस्तेमाल किया जाता है। 

सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई में ऐसे चिह्न व अवशेष प्राप्त हुए हैं जिससे यह प्रमाणित होता है कि कई हजार वर्ष पूर्व मानव सभ्यता अपने भवनों में इस मंगलकारी चिह्न का प्रयोग करती थी। सिन्धु घाटी से प्राप्त मुद्रा और बर्तनों में स्वस्तिक का चिह्न खुदा हुआ मिला है। उदयगिरि और खंडगिरि की गुफा में भी स्वस्तिक के चिह्न मिले हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों में स्वस्तिक का महत्व भरा पड़ा है। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा संस्कृति, अशोक के शिलालेखों, रामायण, हरिवंश पुराण, महाभारत आदि में इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में स्वास्तिक को भगवान विष्णु का प्रतीक बताया गया है। 

मंगलकारी प्रतीक चिह्न स्वस्तिक अपने आप में विलक्षण है। यह मांगलिक चिह्न अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल- प्रतीक माना जाता रहा है। विघ्नहर्ता गणेश की उपासना धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ भी शुभ लाभ, स्वस्तिक तथा बहीखाते की पूजा की परम्परा है। इसे भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है। इसीलिए जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई मंगल व शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वस्तिक को ही अंकित किया जाता है।

वैज्ञानिक हार्टमेण्ट अनसर्ट ने आवेएंटिना नामक यन्त्र द्वारा लाल कुमकुम से अंकित स्वास्तिक की सकारात्मक ऊर्जा को 100000 बोविस यूनिट में नापा है। इस शोध के अनुसार ‘ॐ’ जिसकी पॉजिटिव ऊर्जा तकरीबन 70000 बोविस है, से भी अधिक सकारात्मक ऊर्जा स्वास्तिक में विद्यमान है। ‘ॐ’ एवं स्वास्तिक का सामूहिक प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को शीघ्रता से दूर करता है।

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यह होते हैं स्वस्तिक के लाभ

स्वस्तिक हर दिशा से देखने पर समान दिखाई देता है इसलिये घर के वास्तु को ठीक करने के लिये यह बहुत लाभकारी माना जाता है दरअसल स्वस्तिक को वास्तुशास्त्र में वास्तु का प्रतीक भी माना गया है। मान्यता है कि यदि घर के मुख्य द्वार पर दोनों और अष्ट धातु का स्वस्तिक लगाया जाये और द्वार के ठीक उपर मध्य में तांबे का स्वस्तिक लगाया जाये तो इससे समस्त वास्तुदोष दूर हो जाते हैं। स्वास्तिक के प्रयोग से धनवृद्धि, गृहशान्ति, रोग निवारण, वास्तुदोष निवारण, भौतिक कामनाओं की पूर्ति, तनाव, अनिद्रा व चिन्ता से मुक्ति मिलती है। जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वास्तिक को ही अंकित किया जाता है। ज्योतिष में इस मांगलिक चिह्न को प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, सफलता व उन्नति का प्रतीक माना गया है।

– जीवन में यदि परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो पंच धातु के स्वस्तिक को प्राण प्रतिष्ठा करवाकर चौखट पर लगवाने से सकारात्मक परिणाम मिलने लगते हैं। धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिये चांदी में नवरत्न लगवाकर पूर्व दिशा में स्वस्तिक लगाया जाता है। 

– घर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक का चिह्न बनाने से यदि आपके घर में कोई हमेशा बीमार रहता है या कोई परेशानी चल रही है तो  वह दूर हो जाएगी । मुख्य द्वार पर 6.5 इंच का स्वास्तिक बनाकर लगाने से अनेक प्रकार के वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। हल्दी से अंकित स्वास्तिक शत्रु का शमन करता है।  –

– ज्योतिषी एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि आपके घर के सामने पेड़ या खंभा हैए तो यह एक अशुभ संकेत है। इसके दुष्प्रभावों को रोकने के लिए घर के मुख्य द्वार पर रोज स्वास्तिक बनाएं।

– व्यापार में वृद्धि के लिये भी कार्यस्थल पर विद्वान आचार्य से स्वस्तिक का निर्माण करवाया जाता है। कार्यस्थल पर उत्तर दिशा में हल्दी से स्वस्तिक बनाने से भी बहुत लाभ होता है।

– जिस भी देवता को आप प्रसन्न करना चाहते हैं स्वस्तिक बनाकर उक्त देवता की मूर्ति रख दें, देवता खुश हो जायेंगें। अपने ईष्टदेव का यदि को पूजास्थल है तो उनके आसन के ऊपर भी स्वस्तिक चिन्हं जरुर बनाना चाहिये।

– धन लाभ के लिये स्वस्तिक से एक विशेष उपाय और किया जाता है। इस में दहलीज के दोनों ओर स्वस्तिक बनाकर उसकी पूजा करें। स्वस्तिक पर चावल की ढेरी बनाकर एक-एक सुपारी पर कलवा बांधकर उसे ढेरी पर रखें इस उपाय से भी धन में लाभ मिलता है।

– इतना ही नहीं देव स्थान पर स्वस्तिक बनाकर यदि नियमित रुप से उस पर पंच धान्य या दीपक जलाकर रखा जाये तो पूजा के समय जिस भी कार्य के पूर्ण होने की कामना करते हैं वह जरुर पूर्ण होता है। 

– स्वस्तिक मनोकामनाओं या फिर धन लाभ के लिये ही नहीं अपितु स्वास्थ्य के लिये भी लाभदायक होता है। बूरे सपने आपको परेशान करते हैं या फिर बेचैनी के कारण आपको नींद आने में परेशानी होती है तो सोने से पहले अपनी तर्जनी से स्वस्तिक बनाकर सोयें, फर्क खुद ब खुद महसूस करेंगें।यदि आप मनोकामना पूरी करना चाहते हैं तो किसी भी मंदिर में कुमकुम या गोबर का उल्टा स्वास्तिक चिन्ह बना लें और जैसे ही आपकी मनोकामना पूरी हो जाए तब आप मंदिर में सीधा स्वास्तिक बनाएं।

– पितरों की कृपा प्राप्ति के लिये भी स्वस्तिक लाभकारी होता है।घर में गोबर से स्वास्तिक चिन्ह बनाने से घर में पितरों की कृपा और सुख व समृद्धि के साथ शान्ति भी आती है।

स्‍वास्‍तिक निर्माण कैसे करें

ज्योतिषी एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की स्वास्तिक बनाने के लिए धन (+) चिह्न बनाकर उसकी चारो भुजाओं के कोने से समकोण बनाने वाली एक रेखा दाहिनी ओर खींचने से स्वास्तिक बन जाता है। रेखा खींचने का कार्य ऊपरी भुजा से प्रारम्भ करना चाहिए। इसमें दक्षिणवर्त्ती गति होती है। सदैव कुमकुम, सिन्दूर व अष्टगंध से ही स्‍वास्‍तिक का चिह्न अंकित करना चाहिए।

जानिए किस रंग/सामग्री से बनायें स्वस्तिक

ज्यादातर मौकों पर स्वस्तिक को हल्दी से ही बनाया जाता है। ईशान या उत्तर दिशा में दीवार पर यदि पीले रंग का स्वस्तिक बनाते हैं तो यह घर में सुख शांति बनाये रखने में लाभकारी होता है। इसी प्रकार मांगलिक कार्य के लिये लाल रंग का स्वस्तिक बनाना शुभ रहता है। सामग्री के तौर पर केसर, सिंदूर, रोली और कुंकुम का इस्तेमाल आप कर सकते हैं।

काला स्वास्तिक 

जिस प्रकार लाल रंग का स्वास्तिक का चिन्ह घर की खुशहाली का द्योतक हैं ठीक उसी प्रकार कोयले से बना काला स्वास्तिक बुरी नजर और बुरे समय को दूर करने के लिए बेहद ही उपयोगी और अचूक उपाय माना जाता हैं । ज्योतिषी एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की काला स्वास्तिक भूत – प्रेत अर्थात शमशानी शक्तियों से घर को मुक्त रखने के लिए बेहद उपयोगी होता हैं क्योंकि यह इन सभी बुरी शक्तियों को अपने बस में कर लेता हैं ।

बुरी नजर से बचने के लिए भी काला स्वास्तिक बहुत ही शुभ होता हैं। बुरी नजर से अपने घर को बचाने के लिए होली के दिन एक भोजपत्र लें और उस पर कोयले से काला स्वास्तिक बना लें । अब इस भोजपत्र को अपने गले में धारण कर लें ।गले में भोजपत्र को धारण करने पर आपको किसी की बुरी नजर नहीं लगेगी तथा आपके जीवन में शुभता आएगी ।

ज्योतिषी एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि आपके घर परिवार के सदस्यों पर या आपके व्यवसाय को किसी की बुरी नजर लग गई हैं तो इस बुरी नजर के कुप्रभाव से बचने के लिए अपने घर के मुख्य द्वार पर कोयले से एक स्वास्तिक का चिन्ह बना लें। मुख्य द्वार की दीवार पर काले स्वास्तिक के चिन्ह को बनाने से आपके घर पर किसी भी व्यक्ति की बुरी नजर का प्रभाव नहीं होगा ।

लाल स्वास्तिक

सामान्यत: हम अपने घर के प्रवेश द्वार पर कुमकुम या रोली का इस्तेमाल कर स्वास्तिक का चिन्ह बनाते हैं. स्वास्तिक के चिन्ह को बहुत ही पवित्र तथा शुभ माना जाता हैं। स्वास्तिक के चिन्ह को श्री गणेश भगवान का प्रतीक माना जाता हैं। ऐसा माना जाता हैं कि स्वास्तिक के चिन्ह को बनाने से घर पर इसका शुभ प्रभाव पड़ता हैं तथा घर में सुख, समृद्धि आती हैं ।

ज्योतिषी एवं वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि किसी व्यक्ति को रात को सोते समय बुरे सपने आते हैं तो इसके लिए सोने से पहले अपनी तर्जनी उंगली से लाल स्वास्तिक का चिन्ह बना लें और इसके बाद सोने के लिए जाएँ । इस चिन्ह को बनाने के बाद जब आप सोने जायेंगें तो आपको चैन की नींद आएगी तथा आपको बुरे सपने नहीं आयेंगे ।

अशुद्ध स्‍थानों पर ना बनाएं स्‍वास्‍तिक

स्वास्तिक का प्रयोग शुद्ध, पवित्र एवं सही ढंग से उचित स्थान पर करना चाहिए। शौचालय एवं गन्दे स्थानों पर इसका प्रयोग वर्जित है। ऐसा करने वाले की बुद्धि एवं विवेक समाप्त हो जाता है। दरिद्रता, तनाव एवं रोग एवं क्लेश में वृद्धि होती है।

स्वास्तिक के इन अचूक उपायों को करने से आपको बहुत फायदा मिलता है। यदि आप चाहते हैं कि सभी तरह के कष्ट और रोग आपके घर से दूर हों तो आप इन बताए गए उपायों को ध्यान से और विशवास के साथ करें। 

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पंडित दयानन्द शास्त्री,

(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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April 15, 2018 11 min read
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