होलाष्टक : 13 मार्च 2019 से…
इस वर्ष होली का शुभ पर्व 21 मार्च 2019 को है और शास्त्रानुसार इससे आठ दिन पूर्व होलाष्टक प्रारंभ हो जाते हैं। इस बार होलाष्टक 13 मार्च से शुरू होगा। हिंदू शास्त्रों के अनुसार इस समय आठ दिन तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किये जाते। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस बार होलाष्टक रात्रि 12.02 बजे से लग रहे हैं जो कि 20 मार्च होलिका दहन तक चलेगा। इस वर्ष होली का त्योहार फाल्गुन मास में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इस वर्ष यह 21 मार्च 2019 को मनाया जाएगा।यानी 20 मार्च को होलाष्टक खत्म होने के साथ होलिका दहन होगा और 21 मार्च को रंगों के साथ त्योहार मनाया जाएगा। होलिका दहन को लोग छोटी होली भी कहते हैं।

इस अवधि में शुभ कार्य- गर्भाधान, विवाह, नामकरण, विद्यारम्भ, गृह प्रवेश और नव निर्माण आदि नहीं करना चाहिए। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से ही होलिका दहन करने वाले स्थान का चयन भी किया जाता है। पूर्णिमा के दिन सायंकाल शुभ मुहूर्त में अग्निदेव से स्वयं की रक्षा के लिए उनकी पूजा करके होलिका दहन किया जाता है।
पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं कि इन आठ दिनों किसी भी व्यक्ति को ना तो भूमि-भवन खरीदना चाहिये और ना ही वैवाह आदि करना चाहिये। ऐसा माना जाता है कि इन दिनों में शुरू किया गया कार्य कभी भी सफल नहीं होता। ज्योतिष के अनुसार इन 8 दिनों में ग्रह अपना स्थान बदलते हैं।
धर्मशास्त्रों में वर्णित 16 संस्कार जैसे- गर्भाधान, विवाह, पुंसवन (गर्भाधान के तीसरे माह किया जाने वाला संस्कार), नामकरण, चूड़ाकरण, विद्यारंभ, गृह प्रवेश, गृह निर्माण, गृह शांति, हवन-यज्ञ कर्म आदि नहीं किए जाते। पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इन दिनों शुरु किए गए कार्यों से कष्ट की प्राप्ति होती है। इन दिनों हुए विवाह से रिश्तों में अस्थिरता आजीवन बनी रहती है अथवा टूट जाती है. घर में नकारात्मकता, अशांति, दुःख एवं क्लेष का वातावरण रहता है।
इस अवधि में भोग से दूर रह कर तप करना ही अच्छा माना जाता है। इसे भक्त प्रह्लाद का प्रतीक माना जाता है। सत्ययुग में हिरण्यकशिपु ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान पा लिया। वह पहले विष्णु का जय नाम का पार्षद था, लेकिन शाप की वजह से दैत्य के रूप में उसका जन्म हुआ था। वरदान के अहंकार में डूबे हिरण्यकशिपु ने देवताओं सहित सबको हरा दिया। उधर भगवान विष्णु ने अपने भक्त के उद्धार के लिये अपना अंश उसकी पत्नी कयाधू के गर्भ में पहले ही स्थापित कर दिया था, जो प्रह्लाद के रूप में पैदा हुए।
प्रह्लाद का विष्णु भक्त होना पिता हिरण्यकशिपु को अच्छा नहीं लगता था। दूसरे बच्चों पर प्रह्लाद की विष्णु भक्ति का प्रभाव पड़ता देख पहले तो पिता हिरण्यकशिपु ने उसे समझाया। फिर न मानने पर उसे भक्ति से रोकने के लिए फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बंदी बना लिया। जान से मारने के लिए यातनाएं दीं, पर प्रह्लाद विष्णु भक्ति के कारण भयभीत नहीं हुए और विष्णु कृपा से हर बार बच गए। इसी प्रकार सात दिन बीत गए। आठवें दिन अपने भाई हिरण्यकशिपु की परेशानी देख उसकी बहन होलिका, जिसे ब्रह्मा जी ने अग्नि से न जलने का वरदान दिया था, प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाकर अग्नि में प्रवेश कर गई, पर हुआ उल्टा। देवकृपा से वह स्वयं जल मरी, प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध किया। तभी से भक्ति पर आए इस *संकट के कारण इन आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है।
क्यों होते हैं ये अशुभ दिन?
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलाष्टक के प्रथम दिन अर्थात फाल्गुन शुक्लपक्ष की अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु का उग्र रूप रहता है। इस वजह से इन आठों दिन मानव मस्तिष्क तमाम विकारों, शंकाओं और दुविधाओं आदि से घिरा रहता है, जिसकी वजह से शुरु किए गए कार्य के बनने के बजाय बिगड़ने की संभावना ज्यादा रहती है। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को इन आठों ग्रहों की नकारात्मक शक्तियों के कमजोर होने की खुशी में लोग अबीर-गुलाल आदि छिड़ककर खुशियां मनाते हैं। जिसे होली कहते हैं।
जानिए होलाष्टक के इन 8 दिनों में कौन से कार्य करने अशुभ हैं…
होलाष्टक में भूलकर भी ना करें शुभ कार्य…
- गर्भवती स्त्री को इन दिनों नदी-नाले पार करके यात्रा नहीं करनी चाहिये। ऐसा करने से पेट में पल रहे शिशु को कष्ट होता है।
- होलाष्टक के दौरान विवाह नहीं करना चाहिये क्योंकि तब विवाह का मुहूर्त नहीं होता। इसके अलावा सगाई भी नहीं करनी चाहिये।
- इन दिनों नये घर में प्रवेश भी नहीं करना चाहिये।
- होलाष्टक के दौरान ना ही नया घर खरीदना चाहिये और ना ही भूमि पूजन करवाना चाहिये।
- नवविवाहिताओं को इन दिनों में मायके में रहने की सलाह दी जाती है।
- होलाष्टक में भले ही शुभ कार्यों के करने की मनाही है लेकिन इन दिनों में अपने देवी देवता की पूजा करना अनिवार्य हो जाता है।
- यही नहीं उपवास करने और दान करने से भी लाभ मिलता है।
लेखक – पण्डित दयानन्द शास्त्री, उज्जैन
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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