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भगवान श्री गणेश की सूंड दायीं तरफ हो या बाईं तरफ ?

भगवान श्री गणेश की सूंड दायीं तरफ हो या बाईं तरफ ?

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भगवान श्री गणेश की सूंड दायीं तरफ हो या बाईं तरफ ?

भगवान श्री गणेश की मूर्ति या तस्वीर घर लाने से पहले सबसे ज़रूरी बात है – उनकी सूंड किस ओर मुड़ी है। दाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश जी सिद्धिविनायक कहलाते हैं, जबकि बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले विघ्नविनाशक (वक्रतुंड) स्वरूप माने जाते हैं। दोनों स्वरूपों के पूजा-नियम, महत्व और घर में स्थापना की उपयुक्तता अलग-अलग हैं, और इसी वजह से यह भ्रम आम है कि घर के लिए कौन सा स्वरूप सही रहेगा। इस लेख में हम सूंड की दिशा का धार्मिक अर्थ, वास्तु शास्त्र के अनुसार सही स्थापना, और इससे जुड़े दोनों प्रचलित मतों को स्पष्ट रूप से समझेंगे – साथ ही मूर्ति की मुद्रा, दिशा और आम भ्रांतियों पर भी बात करेंगे।

मुख्य बातें (Key Takeaways)

  • दाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश जी को सिद्धिविनायक कहा जाता है – इनकी पूजा में विशेष नियमों का पालन ज़रूरी माना जाता है।
  • बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश जी को विघ्नविनाशक/वक्रतुंड कहा जाता है – इनकी पूजा सरल विधि से भी की जा सकती है।
  • घर में स्थापना को लेकर विद्वानों के बीच दो मत प्रचलित हैं – इस लेख में दोनों को स्पष्ट किया गया है।
  • वास्तु के अनुसार गणेश जी को ब्रह्मस्थान, पूर्व या ईशान दिशा में रखना शुभ माना जाता है, मूर्ति की मुद्रा बैठी हुई होनी चाहिए।
  • मुख्य द्वार पर बाईं सूंड वाले गणेश जी की स्थापना अधिक प्रचलित मानी जाती है।

गणेश जी की सूंड टेढ़ी क्यों होती है – वक्रतुण्ड नाम का अर्थ

भगवान गणेश को शिव-पार्वती के द्वितीय पुत्र के रूप में पूजा जाता है, और मान्यता है कि उनका जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न काल में हुआ। गणेश जी के अधिकांश स्वरूपों में सूंड सीधी नहीं, बल्कि एक ओर मुड़ी हुई दिखाई जाती है — इसी विशेषता के कारण उन्हें वक्रतुण्ड कहा जाता है। पूर्णत: सीधी सूंड वाले गणेश स्वरूप दुर्लभ माने जाते हैं और इन्हें सुषुम्ना स्वरूप कहा जाता है, जिनकी आराधना विशेष रूप से साधु-संतों द्वारा रिद्धि-सिद्धि, कुण्डलिनी जागरण और मोक्ष प्राप्ति के लिए की जाती है।

परंपरागत मान्यता के अनुसार सूंड की दिशा का संबंध शरीर की नाड़ियों और ग्रहों से भी जोड़ा जाता है — दाईं ओर की सूंड को पिंगला नाड़ी व सूर्य से, और बाईं ओर की सूंड को इड़ा नाड़ी व चंद्रमा से जोड़कर देखा जाता है। यह एक ज्योतिष-वास्तु परंपरा से जुड़ी अवधारणा है, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं।

दाईं ओर मुड़ी सूंड – सिद्धिविनायक स्वरूप

दाईं ओर सूंड वाले गणेश जी को सिद्धिविनायक कहा जाता है। मान्यता है कि इनके दर्शन मात्र से कार्य सिद्ध होते हैं, और किसी महत्वपूर्ण कार्य पर निकलने से पहले इनके दर्शन करना शुभ फलदायी माना जाता है। परंपरा के अनुसार इस स्वरूप की पूजा विघ्न-नाश, शत्रु पर विजय और शक्ति-प्रदर्शन जैसे “उग्र” प्रयोजनों के लिए विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है।

इसका व्यावहारिक पक्ष यह है कि दाईं सूंड वाले स्वरूप की पूजा में सामान्यतः अधिक नियमों और अनुशासन का पालन आवश्यक बताया गया है – जैसे नियमित समय पर पूजा, विशेष विधि-विधान, और पूजा में व्यवधान न आने देना। यही कारण बताया जाता है कि पारंपरिक रूप से यह स्वरूप मंदिरों में अधिक स्थापित मिलता है, जहां प्रशिक्षित पुजारी नियमित और अनुशासित पूजा सुनिश्चित कर पाते हैं। मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर की मूर्ति दाईं सूंड वाली मानी जाती है, और भक्तों में इसकी लोकप्रियता इसी स्वरूप की प्रतिष्ठा का उदाहरण है।

बाईं ओर मुड़ी सूंड – विघ्नविनाशक (वक्रतुंड) स्वरूप

बाईं ओर सूंड वाले स्वरूप को विघ्नविनाशक या वक्रतुंड कहा जाता है, और परंपरा के अनुसार यह इड़ा नाड़ी व चंद्रमा से प्रभावित माना जाता है। इस स्वरूप की पूजा स्थायी और दीर्घकालिक प्रयोजनों के लिए उपयुक्त बताई जाती है — जैसे शिक्षा, व्यवसाय में उन्नति, विवाह, संतान-सुख और पारिवारिक सुख-शांति।

व्यावहारिक रूप से इस स्वरूप की पूजा-विधि तुलनात्मक रूप से सरल मानी जाती है – हार-फूल, आरती और प्रसाद अर्पण जैसी सामान्य विधि से भी पूजा की जा सकती है, और पुरोहित के मार्गदर्शन के बिना भी घर पर नियमित पूजा संभव मानी जाती है। यही व्यावहारिक सरलता इसे गृहस्थ जीवन के लिए अधिक अनुकूल बनाती है।

घर में कौन सी सूंड वाले गणेश जी रखें – दो प्रचलित मत

इस विषय पर परंपरा में स्पष्ट रूप से दो मत प्रचलित हैं, और दोनों को समझना ज़रूरी है ताकि भ्रम न रहे।

पहला मत: एक वर्ग का मानना है कि घर के लिए दाईं सूंड वाले सिद्धिविनायक स्वरूप को स्थापित करना शुभ है, क्योंकि इनके दर्शन से कार्य-सिद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

दूसरा मत: दूसरा और अधिक प्रचलित मत यह कहता है कि दाईं सूंड वाले स्वरूप की पूजा के कठोर नियमों का पालन गृहस्थ जीवन में नियमित रूप से कर पाना कठिन होता है, इसलिए घर पर इस स्वरूप को स्थापित करने से बचना चाहिए — इसे मंदिरों के लिए ही उपयुक्त माना गया है। इस मत के अनुसार घर के लिए बाईं ओर मुड़ी सूंड, सीधी सूंड, या ऊपर उठी हुई सूंड वाला स्वरूप ही लाना चाहिए।

सार यह है कि दोनों मत एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं बल्कि एक ही चिंता (नियमों का सही पालन) को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। यदि आप नियमित और अनुशासित पूजा कर सकते हैं, तो परंपरा के अनुसार दाईं सूंड वाला स्वरूप भी घर में शुभ माना गया है; अन्यथा बाईं सूंड वाला स्वरूप अधिकांश परिवारों के लिए सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प बताया जाता है।

मुख्य द्वार पर कौन सी सूंड लगाएं

घर के मुख्य द्वार पर गणेश जी की मूर्ति या तस्वीर लगाना शुभ माना जाता है, और इसके लिए परंपरागत रूप से बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले विघ्नविनाशक स्वरूप को प्राथमिकता दी जाती है। मान्यता है कि बाहर से घर लौटते समय व्यक्ति के साथ जो नकारात्मक ऊर्जा आती है, वह मुख्य द्वार पर विघ्नविनाशक गणेश जी के दर्शन मात्र से रुक जाती है और घर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाती।

वास्तु शास्त्र के अनुसार दिशा और स्थान

वास्तु परंपरा के अनुसार गणेश जी को घर के ब्रह्मस्थान (केंद्र), पूर्व दिशा या ईशान कोण में स्थापित करना शुभ माना गया है। ध्यान रखने योग्य बातें:

  • गणेश जी की सूंड उत्तर दिशा की ओर होनी चाहिए।
  • गणेश जी को दक्षिण या नैऋत्य कोण में स्थापित नहीं करना चाहिए।
  • एक ही स्थान पर एक से अधिक गणेश प्रतिमाएं आमने-सामने नहीं होनी चाहिए – इसे परंपरा में अशुभ माना गया है।

मूर्ति की मुद्रा — बैठी या खड़ी

शास्त्रीय परंपरा के अनुसार गणेश जी की मूर्ति बैठी हुई मुद्रा में ही स्थापित करना उपयुक्त माना गया है। मान्यता है कि प्राण-प्रतिष्ठा और नियमित पूजा भी बैठकर ही की जानी चाहिए, जबकि खड़ी मूर्ति की पूजा खड़े होकर करनी पड़ती है, जिसे परंपरागत विधि के अनुकूल नहीं माना जाता। बैठी मुद्रा को स्थिरता और बुद्धि की दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है – यही कारण है कि गृहस्थ पूजा में इसे प्राथमिकता दी जाती है।

मूषक और रिद्धि-सिद्धि का प्रतीकात्मक अर्थ

गणेश जी के वाहन मूषक को कुतर्क और चंचल बुद्धि का प्रतीक माना जाता है, जो बिना सोचे-समझे किसी भी वस्तु को कुतरने की प्रवृत्ति रखता है। गणेश जी को बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है, और मूर्ति में मूषक का भगवान के चरणों के नीचे दर्शाया जाना इस बात का प्रतीक है कि प्रबल विवेक के आगे कुतर्क दब जाता है। मूर्ति के साथ रिद्धि-सिद्धि की उपस्थिति को समृद्धि और सफलता का शुभ संकेत माना जाता है।

आम भ्रांतियां

भ्रांति 1: दाईं सूंड वाले गणेश जी हमेशा अशुभ होते हैं।
यह पूर्णतः सही नहीं है। परंपरा के अनुसार यह स्वरूप अशुभ नहीं, बल्कि अनुशासित व नियमबद्ध पूजा की मांग करने वाला माना गया है – इसीलिए इसे गृहस्थ जीवन के बजाय मंदिर के लिए अधिक उपयुक्त बताया जाता है।

भ्रांति 2: सीधी सूंड वाले गणेश जी नहीं मिलते।
सीधी सूंड वाले स्वरूप दुर्लभ ज़रूर हैं, पर अस्तित्वहीन नहीं – इन्हें सुषुम्ना स्वरूप कहा जाता है और विशेष रूप से साधना-प्रधान पूजा में इनका महत्व बताया गया है।

भ्रांति 3: सूंड की दिशा का कोई वैज्ञानिक आधार है।
सूंड की दिशा से जुड़ी सभी मान्यताएं ज्योतिष और वास्तु परंपरा का हिस्सा हैं, इन्हें आस्था और परंपरा के दायरे में ही समझा जाना चाहिए, वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं।

व्यावहारिक सुझाव (Practical Takeaways)

  • घर के पूजा स्थान के लिए सामान्यतः बाईं सूंड वाला या सीधी सूंड वाला स्वरूप अधिक व्यावहारिक विकल्प माना जाता है।
  • मुख्य द्वार पर बाईं सूंड वाले विघ्नविनाशक स्वरूप को प्राथमिकता दें।
  • मूर्ति स्थापित करते समय दिशा (पूर्व/ईशान), सूंड की दिशा (उत्तर) और मुद्रा (बैठी) – तीनों का ध्यान रखें।
  • एक ही स्थान पर एक से अधिक गणेश प्रतिमाएं आमने-सामने न रखें।
  • यदि दाईं सूंड वाला स्वरूप पहले से घर में स्थापित है, तो नियमित व अनुशासित पूजा-विधि का पालन करना बेहतर माना जाता है।

तुलना: दाईं बनाम बाईं सूंड

पहलू दाईं ओर मुड़ी सूंड (सिद्धिविनायक) बाईं ओर मुड़ी सूंड (विघ्नविनाशक)
संबंधित नाड़ी/ग्रह पिंगला नाड़ी, सूर्य इड़ा नाड़ी, चंद्रमा
उपयुक्त प्रयोजन विघ्न-नाश, विजय, शक्ति-प्रदर्शन शिक्षा, व्यवसाय, विवाह, पारिवारिक सुख
पूजा विधि नियमबद्ध, कठोर अनुशासन आवश्यक सरल, नियमित हार-फूल-आरती पर्याप्त
घर के लिए उपयुक्तता सामान्यतः कम अनुशंसित अधिक अनुशंसित
मुख्य द्वार के लिए अनुशंसित नहीं अनुशंसित
प्रसिद्ध उदाहरण सिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई अधिकांश घरेलू पूजा स्वरूप

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

गणेश जी की सूंड दाईं ओर हो तो इसका क्या अर्थ है?
दाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश जी को सिद्धिविनायक कहा जाता है। परंपरा के अनुसार इनकी पूजा में विशेष नियमों का पालन आवश्यक माना गया है, इसलिए यह स्वरूप अधिकतर मंदिरों में स्थापित मिलता है।
घर में कौन सी सूंड वाले गणेश जी रखने चाहिए?
अधिकांश परंपरा के अनुसार घर के लिए बाईं ओर मुड़ी सूंड वाला विघ्नविनाशक स्वरूप या सीधी सूंड वाला स्वरूप अधिक उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इनकी पूजा-विधि सरल है और नियमित रूप से घर पर की जा सकती है।
क्या घर में दाईं सूंड वाले गणेश जी रखना वर्जित है?
पूर्णतः वर्जित नहीं है, लेकिन इसके साथ नियमबद्ध व अनुशासित पूजा-विधि आवश्यक मानी जाती है। यदि यह संभव न हो, तो परंपरा बाईं सूंड वाले स्वरूप को अधिक सुरक्षित विकल्प बताती है।
गणेश जी की मूर्ति बैठी या खड़ी — कौन सी शुभ मानी जाती है?
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार बैठी हुई मुद्रा वाली मूर्ति ही घर के लिए उपयुक्त मानी गई है, क्योंकि इसकी प्राण-प्रतिष्ठा और नियमित पूजा बैठकर की जा सकती है।
मुख्य द्वार पर किस दिशा वाली सूंड की मूर्ति लगानी चाहिए?
मुख्य द्वार के लिए परंपरागत रूप से बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले विघ्नविनाशक स्वरूप को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि बाहर से आने वाली नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश करने से पहले ही रुक जाए।

यह लेख वास्तु शास्त्र और लोक-परंपरा में प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है। सूंड की दिशा से जुड़ी अवधारणाएं धार्मिक आस्था का हिस्सा हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं। मूर्ति स्थापना से पहले स्थानीय विद्वान पंडित या पारिवारिक परंपरा से भी परामर्श करें।

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Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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September 7, 2019 9 min read
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