मानसिक रोगों के लिए इलाज है कथा – भागवताचार्य रमेश भाई ओझा “भाईश्री”
भारत में धर्म की बुनियाद में ज्ञान के प्रसार का मूल भाव है। सदियों से संतों और साधुओं द्वारा घूम-घूम कर, आश्रम स्थापित कर, गुरुकुलों में शिष्यों को शिक्षित करके ये जारी रहा है। आज भी हम अपने आसपास ज्ञान की इस धारा को किसी न किसी रूप में बहती देखते है। हिंदू धर्म में संत्संग, प्रवचन, कथा की महिमा बहुत बताई गई है। देश के प्रसिद्ध भागतावचार्य रमेश भाई ओझा जी, जिन्हें उनके चाहने वाले भाईश्री के नाम से बुलाते है, एक प्रखर, ओजवान और निष्ठाशील वक्ता है। रिलिजन वर्ल्ड ने उनसे जाना कि कथा कैसे और कथा क्यों ?

रिलीजन वर्ल्ड – “आपके मन में कथा करने का विचार कैसे आया”
श्री रमेश भाई ओझा जी – परंपरा से हमारे परिवार में कोई कथाकार नहीं था। मेरे दूर के चाचा थे वो कथावाचक थे, जो हमें भागवतकथाों में ले जाते थे, वहां से श्रीमदभागवत के प्रति लगवा हुआ। माताजी बताती है कि परिवरा में श्रीमद का आयोदन हुआ था और उसके चार महीने बाद मेरा जन्म हुआ और तुम सुनकर आए हो माता के उदर से, तो मैं समझता हूं कि संस्कार हैं मेरे अंदर। बनना था डाक्टर, कर लिया कामर्स से ग्रेजुएशन, जो अनुराग था वो श्रीमद के प्रति वो अंत में जाकर खींचकर ले आया। भगवान के अपनी सेवा में लगा लिया।
“कथा करने से क्या धर्म का प्रचार होता है, या ये जीवन मूल्यों को बढ़ाता है”
धर्म ही मूल्य है, धर्म कर्मकांड नहीं है। धर्म का मतलब केवल कर्मकांज नहीं है, वो धर्म का वाह्य स्वरूप है। धर्म के द्वारा जो मूल्.ों की प्रतिष्चा होती है उसी के द्वारा अपना और समाज के कल्यान होती है। कथा उसी भागवत धर्म का निरुपण करती है। सत्य नहीं है, दया, करुणा, परमार्थ नहीं तो धर्म नहीं है। धर्मेण हीना पशुना समाना। श्रीमद उसी भागवत धर्म का संदेश है
“कथा सुनने के सकारात्मक प्रभाव क्या होते हैं”
एक तो प्रभु मे विश्वास में प्रकट होता है ,उसके चलते आदमी तनाव से मुक्त हो सकता है। आजकल जिस स्पर्धा वाले युग इंसान में जी रहा है, उसके चलते एक तनाव हमेशा रहता है, उसमें भी विफलताएं जब मिलती है, तो वो निराश रहता है, वह निराशा हताशा में परिवर्तित होती है और वो हताशा आगे चलकर अवसाद में भी ले जा सकती है। मानसिक रोगों की संख्या भारत में बढ़ रही है, जो विदेशों में स्थिति है वहीं यहां है, कथाएं उस स्थिति में जाने से बहुत बड़ा संबल बनकर हमें रोक सकती है। प्रभु में विश्वास और प्रभु में प्रेम के चलते, वहीं परमात्मा सबके भीतर बैठा है, ये भावना दृण होते ही परस्पर प्रेम और सद्भाव का वातावरण निर्माण होता है, और इस वातावरण के चलते एक दूसरे को छलने की कोशिश नहीं करेगा, इस तरह से कथाएं बहुत कुछ देती है, इसका केवल आध्यात्मिक ही नहीं, इसका व्यावहारिक पक्ष भी है और इसका सामाजिक पक्ष है और कथा सुनकर इंसान राष्ट्र की उन्नति में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
“क्या वक्त के साथ कथा ने स्वरूप बदला है”
निश्तित रूप से बदला है, और बदलेगा स्वाभाविक है। गंगा जब गंगोत्री से निकलती है। जिसमें भी गतिशीलता है उसमें परिवर्तशीलता भी होगी। वो स्वरूप रोचक तो हो ही हो, उसके साथ कल्याणकारी हो, और शास्त्र की मर्यादा में रहकर हो, तो ऐसा जो परिवर्तन वो बिल्कुल उसका
“क्या वक्त के साथ साथ कथा बरकरार रहेगी”
चाहे उसका स्वरुप बदलेगा, लेकिन कथा तो बरकरार रहेगी, चाहे वो प्रवचन के रुप में हो, लेकिन इसका जो मूल संदेश है वो तो रहेगा हमेशा, क्योंकि जबतक जीवन है तबतक प्यास भी लगेगी, और जबतक प्यास है पानी कभी आउट आफ डेट नहीं हो सकती है, कथा गंगाजल ही है वो कभी आउट आफ डेट नहीं होगी।
“कथा को लोकप्रिय किसने बनाया, टीवी ने या लोगों के भक्ति भाव ने”
टीवी के माध्यम से अनेक लोगों तक कथा पहुंती। लेकिन एक बात मैं कहूं जहां तक सौराष्ट्र का और हमारे गुजरात का, उस प्रांत का प्रश्न है, जब टीवी चैनल नहीं हुआ करती थी, तब भी जनता इतनी ही थी, पूज्य डोंगरी जी महाराज की कथा में तो संगीत भी नहीं हुआ करता था, व्यास पद्धति से कथा होती थी, तब भी जनता इतनी बड़ी संख्या में लाखों लोगों की संख्या में होती थी। टीवी चैनलों ने जरूर ये काम किया कि केवल व्यास पीठ के समक्ष बैठे लाखों हजारों लोगों तक ही नहीं जो जहां हैं वहां और लाखों लोगों तक ये संदेश पहुंचता है। ये प्रधान काम है इसका।
“क्या कथा संसाधनों का ज्यादा उपयोग नहीं है”
जितनी बड़ी तादाद में लोग इक्टठे होंगे, उस हिसाब से कुछ व्यवस्थाएं भी अनिवार्य हो जाती है। अब नैमिशारण्य तो रहा नहीं, पंडाल बनाना ही पड़ेगा. छांव में बैठने के लिए। हर कथा गोमती, गया, गंगा के तट पर तो होती नहीं, तो जहां कथा हैं वहां पानी की व्यवस्था तो करनी पडेगी। जहां इतनी बड़ी संख्या में लोग आएंगे तो इंतजाम करानी पड़ेगी। लेकिन मैं एक बात जरूर कहूंगा कि इसमें राजसिकता ज्यादा न हो इसके सात्विकता का जो दर्शन है, वो बना रहें ये प्रयास हम लोगों का होना चाहिए।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
Religion World provides information on all religions and presents it impartially. You can send us information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com. You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.
Leave a Reply