रोहिणी व्रत क्या है और इसे जैन धर्म में इतना पवित्र क्यों माना जाता है?
रोहिणी व्रत जैन धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे मुख्य रूप से महिलाएँ करती हैं। यह व्रत चंद्रमा के रोहिणी नक्षत्र में आता है और साल में बारह बार मनाया जाता है। जैन धर्म में यह व्रत विशेष रूप से पारिवारिक सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए किया जाता है।
व्रत की धार्मिक मान्यता
जैन ग्रंथों के अनुसार, रोहिणी व्रत का संबंध तीर्थंकर भगवान महावीर के उपदेशों से जुड़ा है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन में शांति, सौभाग्य और दीर्घायु प्राप्त होती है। महिलाएँ यह व्रत अपने पति की लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए करती हैं।
व्रत करने का समय और विधि
रोहिणी व्रत रोहिणी नक्षत्र के उदय होने से लेकर इसके अंत तक किया जाता है। प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनने के बाद महिलाएँ जिन मंदिर जाती हैं, भगवान महावीर या अन्य तीर्थंकर की पूजा करती हैं। इसके बाद व्रत की प्रतिज्ञा ली जाती है और पूरे दिन फलाहार या उपवास किया जाता है।
पौराणिक कथा
जैन परंपरा में एक कथा प्रचलित है कि प्राचीन काल में एक रानी ने रोहिणी व्रत करने से अपने पति के प्राण संकट से बचाए और राज्य में सुख-समृद्धि आई। इस कथा के कारण इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया।
व्रत का महत्व
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परिवार में सुख-शांति और एकता बनाए रखने के लिए
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पति की लंबी आयु और स्वास्थ्य के लिए
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संकटों और बाधाओं को दूर करने के लिए
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आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-शुद्धि के लिए
रोहिणी व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पारिवारिक जीवन में प्रेम, सम्मान और एकता को भी मजबूत करता है। जैन महिलाएँ इस व्रत को पूरे श्रद्धा और नियमों के साथ करती हैं, जिससे उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि आती है।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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