देवोत्थान एकादशी : परमात्मा और आत्मा के मिलन का पर्व

कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी (19 नवंबर) सनातन धर्म में एक ऐसे महापर्व का दिन है जब हमारी आत्मा परमात्मा रुपी मूल उर्जा से एकाकार हो सकती है। जहां देवशयनी एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी के बीच की अवधि हमारी इंद्रियों और मस्तिष्क के संयम का समय है वहीं इस संयम से प्राप्त परिणाम के फलित होने का पर्व देवोत्थान एकादशी है। देवोत्थान एकादशी के दिन ही हमारी आत्मा में परमात्मा रुपी विराजमान महाविष्णु का अंश महामाया रुपी आद्या शक्ति के माया रुपी प्रभाव से मुक्त होती है।
श्री दुर्गासप्तशती के प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक के अनुसार जब संसार लय में होता है तब योगमाया अपनी माया शक्ति से हमारी आत्मा में विराजमान महाविष्णु तत्व को सुप्त कर देती है और हमारी आत्मा निवृति से प्रवृत्ति की ओर उन्मुख होती है। महाविष्णु का तत्व जो कि हमें संसार रुपी भवसागर से पार कराती है, हमारी आत्मा उसके विपरीत कार्य करने लगती है। हम संसार के कार्यकलापों में संलग्न हो जाते हैं। महामाया के प्रभाव से हमारी मनोइंद्रियां लोभ, क्रोध, मोह आदि माया रुपी प्रभाव में कार्य करती हैं। लेकिन देवशयनी एकादशी और देवोत्थान एकादशी की अवधि के बीच जिसने भी संयम के द्वारा अपना आत्मा का उत्थान किया है उसका फल देवोत्थान एकादशी के दिन मिलता है।
इसी दिन तुलसी का भी विवाह होता है। तुलसी को विष्णु के सिर पर विराजमान बताया गया है। तुलसी जैसी पवित्रता जिसने भी अर्जित की है उसी की आत्मा में महाविष्णु का तत्व जाग्रत होता है। देवोत्थान एकादशी और देवशयनी एकादशी की अवधि के महत्व को अगर समझना है तो हमें मानवीय आत्मा के विकास और उसके परम लक्ष्य को समझना होगा। सनातन धर्म में व्यक्ति के विकास के चार चरण हैं। प्रथम उसके शरीर की शुद्धि, शरीर की शुद्धि के द्वारा अपने मन की शुद्धि, तीसरे मन की शुद्धि के द्वारा आत्मा की शुद्धि और चौथे आत्मा की शुद्धि के बाद आत्मा का परमात्मा में मिलन।
हमारे शरीर की उर्जा का प्रवाह बहिर्मुखी होता है। हमारे शरीर की इंद्रियां संसार में व्याप्त सुखों की तरफ दौड़ती हैं। इंद्रियों के इसी प्रवाह को अंतर्मुखी बनाकर हम सबसे पहले अपने मन की तरफ मोड़ते हैं। मन का प्रवाह इंद्रियों की तरफ होता है। जैसे ही इंद्रियां मन की तरफ मुड़ती हैं मन का प्रवाह भी अंतर्मुखी हो जाता है और वो अब शरीर की इंद्रियों के विपरीत आत्मा की तरफ मुड़ जाती है। ये संयम के द्वारा ही संभव है। इसके बाद जैसे ही मन की उर्जा आत्मा की तरफ उन्मुख होती है मन और आत्मा का एकाकार हो जाता है। इसके बाद ही हमारी आत्मा के लिए परमात्मा से मिलने का रास्ता साफ हो जाता है।
यही चार मास हमारे लिए योगमाया के माया से मुक्त होकर अपनी आत्मा को परमात्मा से मिलाने का पुण्य अवसर है। यही कारण है कि कि इस महापर्व को देवोत्थान एकादशी कहा जाता है क्योंकि इसी पर्व के दिन हमारे भीतर देवत्व रुपी प्रकाश का उत्थान होता है और हमारी आत्मा का उत्थान का दिन ही देवोत्थान एकादशी कहलाता है। देवोत्थान एकादशी के दिन महाविष्णु रुपी महाकल्याणकारी तत्व के जागरण के लिए श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। क्योंकि श्री मद् भगवद्गीता के बाद सिर्फ विष्णु सहस्त्रनाम ही एक ऐसा स्त्रोत है जहां स्वयं कृष्ण ने खुद के होने का प्रमाण दिया है।
लेखक – अजीत कुमार मिश्रा
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Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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