बथुकम्मा उत्सव क्या है? क्यों होती है देवी गौरी की पूजा?
बथुकम्मा (Bathukamma) तेलंगाना राज्य का एक प्रसिद्ध और पारंपरिक फूलों का त्योहार है, जिसे मुख्य रूप से महिलाएँ बड़े हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाती हैं। यह त्योहार हर साल नवरात्रि से ठीक पहले, सितंबर-अक्टूबर के महीनों में नौ दिनों तक चलता है। तेलंगाना की संस्कृति और परंपराओं में बथुकम्मा का विशेष स्थान है, और इसे राज्य सरकार ने भी राज्य उत्सव (State Festival) का दर्जा दिया हुआ है।
‘बथुकम्मा’ शब्द तेलुगु भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है — बथुकु जिसका अर्थ है “जीवित रहना” और अम्मा जिसका अर्थ है “माँ”। इस प्रकार बथुकम्मा का अर्थ होता है — “जीवित रहो माँ।” यह नाम इस विश्वास को दर्शाता है कि माँ देवी सभी की रक्षा करें और सबको लंबी उम्र, सुख-समृद्धि तथा स्वास्थ्य प्रदान करें।
किस देवी की पूजा होती है?
बथुकम्मा उत्सव में मुख्य रूप से देवी गौरी (देवी पार्वती का एक रूप) की पूजा होती है। देवी गौरी को हिंदू धर्म में सौभाग्य, संतति, शक्ति और समृद्धि की देवी माना जाता है। तेलंगाना की महिलाएँ इस अवसर पर देवी से प्रार्थना करती हैं कि वे परिवार को खुशहाली, स्वास्थ्य, शांति और समृद्धि प्रदान करें। यह त्योहार विशेष रूप से महिलाओं का होता है, और इसमें नारी शक्ति का उत्सव मनाया जाता है।
बथुकम्मा कैसे मनाया जाता है?
इस त्योहार की सबसे खास बात होती है — फूलों से सजाई गई बथुकम्मा थाली। महिलाएँ और कन्याएँ मिलकर स्थानीय मौसमी फूल जैसे तंगेडु, बंथी, चकमका, गुनगुंटी, गुम्मडी आदि इकट्ठा करती हैं और उन्हें थाल में पिरामिड आकार में सजाती हैं। यह सजाई गई बथुकम्मा देवी गौरी का प्रतीक मानी जाती है।
इसके बाद महिलाएँ पारंपरिक रंगीन वस्त्र पहनकर, गीत गाते हुए, बथुकम्मा के चारों ओर घेरा बनाकर नृत्य करती हैं। इस अवसर पर गाए जाने वाले गीतों को ही “बथुकम्मा गीत” कहा जाता है, जो देवी की स्तुति, प्रकृति की महिमा और बहनचारे की भावना को प्रकट करते हैं।
यह उत्सव कुल नौ दिनों तक चलता है। अंतिम दिन को ‘सद्दुला बथुकम्मा’ कहा जाता है। इस दिन सभी महिलाएँ अपने-अपने घरों से बथुकम्मा लेकर निकलती हैं और उन्हें सामूहिक रूप से निकट के जलाशय या नदी में विसर्जित करती हैं। इसके बाद सामूहिक भोज और उत्सव मनाया जाता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
बथुकम्मा उत्सव को प्रकृति और फसल की देवी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का प्रतीक माना जाता है। यह त्योहार हमें यह सिखाता है कि प्रकृति का सम्मान करना और उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। साथ ही यह महिलाओं की सामूहिक शक्ति, बहनचारे, और सामाजिक एकता को भी प्रोत्साहित करता है।
यह त्योहार तेलंगाना की सांस्कृतिक पहचान और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बन चुका है। इस अवसर पर ग्रामीण और शहरी, सभी वर्गों की महिलाएँ मिलकर इसे मनाती हैं, जिससे समाज में एकता और सहयोग की भावना और भी मजबूत होती है।
बथुकम्मा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि महिला शक्ति, प्रकृति और सांस्कृतिक धरोहर का अद्भुत संगम है। देवी गौरी की पूजा के माध्यम से यह त्योहार हमें सिखाता है कि प्रकृति का सम्मान करें, महिलाओं का सम्मान करें और समाज में सामूहिकता बनाए रखें।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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