बोस्टन, 24 दिसम्बर; मनोवैज्ञानिक और साइकोडेलिक से संत रामदास बने अमेरिकी डॉ रिचर्ड एल्पर्ट उर्फ़ बाबा रामदास का 88 साल की उम्र में रविवार को निधन हो गया है। एल्पर्ट साल 1967 में साइकेडेलिक शोध के लिए भारत आए थे। यहां वे आध्यात्मिक गुरु नीम करोली बाबा से मिले। बाबा ने ही डॉ रिचर्ड एल्बर्ट को उनका नया नाम रामदास दिया था। जिसके बाद एल्पर्ट लोगों को जीवन के बन्धनों से मुक्त होने का ज्ञान देने लगें।
आइए जानें कौन थे संत रामदास, कैसा है उनका सफर
डॉ रिचर्ड एल्बर्ट कौन थे

जानिए परिवर्तन की कहानी
असल में ये यात्रा साल 1961 में हार्वर्ड से शुरू हुई. जब वो साइकोलॉजिस्ट के तौर मानव चेतना के अन्वेषण मार्ग में आए. इस शोध के दौरान वो psilocybin, LSD-25 और दूसरे साइकेडेलिक केमिकल्स पर शोध कर रहे थे. उनके साथ शोध को आगे बढ़ाने के लिए टिमोथी लेरी, राल्फ मेट्ज़नर, एल्डस हक्सले और एलेन गिन्सबर्ग आदि मनोचिकित्सक भी शामिल थे. इस शोध पर उनकी दो किताबें ‘द साइकेडेलिक एक्सपीरियंस (लेरी और मेटज़नर के साथ सह–लेखक, और यूनिवर्सिटी की किताबों द्वारा प्रकाशित द तिब्बती बुक ऑफ द डेड पर आधारित) और दूसरी एलएसडी (सिडनी कोहेन और लॉरेंस शिलर के साथ, न्यू अमेरिकन लाइब्रेरी द्वारा प्रकाशित) आईं. अपने शोध की अत्यधिक विवादास्पद प्रकृति के कारण, रिचर्ड एल्पर्ट और टिमोथी लेरी एक तरह से व्यक्तित्वहीनता की स्थिति में पहुंच गए, इसी के चलते साल 1963 में हार्वर्ड से निकाल दिया गया. तब टिम लेरी और अल्पर्ट मैक्सिको गए. इस तरह वो अध्यात्म की रहस्यमयी यात्रा के सफर में निकल पड़े. वो रासायनिक पदार्थों के माध्यम से मन का विस्तार जो आध्यात्मिक खोज के लिए एक उत्प्रेरक बन गया. उसी दौरान वो भारत में बाबा नीम करौली के सानिध्य में आए और उनका नया सफर शुरू हुआ.
यह भी पढ़ें-क्यों कहलाए जैन मुनि तरूणसागर महाराज राष्ट्रीय संत ?
नीम करोली बाबा को बनाया गुरु

हनुमान भक्ति से शुरू हुआ सफर

रखी हनुमान फाउंडेशन की नींव

Editorial Review Note
Religion World provides information on all religions and presents it impartially. You can send us information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com. You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.

