फिर हनुमान को पुकारता हमारा देश
– आचार्य सुधांशु महाराज

अतुलित बलशाली, ज्ञान में अग्रगण्य, विवेकपूर्ण निर्णय, सद्कर्म एवं संकल्प के प्रति निष्ठा, चरित्राशीलता, समर्पण एवं सेवा सहित अनेक गुणों को एक ही व्यक्तित्व में देखना हो तो वह है सदा अमर नायक ‘हनुमान’। हनुमान को महावीर व पवनसुत भी कहते हैं। महाबीर की वीरता का अर्थ आम जनमानस उनके शारीरिक बल को लेकर देखता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि गुणों की जितनी भी विशेषतायें इस ध्रा पर हैं, हनुमान की वीरता उन सब क्षेत्रोें में सर्वोच्चता है। इसी तरह जैसे वायु की एक निश्चित धर नहीं होती, अपितु उसमें होती है सूक्ष्म से सूक्ष्म स्थान पर प्रवेश करने की क्षमता। हनुमान भी श्रेष्ठतम उद्देश्य पूर्ति के लिए वायु की भाँति सर्वत्रा प्रवाहित व्यक्तित्व हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हनुमान ‘विश्वास और कुशलता’ के पुंज हैं। जहाँ ऐसे दिव्य प्रकृति सम्पन्न व्यक्तित्व होंगे, वहाँ परिणाम सदैव शुभ ही आयेंगे। इसलिए हमारे यहाँ हनुमान बनने का आशीर्वाद देने की परम्परा है। हनुमान जैसे युवाओं पर राष्ट्र सदैव गौरवान्वित होता रहा है, भारत में वह सम्भावनायें आज भी विद्यमान हैं। हनुमान जी के बारे में कहा गया है कि जब भगवान श्रीरामजी को अपना आराध्य मानते हुए भगवान शिव ने उनकी सेवा करने की मन में इच्छा जाहिर की तो उन्होंने अपना एक हिस्सा पृथ्वी पर भेजने का निर्णय किया, वही इस धरा पर शिव अंशज हनुमान हैं।
युग विभूति
हनुमान युग की मांग एवं दैवीय विभूति दोनों को पहचानने में चूक नहीं करते और युग दायित्व के लिए हर परिस्थिति में तत्पर रहते हैं। हनुमानजी के संवाद कौशल को ही लें, अशोक वाटिका में जब वे पहली बार माता सीता से रूबरू होते हैं, तो अपनी बातचीत की दिव्य शैली से माता सीता को तो अपनापन देकर उन्हें भयमुक्त करते हैं, साथ में यह भी भरोसा दिलाते हैं कि मैं श्रीराम का ही दूत हूँ। इसी तरह समुद्र लांघते समय नागमाता सुरसा ने जब उनकी परीक्षा लेनी चाही, तो अतिशय विनम्रता का परिचय देते हुए हनुमान जी बोले ‘‘माँ’’ अभी में रामकाज के लिए जा रहा हूँ, मुझे समय नहीं है। जब मैं अपना कार्य पूरा कर लूं, तब आपके शरीर के आहार का हिस्सा बनूँगा, पर सुरसा के न मानने पर हनुमान जी ने अति लघु सूक्ष्म रूप धरकर उसके मुँह से बाहर हुए। सुरसा हनुमान का बुद्धि, कौशल व विनम्रता देख दंग रह गई और उसने उन्हें कार्य में सपफल होने का आशीर्वाद भी दिया। हनुमान प्रेरणा हैं कि केवल सामथ्र्य से ही जीत नहीं मिलती, विनम्रता व बुद्धि से समस्त कार्य सुगमतापूर्वक पूर्ण किए जा सकते हैं।
आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता
महाबीर हनुमान अपने जीवन में आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध थे। लंका में रावण के उपवन में हनुमान व मेघनाथ के मध्य हुए युद्ध को ही लें। मेघनाथ ने ब्रह्मास्त्रा प्रयोग किया। हनुमान जी चाहते तो वे इसका तोड़ निकाल सकते थे, लेकिन वे उसकी मर्यादा कम नहीं करना चाहते थे। हनुमान यह भी जानते थे कि शक्ति व सामथ्र्य का प्रदर्शन युगानुकुल करने में ही औचित्य है। यही कारण है कि सीता के सामने उन्होंने खुद को सूक्ष्म रखा और राक्षसों के सामने अपना विकराल रूप धरण किया।हनुमान प्रदर्शन पर नहीं लक्ष्य की प्राप्ति पर विश्वास करते हैं, तभी तो युद्ध में लक्ष्मण के मूर्छित होने पर बिना राम से मिले संजीवनी लाने चले गये। वहाँ भी अपने संकल्प व साहस का परिचय दिया। हनुमान जी संजीवनी बूटी को पहचानते नहीं थे, इसलिए वे पूरा पर्वत उठा ले आए। दिव्य स्तर की असमंजस रहित तात्कालिक निर्णय लेने की क्षमता हनुमान में थी।
भावुकता से मुक्त
हनुमान हमें भावनाओं पर काबू पाने व संतुलन बनाये रखने की कला सिखाते हैं। राम के अभियान में अनेक लोग भावुक होते दिखाई देते हैं पर हनुमान एक सेनापति की तरह रहे, कहीं भावुक नहीं हुए, न ही अनिर्णयग्रस्थ हुए। लंका दहन के बाद जब वे सीता जी से मिले, वे चाहते तो सीता जी को उसी समय अपने साथ लेकर आ सकते थे। परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया, अपितु माँ को आश्वस्त किया और विरोध्यिों में भय पैदा कर दिया कि सीता को वापस जाना ही है।
सेवा की दृढ़ताभारतीय दर्शन में समर्पण व सेवाभाव को अत्यध्कि महत्व मिला है। यह भाव ही हमें लोकहित में निष्काम कर्म के लिए प्रेरित करता है। राम पंचायत में शुमार महाबली हनुमान अपने इन्हीं सदगुणों के कारण पूजे जाते हैं। उनके ऊपर आज भी जनमानस अध्कि से अध्कि विश्वास करता है। कहते हैं गोस्वामी तुलसीदास को हनुमान के द्वारा ही भगवान राम के दर्शन हुए थे। इसीलिये ‘राम से अध्कि राम के दास’ की उक्ति चरितार्थ हुई। इसके लिए भगवान श्रीराम स्वयं कहते हैं कि लोक पर विपत्ति आती है, तो वह मेरी अभ्यर्थना करता है, लेकिन मुझ पर कोई संकट आता है, तब मैं उसके निवारण के लिए पवनपुत्रा का स्मरण करता हूँ। आज भी ऐसे हनुमानों पर राष्ट्र को गर्व है। चिन्तन, चरित्रा, जीवनश्शैैली में विकृत होते समाज को पिफर हनुमान चाहिए।
युवाओं के प्रेरक
आज के युवा वर्ग को हनुमान की पूजा नहीं उनके आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करने की जरूरत है। देश हनुमानों को पुकार रहा है। पर हनुमान को जीवन में उतारने के लिए जिस संयम, चरित्रा, निष्ठा, सद्संकल्प, साहस, स्वावलम्बन, आत्मनिर्भरता, साध्ना, स्वाध्याय की जरूरत है, उससे हमें उससे अपने को जोड़ना होगा। काश देश पुनः हनुमान के चरित्रा को आत्मसात कर सकता, तो हनुमान महोत्सवोें में भी वास्तविक अमरता स्थापित होने लगती लगती।
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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