यदि यह सच है तो जिन देशों में धर्म नहीं है या जो नास्तिक देश हैं वहाँ तो कोई झगड़ा या युद्ध नहीं होना ही नहीं चाहिए।
लेकिन सत्य तो यह है कि दुनिया के हर भाग में युद्ध एवं अनेक प्रकार के दंगे इत्यादि होते ही रहते हैं अौर उनका कारण सामाजिक, राजनीतिक, अार्थिक इत्यादि होता है। यहाँ तक कि प्रथम विश्व युद्ध एवं द्वितीय विश्व युद्ध का भी कारण धर्म न होकर कुछ अौर ही था।
अौर जब कभी धर्म को बीच में रखकर भी लड़ाई-झगड़े होते हैं तो कारण धन एवं सत्ता ही होता है, धर्म के नाम पर धर्म को केवल बदनाम किया जाता है।
धर्म के कारण झगड़े-फसाद नहीं होते अपितु वास्तविक धर्म की समझ एवं भगवान् की विस्मृति के कारण समाज में उथल-पुथल अौर हिंसा होती है। जब समाज के अग्रणी लोग सादा जीवन अौर उच्च विचारों के साथ जीवन नहीं बिताते अौर उनके जीवन के मूल्य अौर विचार निम्न कोटि के हो जाते हैं तो मानव मानवता को नहीं निभा पाता अौर पाश्विक चेतना के कारण जंगल राज प्रारम्भ हो जाता है।
जब लोग जीवन के वास्तविक उद्देश्य को न समझकर केवल अपने भोग-विलास का जीवन जीना स्वीकार करते हैं तो वे इतने स्वार्थी हो जाते हैं कि अपने सुख के लिए वे किसी को भी हानि पहुँचाने से नहीं चूकते अौर जिसके कारण सभी प्रकार के दंगे-फसाद स्वभाविक हैं। अौर लोग अपने स्वार्थी हितों की पूर्ति हेतु धर्म का सहारा लेते हैं।
वास्तविक धर्म तो व्यक्ति को दूसरों के अस्तित्व एवं भावनाअों के प्रति संवेदनशील होना सिखाता है न कि उन्हें हानि पहुँचाना, वास्तविक धर्म ही व्यक्ति को जंगल राज एवं मानवता में भेद सिखाता है अौर सभी जीवों को एक-दूसरे के भाई-बहन होने की शिक्षा देता है। क्योंकि धार्मिक शिक्षाअों से ही हमें ज्ञात होता है कि इस पूरे जगत् के स्वामी भगवान् हैं जो हम सभी के मूल पिता हैं, अौर क्योंकि वे हम सभी के पिता हैं अौर हम सभी उन्हीं की संतान हैं, तो हम सभी एक दूसरे के भाई बहन हैं। श्रीमद भगवद- गीता में भगवान बताते हैं, :
सर्व-योनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासाम् ब्रह्म महत् योनिः अहम् बीज
इस श्लोक में स्पष्ट बताया गया है कि भगवान् श्रीकृष्ण समस्त जीवों के आदि पिता हैं | सारे जीव भौतिक प्रकृति तथा आध्यात्मिक प्रकृति के संयोग हैं | इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि हर जीव भगवान का अंश है अतएव सबके पिता एक ही होने के कारण सभी आपस में सम्बंधित हैं ।
एक अौर अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जो कोई भी भगवान् की भक्ति करता है उसमें करुणा, नम्रता, सहनशीलता, सभी जीवों के प्रति समभाव एवं प्रेम जैसे महान् गुण प्रकट होने लगते हैं।
भगवाद्गीता के बारहवें अध्याय में इसकी पुष्टि हुई है।
हरे कृष्ण।
लेख: ब्रजवासी दास
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साभार – http://hindi.iskcondesiretree.com/
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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