आज स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि है। 118 साल पहले इसी दिन यानी 4 जुलाई 1902 को भारतीय चिंतन को समग्र विश्व में फैलाने वाले इस महापुरुष का निर्वाण हुआ था।
स्वामी विवेकानंद प्रेरणा के एक स्थायी स्त्रोत हैं। उन्होंने अपने विचारों से पूरी दुनिया को प्रभावित किया।
स्वयं अपने हाथों से सभी शिष्यों के पैर धोए। शिष्यों ने संकोच करते हुए स्वामीजी से पूछा, ‘ये क्या बात है?’ स्वामीजी ने कहा, ‘जीसस क्राइस्ट ने भी अपने हाथों से शिष्यों के पैर धोए थे।’ शिष्यों के मन में विचार गूंजा, ‘वह तो उनके जीवन का अंतिम दिन था।’
इसके बाद सभी ने भोजन किया। स्वामीजी ने थोड़ा विश्राम किया और दोपहर डेढ़ बजे सभी को हॉल में बुला लिया। तीन बजे तक संस्कृत ग्रंथ लघुसिद्धांत कौमुदी पर मनोरंजक शैली में स्वामीजी पाठ पढ़ाते रहे। खूब ठहाके लगे। व्याकरण जैसा नीरस विषय रसमय हो गया। शिष्यों को डेढ़ घंटे का समय जाते पता ही न चला।
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सायंकाल स्वामीजी अकेले आश्रम परिसर में घुम रहे थे। वे अपने आप से कह रहे थे, ‘विवेदानंद को समझने के लिए कोई अन्य विवेकानंद चाहिए। विवेकानंद ने कितना कार्य किया है यह जानने के लिए कोई विवेकानद ही होना चाहिए। चिंता की बात नहीं, आने वाले समय में इस देश के अंदर कई विवेकानंद अवतरित होंगे और भारत को ऊंचाइयों पर पहुंचाएंगे।’
संध्या होने के बाद स्वामीजी अपने कमरे में गए। खिड़कियां बंद कीं और ध्यान मुद्रा में बैठ गए। कुछ समय जप किया। बाद में खिलाड़ियां खोल दीं। बिस्तर पर लेट गए। और ओम का उच्चारण करते हुए इस दुनिया से विदा ली।
लगभग चालीस वर्ष की अल्पआयु में भारतीय चिंतन को समग्र विश्व में फैलाने वाले इस महापुरुष के जीवन का एक-एक क्षण आनंदपूर्ण, उल्लासमय और भारत के खोए वैभव को पूरी दुनिया में प्रचारित करने के लिए समर्पित रहा।
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