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क्यों बेहद खास होती है माँ कालरात्रि की पूजा शारदीय नवरात्रि में ?

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क्यों बेहद खास होती है माँ कालरात्रि की पूजा शारदीय नवरात्रि में ?

क्यों बेहद खास होती है माँ कालरात्रि की पूजा शारदीय नवरात्रि में ?

शारदीय नवरात्र में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है। इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी द्वार खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं। इस दिन तांत्रिक मतानुसार देवी पर मदिरा का भोग भी लगाया जाता है। नवरात्र का सातवा दिन जो  माँ कालरात्रि की पूजा के रूप में जाना जाता है, सातवीं शक्ति का नाम है माँ कालरात्रि| इस वर्ष 27 सितंबर 2017 (बुधवार) को मां कालरात्रि की पूजा  संपन्न की जाएगी।

नवरात्र की सप्तमी में साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में अवस्थित होता है। कुण्डलिनी जागरण हेतु जो साधक साधना में लगे होते हैं आज सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं। नवरात्र सप्तमी तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होती है। सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है। इस दिन आदिशक्ति की आंखें खुलती हैं।

 

मां कालरात्रि अपने महाविनाशक गुणों से शत्रु एवं दुष्ट लोगों का संहार करती हैं| विनाशिका होने के कारण इनका नाम कालरात्रि पड़ा| मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक होता है लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली मानी जाती हैं, माँ काल रात्रि की पूजा के साथ ही जीवन के पूर्ण कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो जाता है श्रद्धालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकंपा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं।

माँ की कृपा से बाधा सहज ही दूर हो जाती है  माँ गृह जनित बाधाये सहजता से दूर करती है सांसारिक भय माँ कृपा से भक्त के समीप नहीं आते, ,व्यापार संबंधी समस्या, ऋण मुक्ति एवं अचल संपत्ति के लिए मां कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। परंतु मां सदैव ही शुभ फल प्रदान करती हैं। इस दिन साधकगण अपने मन को सहस्रार चक्र में स्थित करते हैं और मां की अनुकंपा से उन्हें ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं। मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना एवं साधना द्वारा अकाल मृत्यु, भूत-प्रेत बाधा, व्यापार, नौकरी, अग्निभय, शत्रुभय आदि से छुटकारा प्राप्त होता है।

कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन सहस्त्रार चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं।  प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर शास्त्रोक्त फल प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं। सहस्त्रार चक्र पर सूर्य का आधिपत्य होता है। लोक – सत्यलोक , मातृ देवी – छहों चक्रों की देवियां, देवता – परमशिव, तत्व – तत्वातीत। इसका स्थान तालु के ऊपर मस्तिष्क में ब्रह्म रंध्र से ऊपर सब शक्तियों का केंद्र है और अधिष्ठात्री देवी – शक्ति कात्यायनी हैं।

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ऐसा हैं माँ कालरात्रि का स्वरूप

माँ कालरात्रि। माँ की सांसों से अग्नि निकलती रहती है। इनका वाहन गर्दभ है। मां ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं। इनकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। उनका स्वरूप अग्निमय है और उनके माथे पर चंदमा का मुकुट शोभायमान है।

कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली देवी हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत हो जाते हैं। इनका रंग काला एवं बाल बिखरे हुए हैं। इनके तीन नेत्र एवं चार भुजाएं हैं। गर्दभ इनका वाहन है और ये दाहिने हाथों में तलवार तथा नरमुद्रा एवं बाएं हाथ में ज्वाला तथा अभयमुद्रा धारण करती हैं। ऊपर से भयानक, परंतु अन्तराल में स्नेह का भंडार हैं। घने अंधेरे की तरह एकदम गहरे काले रंग वाली, तीन नेत्र वाली, सिर के बाल बिखरे रखने वाली और अपनी नाक से आगे की लपटों के रूप में सांसें निकालने वाली कालरात्रि, मां दुर्गा का सातवां विग्रह स्वरूप हैं। इनके तीनों नेत्र ब्रह्माण्ड के गोले की तरह गोल हैं।

ज्योतिष दृष्टिकोण –  मां कालरात्रि की साधना का संबंध शनि ग्रह से है। कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में शनि ग्रह का संबंध दशम और एकादश भाव से होता है अतः मां कालरात्रि की साधना का संबंध करियर, कर्म, प्रोफैशन, पितृ, पिता, आय, लाभ, नौकरी, पेशे से है । जिन व्यक्तियों कि कुण्डली में शनि ग्रह नीच, अथवा शनि राहू से युति कर पितृ दोष बना रहा है अथवा शनि मेष राशि में आकार नीच एवं पीड़ित है उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां कालरात्रि की साधना।

मां कालरात्रि कि साधना से व्यक्ति को आलस्य से छुटकारा मिलता है, भक्त का कर्म क्षेत्र मज़बूत होता है, पद्दोन्नति की प्राप्ति होती है, आय स्रोत अच्छे होते हैं, लाभ क्षेत्र मज़बूत होता है।  इनके पूजन से शत्रुओं का संहार होता हैं। जिन व्यक्ति की आजीविका का संबंध कंस्ट्रक्शन, मकैनिकल, इंजीनियरिंग, हार्डवेयर अथवा पशुपालन से हो उन्हें सर्वश्रेष्ठ फल देती है मां कालरात्रि की साधना ।

मां कालरात्रि का स्वरूप भयानक है, लेकिन वह भक्तों को शुभ फल ही देती हैं। भयानक स्वरूप होने के बावजूद शुभ फल देने वाली मां कालरात्रि को इसी गुण के कारण ‘शुंभकरी’भी कहा जाता है। ये देवी हमारे जीवन में आने वाली सभी ग्रह-बाधाओं को भी दूर करती हैं। सृष्टि संचालन और सृष्टि संयोजन इन्हीं काली जी की कृपा का फल है। जिन वस्तुओं और प्राणियों से जीव दूर भागता है, वह काली जी को प्रिय हैं। असुरों का नाश करने वाली काली जी की आराधना जितनी सरल है, उतनी ही कठिन भी। वह महामाया के साथ पूजी जाएं, तो उसका फल दोगुना हो जाता है।

मां कालरात्रि नकारात्मक, तामसी और राक्षसी प्रवृत्तियों का विनाश करके भक्तों को भूत-प्रेत आदि से अभय प्रदान करती हैं। इनकी उपासना से प्रतिकूल ग्रहों द्वारा उत्पन्न बाधाएं समाप्त होती हैं और भक्त अग्नि, जल, जन्तु, शत्रु आदि के भय से मुक्त हो जाता है। योगी साधकों द्वारा कालरात्रि का स्मरण ‘ सहस्रार ‘ चक्र में ध्यान केंद्रित करके किया जाता है। माता उनके लिए ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों की प्राप्ति के लिए राह खोल देती हैं। साधक के समस्त पाप धुल जाते हैं और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

सावधानी – कहा जाता है क‌ि नवरात्र में सप्तमी अष्टमी की रात मह‌िलाओं को अपने बालों को खुला नहीं रखना चाह‌िए। बच्चों को भी आज की रात नजर दोष से बचाने वाले टोटके कर लेना चाह‌िए। वैसे यह सारी बातें मान्यताओं की है।

साधना वर्णन – इस वर्ष 27 सितंबर 2017 (बुधवार) को मां कालरात्रि की पूजा (साधना) संपन्न की जाएगी |

यह हैं पूजन विधि: 

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके सच्चे मन से मां कालरात्रि का ध्यान करें। नवग्रह, दशदिक्पाल, अन्य देवी-देवता की पूजा करते हुए मां कालरात्रि की पूजा करें। पूजा की विधि शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है। गुलाब, गुड़हल आदि फूलों से मां का श्रृंगार करें। गंधाक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, इन पांच प्रकार की सामग्री द्वारा पंचोपचार पूजन करें, ‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै’ मंत्र का 108 के क्रम में जाप करें।

चैत्र नवरात्र की सप्तमी प्रात: 4 से 6 दोपहर 11:30 से 12:30 के बीच और रात्रि 10:00 बजे से 12:00 के बीच शुरू करना लाभकारी होगा। दुर्गा पूजा का सातवां दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है | सप्तमी पूजा के दिन तंत्र साधना करने वाले साधक मध्य रात्रि में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं| इस दिन मां की आंखें खुलती हैं| षष्ठी पूजा के दिन जिस विल्व को आमंत्रित किया जाता है उसे आज तोड़कर लाया जाता है और उससे मां की आँखें बनती हैं| दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है|

सर्व प्रथम चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां कालरात्रि की मूर्ति अथवा तस्वीर स्थापित करें तथा चौकी पर कालरात्रि यंत्र को रखें। तदुपरांत हाथ में पुष्प लेकर मां कालरात्रि का ध्यान आह्वान करें। यदि मां की छवि ध्यान अवस्था में विकराल नजर आएं तो घबराएं नहीं बल्कि मां के चरणों में ध्यान एकाग्र करें। मां का स्वरूप देखने में भले ही विकराल है परंतु हर प्रकार से मंगलकारक है। मां कालरात्रि एवं यंत्र का पंचोपचार से पूजन करें तथा नैवेद्य का भोग लगाएं। इसके बाद मां का मंत्र जाप नौ माला की संख्या में पूर्ण करें – मंत्र – लीं लीं हुं। मनोकामना पूर्ति के लिए मां से प्रार्थना करें। पूजा विधान में शास्त्रों में जैसा वर्णित हैं उसके अनुसार, पहले कलश की पूजा करनी चाहिए फिर नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए| फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी

श्लोक 

या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता:,

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:||

देवी की पूजा से पहले उनका ध्यान करना चाहिए

कालरात्रि का मंत्र

कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारूणा

त्वं श्रीस्त्वमीश्र्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा।

ध्यान

करालवदनां घोरांमुक्तकेशींचतुर्भुताम्।

कालरात्रिंकरालिंकादिव्यांविद्युत्मालाविभूषिताम्॥

दिव्य लौहवज्रखड्ग वामाघोर्ध्वकराम्बुजाम्।

अभयंवरदांचैवदक्षिणोध्र्वाघ:पाणिकाम्॥

महामेघप्रभांश्यामांतथा चैपगर्दभारूढां।

घोरदंष्टाकारालास्यांपीनोन्नतपयोधराम्॥

सुख प्रसन्न वदनास्मेरानसरोरूहाम्।

एवं संचियन्तयेत्कालरात्रिंसर्वकामसमृद्धिधदाम्॥

उपासना मंत्र

एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी||

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

स्तोत्र पाठ

हीं कालरात्रि श्रींकराली चक्लींकल्याणी कलावती।

कालमाताकलिदर्पध्नीकमदींशकृपन्विता॥

कामबीजजपान्दाकमबीजस्वरूपिणी।

कुमतिघन्कुलीनार्तिनशिनीकुल कामिनी॥

क्लींहीं श्रींमंत्रवर्णेनकालकण्टकघातिनी

कृपामयीकृपाधाराकृपापाराकृपागमा

कवच

ॐ क्लींमें हदयंपातुपादौश्रींकालरात्रि।

ललाटेसततंपातुदुष्टग्रहनिवारिणी

रसनांपातुकौमारी भैरवी चक्षुणोर्मम

कहौपृष्ठेमहेशानीकर्णोशंकरभामिनी।

वíजतानितुस्थानाभियानिचकवचेनहि।

तानिसर्वाणिमें देवी सततंपातुस्तम्भिनी॥

माँ का भोग

भोग 1: गुड का भोग लगाया जाता है. भोग लगाने के बाद दान करें

इसी भोग की एक थाली भोजन सहित ब्रह्माण को दान – दक्षिणा के साथ दी जाती है. इस प्रकार माता की पूजा करने से माता व्यक्ति पर आने वाले शोक से मुक्ति देती है और उपवास पर आकस्मिक रुप से आने वाले संकट भी कम होते है.

भोग 2: सुबह  9:00 से पहले 7 चीकू माँ को अर्पित करके शाम को प्रसाद के रूप मैं ग्रहण करो व बांटिए।

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पंडित दयानन्द शास्त्री,

(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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September 24, 2017 8 min read
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