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आज के युग में फैसले गुरु लेते हैं… या तालियाँ?

आज के युग में फैसले गुरु लेते हैं… या तालियाँ?

आज के युग में फैसले गुरु लेते हैं… या तालियाँ?
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आज के युग में फैसले गुरु लेते हैं… या तालियाँ?

आज के युग में फैसले गुरु लेते हैं… या तालियाँ?

आज का युग सूचना का युग है, लेकिन साथ ही यह प्रदर्शन और तालियों का युग भी बन चुका है। कभी समाज की दिशा गुरु, संत, शिक्षक और विचारक तय करते थे। उनके शब्द अनुभव, तप और विवेक से जन्म लेते थे। पर आज सवाल उठता है — क्या फैसले अब भी गुरु लेते हैं, या फिर तालियों की गूंज ही सत्य और दिशा तय करने लगी है?

गुरु का स्थान: मार्गदर्शक से मंच तक

परंपरागत रूप से गुरु का अर्थ था — अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला। गुरु शिष्य को वही नहीं सिखाता था जो लोकप्रिय हो, बल्कि वही बताता था जो सत्य हो। लेकिन आज गुरु भी कई बार मंच, कैमरा और ट्रेंड के दबाव में दिखते हैं।
जब गुरु का मूल्यांकन उसके ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके फॉलोअर्स, व्यूज़ और तालियों से होने लगे, तब मार्गदर्शन कमजोर पड़ने लगता है।

तालियों की ताकत और खतरा

तालियाँ अपने आप में बुरी नहीं हैं। वे प्रेरणा देती हैं, उत्साह बढ़ाती हैं। लेकिन जब तालियाँ ही निर्णय का पैमाना बन जाएँ, तब समस्या शुरू होती है।
आज सोशल मीडिया पर वही बात आगे बढ़ती है जो ज्यादा तालियाँ, लाइक्स और शेयर बटोरती है। चाहे वह अधूरी हो, भ्रामक हो या केवल भावनाओं को भड़काने वाली हो। इस भीड़ में शांत, गहन और सच्ची बात अक्सर दब जाती है।

भीड़ की स्वीकृति बनाम विवेक की आवाज़

गुरु का काम होता है विवेक जगाना, जबकि तालियाँ अक्सर भीड़ की मानसिकता को दर्शाती हैं। भीड़ जल्दी प्रभावित होती है, जल्दी उत्साहित होती है और उतनी ही जल्दी भूल भी जाती है।
विवेक समय लेता है, प्रश्न पूछता है और असुविधाजनक सच को भी स्वीकार करता है। आज के युग में समस्या यह नहीं कि गुरु नहीं हैं, बल्कि यह है कि हम गुरु की बात तभी सुनते हैं जब उस पर तालियाँ बज रही हों।

शिक्षा, धर्म और समाज में तालियों का प्रभाव

शिक्षा के क्षेत्र में भी अब कई बार गंभीर ज्ञान से ज्यादा मनोरंजन को महत्व दिया जाता है। धर्म में साधना से ज्यादा प्रदर्शन दिखने लगा है। समाज में नेतृत्व क्षमता से ज्यादा लोकप्रियता को तरजीह मिल रही है।
जब निर्णय तालियों से संचालित होते हैं, तब दीर्घकालिक भलाई की जगह तात्कालिक संतोष हावी हो जाता है।

गुरु भी इंसान हैं, लेकिन जिम्मेदारी बड़ी है

यह भी सच है कि गुरु भी इंसान हैं। वे भी समाज और समय के प्रभाव में आते हैं। लेकिन गुरु होने का अर्थ ही है — लोकप्रियता से ऊपर सत्य को रखना।
यदि गुरु तालियों के अनुसार बोलने लगें, तो वे शिष्य को नहीं, बल्कि भीड़ को संतुष्ट कर रहे होते हैं। और जब गुरु भीड़ का अनुसरण करने लगें, तो समाज दिशा नहीं, केवल शोर पाता है।

समाधान: सुनने वाले भी बदलें

इस प्रश्न का उत्तर केवल गुरु पर नहीं, श्रोता पर भी निर्भर करता है। हमें खुद से पूछना होगा —
क्या हम वही सुनना चाहते हैं जो अच्छा लगे, या वह भी सुनने को तैयार हैं जो हमें बदल दे?
जब तक श्रोता गहराई को महत्व नहीं देगा, तब तक तालियाँ फैसले लेती रहेंगी।

भविष्य की राह: संतुलन की आवश्यकता

समाधान यह नहीं कि तालियों को नकार दिया जाए या गुरु को आदर्श मान लिया जाए। समाधान है संतुलन।
तालियाँ प्रेरणा दें, लेकिन दिशा विवेक तय करे। गुरु मार्ग दिखाएँ, लेकिन शिष्य प्रश्न पूछना न छोड़े।
जब यह संतुलन बनेगा, तभी फैसले सच्चे अर्थों में समाज को आगे ले जा पाएँगे।

आज के युग में सवाल केवल यह नहीं है कि फैसले गुरु लेते हैं या तालियाँ, बल्कि यह है कि हम किसे निर्णय लेने का अधिकार दे रहे हैं।
यदि हमने यह अधिकार केवल शोर को दे दिया, तो शांति खो जाएगी। और यदि हमने विवेक को चुना, तो गुरु और शिष्य दोनों फिर से अपने वास्तविक स्थान पर लौट आएँगे।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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December 23, 2025 4 min read
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