पाषाण युद्ध ऐतिहासिक खोलीखाड़ मैदान में खेला जाता है। यह स्थान उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में चंपावत जनपद के देवीधुरा में स्थित है। यहां पर लगने वाले मेले को बग्वाल मेला कहा जाता है। पाषाण युद्ध खेलने वाले लोगों को बग्वाल रणबांकुरे कहा जाता है। यह युद्ध चार खामों और सात थोक के लोगों के मध्य खेला जाता है।
इस युद्ध में कोई किसी का दुश्मन नहीं होता है, चारों खामों के बुजुर्ग और युवक सभी इस युद्ध में हिस्सा लेते हैं। यह युद्ध खेलने के लिए लोग दो हिस्सों में बंटे होते हैं, एक तरफ लमगड़िया व बालिग खामों के रणबांकुरे तो दूसरी तरफ गहड़वाल और चमियाल खाम के रणबांकुरे होते हैं।
रक्षाबंधन के दिन सुबह को ये सभी लोग तैयार होकर मंदिर परिसर में आते हैं, और देवी की आराधना की जाती है। फिर अछ्वुत बग्वाल (पाषाण युद्ध) आरंभ होता है। बाराही मंदिर में एक ओर मां की आराधना चलती रहती है तो वहीं दूसरी ओर यह युद्ध खेला जाता है। पूरी ताकत के साथ एक दूसरे पर पत्थर बरसाए जाते हैं। यह युद्ध तब तक चलता रहता है, जब तक की पुजारी जी आदेश नहीं देते और एक व्यक्ति के खून के बराबर खून नहीं बह जाता है।
कब से खेला जा रहा है यह युद्ध
ऐसा कहा जाता है कि देवीधूरा में बग्वाल (पाषाण युद्ध) का यह खेल पौराणिक काल से खेला जा रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि यह परंपरा कत्यूर शासन से चली आ रही है, इसे वे लोग पारंपरिक त्यौहार की तरह मनाते हैं। जबकि कुछ लोग इस खेल को काली कुमाऊं से जोड़कर भी देखते हैं। इस युद्ध को खेलने के लिए सभी अपनी माताओं से आशीर्वाद लेकर आते हैं।
कहा जाता है कि यह खेल खेलते समय कोई भी गंभीर रुप से घायल नहीं होता है लोगों को सिर और माथे पर छोटी मोटी चोंटे लगती है उनका प्राथमिक उपचार कर दिया जाता है। इस खेल के समाप्त होने पर सभी एक दूसरे को गले लगाते हैं। इससे जुड़ी एक पौराणिक कथा भी मिलती है कहा जाता है कि तभी से आराध्या देवी को मनाने के लिए यह खेल खेला जाता है। जानते हैं..
कथा के अनुसार पौराणिक काल में चार खामों के लोगों द्बारा अपनी आराध्या बाराही देवी को मनाने के लिए नर बलि देते थे। मां बाराही को प्रसन्न करने के लिए चारों खामों के लोगों में से हर वर्ष किसी एक की नर बलि दी जाती थी।
कहा जाता है कि एक बार चमियाल खाम की एक वृद्धा के परिवार में से नर बलि देने की बारी थी। लेकिन उस वृद्धा के परिवार में केवल वह और उसका पौत्र ही जीवित थे। माना जाता है कि अपने पौत्र की रक्षा के लिए उस वृद्धा स्त्री ने मां बाराही की स्तुति की। जिसके बाद माता बाराही ने वृद्धा को दर्शन दिए। देवी ने वृद्धा को मंदिर परिसर में चार खामों के बीच बग्वाल युद्ध खेलने के निर्देश दिए। उसके बाद से नर बलि की प्रथा बंद हो गई, कहा जाता है कि तभी से इस प्रथा की शुरुआत हुई।
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