क्या है ईद का इतिहास, चाँद देखने के बाद ही क्यूँ मनाई जाती है ईद 

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क्या है ईद का इतिहास, चाँद देखने के बाद ही क्यूँ मनाई जाती है ईद

ईद-उल-फितर खुशियों का त्योहार है. इसे रोजेदार रमजान में रखे गए रोजों के एवज में अल्लाह से इनाम में मिला त्योहार मानते हैं. ईद का अर्थ है ख़ुशी. अल्लाह द्वारा दिए गए इनाम को हर्षोल्लास के साथ मनाना ही ईद है.

क्या है ईद का इतिहास

ऐसा माना जाता है कि इसी महीने में ही कुरान-ए-पाक का अवतरण हुआ था. चांद के दीदार के अगले दिन ईद मनाने का रिवाज है. ईद को ईद-उल-फितर भी कहा जाता है. ईद-उल-फितर सबसे पहले 624 ई. में मनाया गया था. इस त्योहार को मनाने के पीछे भी एक किस्सा है. इस्लामिक कैलेंडर को हिजरी कैलेंडर के नाम से जाना जाता है. इसमें साल का 9वां महीना रमजान होता है, जिसे पवित्र माना जाता है, जो पूरे 30 दिन का होता है. इस माह में लोग रोजा रखते हैं. इस पाक महीने के अंतिम दिन का रोजा चांद को देखकर ही खत्म किया जाता है. चांद दिखने के अगले दिन ईद का त्योहार मनाया जाता है.

कहते हैं पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब ने बद्र के युद्ध में फतह हासिल की थी. इस युद्ध में फतह मिलने की खुशी में लोगों ने यह त्योहार मनाना शुरू किया.

साल में दो बार आती है ईद
हिजरी कैलेण्डर के अनुसार साल में दो बार ईद का त्योहार मनाया जाता है. इस बार 5 या 6 जून को जो ईद मनायी जाएगी, उसे ईद-उल-फितर या मीठी ईद कहा जाता है. इस दिन सेवैया बनाने का रिवाज है. दूसरी ईद को ईद-उल-जुहा या बकरीद कहा जाता है.

दान देने का रिवाज

इस्लाम में ऐसा माना जाता है कि ईद के दिन जरूरतमंद लोगों को अपनी हैसियत के मुताबिक दान करना चाहिए. इससे गरीब और जरूरतमंद लोग भी खुशियों के साथ त्योहार मना पाएं. यह रिवाज इस त्योहार में चार चांद लगाता है.

यह भी पढ़ें-जानिये क्यों कहते ईद-उल-फितर को मीठी ईद

चांद देखने के बाद ही क्यों मनाई जाती है ईद

हिन्दू और मुस्लिम त्योहारों में चांद का बहुत ही महत्व है. बिना चांद को देखे कोई व्रत या त्योहार नहीं मनाया जाता या फिर उसे अधूरा माना जाता है. ईद-उल-फितर हिजरी कैलेंडर के 10वें माह के पहले दिन मनाई जाती है. हिजरी कैलेंडर में नया माह चांद देखकर ही प्रारंभ होता है. जब तक चांद नहीं दिखे तब तक रमजान का महीना खत्म नहीं माना जाता. रमजान माह के खत्म होने के बाद ही नए माह के पहले दिन ईद मनाई जाती है. ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन हजरत मुहम्मद मक्का शहर से मदीना के लिए निकले थे।

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