क्या है गणेश चतुर्थी महोत्सव की पौराणिक कथाएँ 

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क्या है गणेश चतुर्थी महोत्सव की पौराणिक कथाएँ 

गणेश चतुर्थी हिंदुओं का एक पारंपरिक और सांस्कृतिक त्यौहार है। यह भगवान गणेश की पूजा, आदर और सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। भगवान गणेश देवी पार्वती और भगवान शिव के प्यारे बेटे है। गणेश चतुर्थी त्यौहार के महापुरूष भगवान गणेश है। प्राचीन समय में, एक बार भगवान शिव हिमालय के पहाड़ों में अपनी समाधि के लिए चले गये। तब देवी पार्वती अकेली थी और उन्होंने कैलाश पर शिव की अनुपस्थिति में एक बलवान बेटे का निर्माण करने के बारे में सोचा। उन्होंने फैसला किया और भगवान गणेश को चंदन के लेप (स्नान लेने का इस्तेमाल किया गया था) के माध्यम से बनाया और फिर उस मूर्ति में जीवन डाल दिया। उन्होंने उस महान बेटे, गणेश के लिए एक कार्य दिया। उन्होंने गणेश से कहा कि, दरवाजे पर रहो और किसी को भी अन्दर प्रवेश करने की अनुमति नहीं देना तब तक मेरा आदेश न हो। वह यह कह कर बेटे के पहरे में अन्दर नहाने चली गयी।

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जल्द ही, भगवान शिव अपनी समाधि से वापस आये और कैलाश पर एक नये लड़के को देखा क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि गणेश उनके ही पुत्र है। शिव अन्दर जाने लगे तो गणेश ने उन्हें अन्दर जाने से रोका। उन्होंने कहा कि माता अन्दर नहा रहीं है और आप अन्दर तभी जा सकते है जब वे मुझे आदेश देंगी। भगवान शिव ने बहुत अनुरोध किया पर उनके बेटे ने उन्हें अनुमति नहीं दी। जल्द ही, सभी देवी देवताओं ने मिल कर गणेश से वैसा ही अनुरोध किया। उन्होंने गणेश को बताया कि भगवान शिव तुम्हारे पिता है, उन्हें अनुमति दे दो क्योंकि इन्हें तुम्हारी माता से मिलने का अधिकार है। किन्तु गणेश ने इंकार कर दिया और कहा मैं अपने पिता का आदर करता हूँ, पर मैं क्या कर सकता हूँ ? मुझे मेरी माता द्वारा कङा आदेश दिया गया कि दरबाजे से अन्दर आने वाले सभी को बाहर ही रोक देना।

यह सुनकर भगवान शिव बहुत क्रोधित हो गये, तब सभी देवी देवताओं ने उनसे वहाँ से जाने की प्रार्थना की और कहा की हमें एक और बार प्रयास करने दो। शिव के अनुयायियों (गणों, विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, नारद, सर्पों, आदि) ने बच्चे को शिष्टाचार सिखाना शुरू किया। इंद्र बहुत क्रोधित हो गया और उसने उस बच्चे पर अपनी पूरी शक्ति से हमला किया हालांकि गणेश बहुत ज्यादा शक्तिशाली थे क्योंकि वे शक्ति के अवतार के रूप में थे। गणेश ने सभी को हरा दिया। भगवान शिव दुबारा आये क्योंकि यह उनके सम्मान का मामला था। वह नाराज हो गये और अपने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया। जैसे ही माता पार्वती बाहर आयी, वह इस घटना को देखकर बहुत क्रोधित हुई। उन्होंने गणेश के सिर और शरीर को गोद में लेकर रोना शुरु कर दिया। उन्होंने कहा कि मुझे किसी भी कीमत पर अपना बच्चा वापस चाहिये अन्यथा मैं पूरे संसार को नष्ट कर दूँगी।

माता पार्वती के निर्णय से सभी देवी-देवता डर गये। उन्होंने भगवान शिव से कुछ करने की प्रार्थना की। शिव ने कहा कि अब पुनः इसी सिर को जोडना नामुमकिन है किन्तु किसी और के सिर को गणेश के शरीर पर जोडा जा सकता है। उन्होंने अपने अनुयायी गणों को सिर की खोज में भेज दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी ऐसे का सिर लेकर आओं जो उत्तर की दिशा की तरफ मुहँ करके और अपने बच्चे से विपरीत दिशा में सो रहा हो। शिव की बतायी गयी शर्तों के अनुसार गणों ने पूरे संसार में सिर खोजना शुरु कर दिया। अंत में, उन्हें बच्चे के विपरीत उत्तर दिशा में सोते हुये एक हाथी मिला। उन्होंने हाथी का सिर काट लिया और कैलाश पर के आये। भगवान शिव ने गणेश के शरीर पर वह सिर जोड़ दिया। इस तरह से गणेश को वापस अपना जीवन मिला। माता पार्वती ने कहा कि उनका बेटा एक हाथी की तरह लग रहा है, इसलिये सब उसका मजाक बनायेगें, कोई उसका आदर नहीं करेगा। फिर, भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, गणों और आदि सभी देवी देवताओं ने गणेश को आशीर्वाद, शक्तियों, अस्त्र- शस्त्र आदि बहुत से आशीर्वाद दिये। उन्होंने कहा कि कोई भी गणेश का मजाक नहीं बनायेगा इसके साथ ही गणेश सभी के द्वारा किसी भी नये काम को शुरु करने से पहले पूजा जायेगा। गणेश को हर किसी के द्वारा किसी भी पूजा में पहली प्राथमिकता दी जाएगी। जो लोग गणेश को सबसे पहले पूजेंगें वे वास्तव में ज्ञान और धन से धन्य होगें। माता लक्ष्मी ने कहा कि अब से गणेश मेरी गोद में बैठेगें और लोग ज्ञान और धन पाने के लिये मेरे साथ गणेश की पूजा करेगें।

भगवान शिव ने घोषणा कि यह लङका गणेश (गना+ईश अर्थात् गणों के भगवान) कहा जायेगा। इसलिये गणेश सब भगवानों के भगवान है। भगवान गणेश राक्षसों के लिये विघ्नकर्त्ता अर्थात् बाधा-निर्माता और अपने भक्तों और देवताओं के लिये विघ्नहर्त्ता अर्थात् बाधाओं को नष्ट करने वाले और उनकी कङी मेहनत के लिये आशीर्वाद देने वाले है।

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