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भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत “कुम्भ मेला”

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भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत “कुम्भ मेला”
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भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत “कुम्भ मेला”

सांस्कृतिक विरासत कुम्भ मेला:kumbh 2021

kumbh 2021:-17 जनवरी, ऋषिकेश। माँ गंगा के पावन तट हरिद्धार में 14 जनवरी से अप्रैल 2021 तक इस वर्ष पवित्र कुम्भ मेला, फिजिकल डिसटेंसिंग और हेल्थ प्रोटोकाॅल के साथ आयोजित हो रहा है। कुंभ मेले के दौरान पवित्र गंगा में डुबकी लगाने के लिए लाखों श्रद्धालु एकत्र होंगे।

ऐसे में विशेष रूप से फिजिकल डिस्टेंसिंग, मास्क लगाना और साबुन व पानी के साथ थोड़ी-थोड़ी देर बाद हाथ धोना आदि बातों का ध्यान रखना होगा। कोशिश करें कि इस बार कुम्भ मेले में बड़े बुजुर्ग और छोटे बच्चों को लेकर न आयें क्योंकि कोविड-19 महामारी के समय में उनके लिये भीड़-भाड वाले स्थानों पर जाना सुरक्षित नहीं है।

’’आत्मवत् सर्वभूतेषु’’ के दिव्य सूत्र के साथ कुम्भ में सहभाग-स्वामी चिदानन्द सरस्वती

परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि कुम्भ जैसे दिव्य आयोजन, आध्यात्मिकता, पवित्रता, दिव्यता और सर्वे भवन्तु सुखिनः के उद्देश से किये जाते हैं चूंकि इस समय चारो ओर कोरोना वायरस का प्रकोप है ऐसे में हेल्थ प्रोटोकॉल और कोविड मानकों का पालन करना जरूरी है।

Swami Chidanand

कुंभ मेला-2021 को दिव्य, पवित्र, ग्रीन, ईको-फ्रेंडली, यादगार और अनूठा बनाने के लिए सभी का समेकित प्रयास नितांत आवश्यक है।

फिजिकल डिस्टेंसिंग और हेल्थ प्रोटोकाॅल के नियमों के साथ कुम्भ

स्वामी जी ने कहा कि उत्तराखंड हमेशा से ही ग्रीन हैरिटेज और ईको-फ्रेंडली आयोजनो को प्राथमिकता देता आया है ऐसे में सभी को गंगा जी की शुद्धता और उत्तराखंड की पवित्रता को ध्यान में रखते हुये कुम्भ मेले में सहभाग करना होगा।

उन्होंने कहा कि कुम्भ, भारत की आध्यात्मिक और सनातन परम्परा है। कुम्भ विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक मेला है, जो सदियों से चला आ रहा है। कुम्भ ने पूरे विश्व को विश्व बन्धुत्व का संदेश दिया; हमें अपनी जड़ों से जुड़ने का; भारतीय संस्कृति को जानने और जीने का तथा अपनी गौरवशाली आध्यात्मिक परम्परा एवं गौरवमयी संस्कृति को आत्मसात करने का अवसर प्रदान किया है।

kumbh 2021यह केवल अमृत कुम्भ ही नहीं बल्कि हमें ’’अमृतस्य पु़त्राः’’ कि हम अमृत के पुत्र हैं इस भाव को जानने और जीने का भी संदेश दिया है। वास्तव में कुम्भ का तात्पर्य कलश से है तथा कलश परिपूर्णता का प्रतीक है अर्थात जीवन की परिपूर्णता ही कुम्भ की दिव्यता है।

हरिद्वार कुम्भ 2021

स्वामी जी ने कहा कि कुम्भ में पूज्य संतों का समागम होता है। संतों के संग से सत्संग का मार्ग अग्रसर होता है जिससे योग और ध्यान के पथ पर बढ़ा जा सकता है।

कुम्भ हमें सिखाता है कि हम आस्था में जियें’’, केवल व्यस्तता में नहीं बल्कि व्यवस्था में जियें, जीवन में एक मर्यादा हो, एक दिशा हो ’’हमारे चिंतन में सकारात्मकता हो, हमारे कर्म में सृजनशीलता हो, वाणी में माधुर्य हो, हृदय में करूणा हो और हमारा जीवन प्रभु के चरणों में समर्पित हो यही तो कुम्भ है। कुम्भ पर भीतरी कुम्भ का दर्शन हो सके, यही तो कुम्भ का वास्तविक दर्शन है।

कुम्भ मेले में सहभाग करने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिये एक संदेश है कि वे ’’आत्मवत् सर्वभूतेषु’’ सभी में अपना दर्शन करें तो निश्चित हम सब मिलकर कुम्भ को यादगार बना सकते हैं।

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Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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January 19, 2021 3 min read
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