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शुभ-अशुभ समय की अवधारणा कैसे बनी?

शुभ-अशुभ समय की अवधारणा कैसे बनी?

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शुभ-अशुभ समय की अवधारणा कैसे बनी?

शुभ-अशुभ समय की अवधारणा कैसे बनी?

मानव सभ्यता के आरंभ से ही समय को केवल बीतने वाली इकाई नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली शक्ति माना गया है। भारतीय संस्कृति में यह विश्वास गहराई से स्थापित है कि हर समय समान नहीं होता। कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो सफलता, शांति और समृद्धि लाते हैं, वहीं कुछ समय कठिनाई और बाधा का कारण बनते हैं। इसी सोच से शुभ-अशुभ समय की अवधारणा का जन्म हुआ।

समय और प्रकृति का संबंध

प्राचीन मानव ने सबसे पहले प्रकृति का अध्ययन किया। सूर्य का उदय-अस्त, चंद्रमा की कलाएँ, ऋतुओं का परिवर्तन और ग्रहों की गति — इन सभी का मानव जीवन पर गहरा प्रभाव देखा गया। जब लोग यह समझने लगे कि कुछ खास समय पर किए गए कार्य सफल होते हैं और कुछ समय पर असफल, तब समय को शुभ और अशुभ में बाँटने की परंपरा विकसित हुई।

वैदिक काल में शुभ-अशुभ समय

वेदों में समय को एक दिव्य तत्व माना गया है। ऋग्वेद में ‘काल’ को ब्रह्म का रूप कहा गया है। यज्ञ, हवन और अनुष्ठानों के लिए विशेष समय निर्धारित किए गए। यह माना गया कि सही समय पर किया गया कर्म देवताओं को प्रसन्न करता है और गलत समय पर किया गया कार्य फलहीन हो सकता है।

पंचांग और मुहूर्त की भूमिका

शुभ-अशुभ समय की पहचान के लिए पंचांग की रचना हुई। पंचांग के पाँच अंग — तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण — समय की गुणवत्ता को निर्धारित करते हैं। इन्हीं के आधार पर मुहूर्त निकाले जाते हैं।
अभिजीत मुहूर्त, ब्रह्म मुहूर्त जैसे समय को शुभ माना गया, जबकि राहुकाल, यमगंड और गुलिक काल को अशुभ समझा गया।

ज्योतिष शास्त्र का योगदान

ज्योतिष शास्त्र ने शुभ-अशुभ समय की अवधारणा को वैज्ञानिक रूप देने का प्रयास किया। ग्रहों की स्थिति, गोचर और दशा के आधार पर यह बताया गया कि कौन-सा समय व्यक्ति विशेष के लिए अनुकूल है। जन्म कुंडली के अनुसार निकाला गया मुहूर्त व्यक्तिगत शुभता को दर्शाता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक कारण

शुभ-अशुभ समय की अवधारणा ने समाज में अनुशासन पैदा किया। विवाह, नामकरण, गृह प्रवेश जैसे संस्कार निश्चित समय पर होने लगे। इससे सामूहिक जीवन में एकरूपता और सांस्कृतिक पहचान बनी। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही और विश्वास का रूप लेती गई।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

शुभ समय में कार्य करने से व्यक्ति को आत्मविश्वास मिलता है। मन सकारात्मक रहता है और निर्णय स्पष्ट होते हैं। वहीं अशुभ माने गए समय में सावधानी बरतने से संभावित जोखिम कम हो जाते हैं। इस प्रकार यह अवधारणा मानसिक संतुलन बनाए रखने में भी सहायक बनी।

अन्य सभ्यताओं में भी समय की धारणा

यह अवधारणा केवल भारत तक सीमित नहीं रही। चीन में फेंगशुई, पश्चिमी देशों में ज्योतिष और शुभ तिथियों की मान्यता, इस्लामी परंपरा में चंद्र दर्शन — सभी में समय के महत्व को स्वीकार किया गया है। यह दर्शाता है कि शुभ-अशुभ समय की सोच सार्वभौमिक रही है।

आधुनिक युग में शुभ-अशुभ समय

आज विज्ञान और तकनीक के युग में भी लोग शुभ मुहूर्त देखते हैं। शादी, उद्घाटन, नए व्यवसाय की शुरुआत में पंचांग और ज्योतिष का सहारा लिया जाता है। यह परंपरा विश्वास, आस्था और अनुभव के आधार पर आज भी जीवित है।

शुभ-अशुभ समय की अवधारणा प्रकृति, अनुभव, आस्था और सामाजिक व्यवस्था के मेल से बनी। यह केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि समय की गुणवत्ता को समझने का प्रयास है। बदलते युग में भी यह अवधारणा भारतीय संस्कृति की पहचान बनी हुई है और आगे भी बनी रहेगी।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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January 3, 2026 3 min read
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