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ऐतिहासिक फिल्मों पर विवाद कितना सही कितना गलत

ऐतिहासिक फिल्मों पर विवाद कितना सही कितना गलत

ऐतिहासिक फिल्मों पर विवाद कितना सही कितना गलत
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ऐतिहासिक फिल्मों पर विवाद कितना सही कितना गलत

 ऐतिहासिक फिल्मों पर विवाद कितना सही कितना गलत

दादा साहब फाल्के ने पहली ऐतिहासिक फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाकर भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की नींव रखी थी. उस दौर में ऐतिहासिक फिल्मों को लेकर इतना हो हल्ला नहीं मचता था जितना आज के दौर में लोगों ने मचा रखा है. फिल्मों के किरदारों को लेकर विवाद होना आम बात है लेकिन जब इन विवादों में राजनेता उतर जायें तो विवाद बहुत बढ़ जाते हैं. संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती भी ऐसे ही विवादों का कोपभाजन बनी है. तो यहाँ आज हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि फिल्मों को लेकर इस तरह के विवाद कितने जायज़ हैं. लेकिन इससे पहले आपका ध्यान उन फिल्मों की और आकर्षित करते हैं जो ऐसे ही विवादों का हिस्सा बन चुकी हैं.

यह थी विवादित फिल्में

अशोका (2001)

ये फिल्म सम्राट अशोक और कलिंग युद्ध की कहानी पर बनाई थी. इस फिल्म पर भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से अलग जाकर किरदार गढ़ने का आरोप लगा था. इसे इतिहासकारों ने पूरी तरह से नकार दिया था. उनका आरोप यह था कि फिल्म में दिखाया गया था की अशोक अपने शासन के शुरुआती समय ही कलिंग पर विजय प्राप्त कर चुका था लेकिन वास्तविकता में अपने शासन के 8 साल बाद अशोक ने कलिंग पर विजय प्राप्त की थी.

मंगल पांडे- द राइजिंग (2005)

मंगल पांडे की जिंदगी पर आधारित इस फिल्म को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी थी.  मंगल पांडे के वंशजों के अनुसार फिल्म में उनसे जुड़े तथ्यों को ठीक तरह से पेश नहीं किया गया था. और उनकी इस बात का समर्थन कई राजनीतिक पार्टियों ने भी किया. mangal पाण्डेय के वंशजों का कहना था कि फिल्म में मंगल पांडे का प्रेम सम्बन्ध वेश्या के साथ दिखाया गया था जिस पर उन सभी को आपत्ति थी.

यह भी पढ़ें-रानी पद्मावती : कहानी, फंतासी, इतिहास और फिल्म के बीच खड़ा एक रानी का जौहर

जोधा अकबर (2008)

आशुतोष गोवारिकर द्वारा निर्देशित जोधा अकबर को रिलीज़ के पहले हफ्ते में ही विवादों का सामना करना पड़ गया था. इतना ही नहीं राजस्थान में फिल्म की स्क्रीनिंग पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था. राजपूत समाज के लोगों का कहना था कि जोधा का विवाह अकबर के बेटे से सलीम से हुआ था न की अकबर से. राजपूत सभा के प्रमुख नरेंद्र सिंह रजावत ने कहा था कि फिल्म में जोधा को राजा भारमल की बेटी के तौर पर दिखाया गया है. उन्होंने इसे ऐतिहासिक तौर पर गलत तथ्य बताया था.

 

बाजीराव मस्तानी (2015)

संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी भी रिलीज से पहले ही विवादों में घिर गई थी. इंदौर में रह रहे मस्तानी के वंशजों ने फिल्म में उनकी भूमिका को लेकर विरोध किया था. उन्हीने आरोप लगाया कि फिल्म में मस्तानी को एक नर्तकी के रूप में पेश किया गया है जबकि मस्तानी बाजीराव पेशवा की दूसरी पत्नी थी. फिल्म में दिखाए गए नृत्य पिंगा की भी काफी आलोचना की गई. कहा गया कि काशीबाई ने कभी भी मस्तानी के साथ नृत्य किया ही नहीं. उनका कहना था काशीबाई के सार्वजनिक तौर पर नरिया करने का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है.

 

पद्मावत (25 जनवरी 2018)

संजय लीला भंसाली की पद्मावती शूटिंग शुरु होने से पहले ही विवाद में आ गई थी. फिल्म पर सबसे तीखा विरोध कर रहे करणी सेना और राजपूत सभा जैसे संगठनों ने शूटिंग के दौरान संजय लीला भंसाली के साथ मारपीट की और सेट में आग तक लगा दी. आपत्ति का आधार ये है कि फिल्म में चित्तौड़ की महारानी पद्मावती और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच अंतरंग दृश्य है.जबकि फिल्म के निर्माता-निर्देश भंसाली ने बार-बार कहा है कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है और राजपूत स्वाभिमान का पूरा ख्याल रखा गया है.

इतना विरोध होने के बावजूद फिल्म 1 दिसम्बर को रिलीज़ हो रही है. लेकिन विरोधी अभी भी यह डिमांड कर रहे हैं कि फिल्म को रिलीज़ से पहले दिखाया जाए.

तमाम विरोध के बीच फिल्म बनकर तैयार है, ट्रेलर रिलीज कर दिया गया है और 1 दिसंबर को फिल्म की रिलीज तय की गई है.लेकिन विरोध करने वाले अब मांग कर रहे हैं कि रिलीज से पहले फिल्म दिखाई जाए नहीं तो वो रिलीज को बाधित करेंगे.

यह भी पढ़ें-कौन थी रानी पद्मावती…क्या था उनका इतिहास?

क्या है रानी पद्मावती के विरोध का कारण

रानी पद्मावती के रिलीज़ के विरोधियों की कमान अब जयपुर राजघराने की बेटी और बीजेपी एमएलए दीया सिंह ने थाम ली है.दीया सिंह ही नहीं केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और उमा भारती ने भी पद्मावती को इतिहास, महिला सम्मान और धर्म से जोड़ते हुए फिल्म को लेकर अपना विरोध दर्ज किया है.

अगर इतिहास पर नज़र डाली जाए तो अल्लाउद्दीन खिलजी ने 1303 ईस्वी में चित्तौड़ पर फतह हासिल की थी लेकिन फिल्म में ऐसा कोई वर्णन नहीं है. यह फिल्म सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत की रचना से प्रेरित है. फिल्म में अल्लाउद्दीन खिलजी के आक्रमण और सोलह हज़ार महिलाओं के साथ रानी पद्मावती के जौहर का ज़िक्र है. फिल्म का मैं प्लाट इसी पर आधारित है. संजय लीला भंसाली ने इस फिल्म को लेकर सफाई भी दी है लेकिन शायद वो इसमें विफल हुए हैं. उन्होंने एक विडियो जारी करते हुए कहा, मैंने फिल्म ‘पद्मावती’ बेहद ईमानदारी, मेहनत और जिम्मेदारी से बनाई है. मैं रानी पद्मावती की कहानी से हमेशा से बेहद प्रभावित रहा हूं.यह फिल्म उनकी वीरता और आत्म बलिदान को नमन करती है. कुछ अफवाहों की वजह से यह फिल्म विवादों का मुद्दा बन गई है. अफवाह यह है कि फिल्म में रानी ‘पद्मावती’ और अलाउदीन खिलजी के बीच कोई ड्रीम सीक्वंस दर्शाया गया है. मैंने इस बात को पहले ही नकारा है और लिखित प्रमाण भी दिया है. आज इस विडियो के माध्यम से मैं एक बार फिर से दोहरा रहा हूं कि हमारी फिल्म में रानी ‘पद्मावती’ और अलाउदीन खिलजी के बीच ऐसे कोई भी सीक्वंस नहीं है, जो किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए और जज्बातों को तकलीफ हो.हमने इस फिल्म को बहुत ही जिम्मेदारी से बनाया है. राजपूत मान-मर्यादा का पूरा खयाल रखा है.”

यह भी पढ़ें-पद्मावती पर संग्राम : जुड़ रही हैं नयी कड़ियाँ

इतिहास से छेड़छाड़ कितनी जायज

अक्सर फिल्मकार फिल्मों को इंटरेस्टिंग बनाने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ कर देते हैं जिससे उन्हें ऐसी परेशानी का सामना करना पड़ता है. 1941 में सोहराब मोदी ने पृथ्वीराज कपूर को लेकर सिकंदर फिल्म बनायीं थी जिसमे तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की गयी थी. उसके उपरान्त आई फिल्म 1960 में के. आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ जिसमें अनारकली और सलीम के प्रेमसंबंधों को दर्शाया गया था लेकिन वास्तव में इतिहास में अनारकली जैसा कोई किरदार है ही नहीं यह किरदार तो के. आसिफ ने एक नाटक के दौरान देखा था. फिल्म में इतिहास के साथ छेडछाड की गयी और इसके साथ फिल्म को अपार सफलता मिली. इस फिल्म के हिट होते ही ऐसा लगा जैसे निर्माता निर्देशकों को इतिहास से छेड़छाड़ करने का सर्टिफिकेट मिल गया और तबसे यह सिलसिला लगातार जारी है. इतनी ऐतहासिक फिल्में बनायीं गयी लेकिन सबको तोड़ मरोड़ के पेश किया गया और तर्क यह दिया गया कि फिल्म एक अलग माध्यम है और इमें बदलाव करना ज़रूरी होता है. निर्माताओं का मानना था कि हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो हम किसी भी चीज़ को घुमा फिरा कर पेश कर सकते हैं. कई ऐतिहासिक फिल्में यहाँ तक कि धारावाहिक भी ऐसे पेश किये गए हैं जिसमें किसी भी प्रकार का शोध नहीं किया गया.

जेएनयू के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के शिक्षक राकेश बट्ब्याल ने एक निजी समाचार पत्र से बातचीत के दौरान कहा था कि “सिनेमा एंटरटेनमेंट का जरिया है लेकिन जब इतिहास को सिनेमा के साथ जोड़ा जायेगा तो इतिहास के साथ खिलवाड़ की संभावनाएं बनी रहेंगी. और इस खिलवाड़ यानि तोड़मरोड़ कर पेश किये गए इतिहास को या अन्य पौराणिक ग्रंथों को दर्शक बड़े चाव से देखते हैं.” राकेश बट्ब्याल आगे बताते हैं कि “वहीँ हॉलीवुड में ऐसा नहीं है वहां की ऐतिहासिक फिल्में देखने से ही आपको समझ आ जायेगा कि वहां इतिहास से जुड़े तथ्यों से छेड़छाड़ नहीं की जाती क्यूंकि वहां के दर्शक इतिहास के ज्यादा जानकार है या ज्यादा पढ़े लिखें है जो ऐतिहासिक फिल्मों की बारीकियों पर भी ध्यान देते हैं.” यहाँ मैं राकेश बट्ब्याल जी की बात से सहमत नहीं हूँ. मैं यह नहीं कहती की दर्शक को इतिहास या पुराणों की जानकारी नहीं है या कम जानकारी है इसलिए वो ऐसा कर रहे हैं बल्कि शायद वह इस प्रकार की परेशानियों का सामना नहीं करना चाहते. उनके सामने जो परोस दिया जाता है उसी में वो संतुष्ट हो जाते हैं. हम इस तरह से कह सकते हैं कि हमारे यहाँ के दर्शक फिल्मों या टीवी सीरियल्स के माध्यम से इतिहास और पौराणिक ग्रंथों को समझने का प्रयास करती है. इस विषय पर बटब्याल जी कहते हैं की, “ टीवी हो या फिल्म युवाओं तक हमारे समाज तक पहुंचने का बहुत बड़ा जरिया है ऐसे में निर्माताओं की यह नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वह इतिहास को सही तरीके से पेश करें वरना ज़रा सोचिये आगे आने वाली पीढ़ी अपने इतिहास को लेकर कितनी भ्रमित रहेगी. ऐसे में मीडिया और समाज दोनों को ही साक्षर बनाये जाने की ज़रूरत है.”

यह भी पढ़ें-फिल्म पद्मावती पर अब देवबंदी उलेमा ने भी दी प्रतिक्रिया

जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज की शिक्षिका महालक्ष्मी रामकृष्णन फिल्मों और सीरियल्स में ऐतिहासिक तथ्यों से होने वाली छेड़छाड़ को अपमानजनक बताती हैं. बकौल महालक्ष्मी, “ आज आम जनता के लिए निर्माता निर्देशकों द्वारा एक नया इतिहास गढ़ा जा रहा है, जिसका मूल इतिहास से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है.” वो आगे कहती हैं, “ उत्सव जैसी फिल्म में उस दौर का सही चित्रण करने का प्रेस किया गया था जिसमें वेह कुछ हद तक सफल भी हुए थे. ठीक ऐसे ही श्याम बेनेगल की भारत एक खोज थी जिसमें इतिहास का सटीक चित्रण किया गया था. लेकिन आज माहौल बदल गया है अब निर्माताओं की सोच व्यावसायिक हो गयी है जो निर्माता को किसी भी हद तक लेकर जा रही है.

महालक्ष्मी कहती हैं कि, “प्राथमिक और माध्यमिक स्तरों पर जो लोताबें पढ़ाई जा रही हैं उससे इन्सान की जानने और विरोध करने की ताकत ख़त्म हो जाती है. मेरा मानना है कि लोगों को जागरूक करने के लिए कुछ संवेदनशील किताबें लिखे जाने की भी जरूरत है ताकि लोगों के भीतर इतिहासबोध पैदा हो और वे अपने इतिहास के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ खड़े हो सकें.”

अगर देखा जाये तो वर्तमान में इतिहास को लेकर समाज में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है. और इस कार्य में मीडिया अपनी अहम् भूमिका निभा सकते है वरना आगे आने वाले समय में फिल्म निर्माता या सीरियल निर्माता ऐसे ही इतिहास के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे.

सचमुच आज इस बात की जरूरत है कि इतिहास को लेकर समाज में जागरूकता पैदा हो और इस काम में मीडिया की भी अहम भूमिका हो सकती है। अन्यथा फिल्म और धारावाहिक निर्माता लगातार हमारे इतिहास के साथ खेलते रहेंगे और उसका दोहन करते रहेंगे।

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January 25, 2018 10 min read
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