गौरी व्रत 2025: कन्याएं गौरी व्रत क्यों करती हैं?
गौरी व्रत एक अत्यंत पवित्र और श्रद्धा से भरा हुआ व्रत है, जिसे विशेष रूप से कुंवारी कन्याएं भगवान शिव और माँ पार्वती की कृपा पाने के लिए करती हैं। यह व्रत देवी पार्वती के उस रूप की आराधना है, जिसमें उन्होंने कठोर तप करके भगवान शिव को अपने पति रूप में प्राप्त किया था। यह व्रत कन्याओं को एक सुयोग्य, धर्मपरायण और समझदार जीवनसाथी प्राप्त हो, इसके लिए रखा जाता है।
गौरी व्रत 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त और समय
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व्रत प्रारंभ तिथि: 6 जुलाई 2025 (रविवार) — आषाढ़ शुक्ल एकादशी
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व्रत समापन तिथि: 10 जुलाई 2025 (गुरुवार) — गुरु पूर्णिमा
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व्रत अवधि: 5 दिन
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पूजा का श्रेष्ठ समय:
▸ प्रातः काल 6:00 AM से 8:30 AM (पार्वती पूजन हेतु सर्वोत्तम समय)
▸ संध्या आरती: सूर्यास्त के बाद 6:45 PM से 7:30 PM के बीच
गौरी व्रत का महत्व और पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माँ पार्वती ने हिमालय पर्वत पर कठोर तप किया था ताकि भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त कर सकें। उनके इस अविचल प्रेम और तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाया। गौरी व्रत उसी नारी संकल्प, श्रद्धा और साधना की प्रतीक परंपरा है।
ऐसा माना जाता है कि जो कन्याएं इस व्रत को नियमपूर्वक, पवित्रता और भक्ति के साथ करती हैं, उन्हें अपने जीवन में वैसा ही जीवनसाथी मिलता है — जैसा उन्होंने माँ गौरी से मन में माँगा होता है।
गौरी व्रत की विधि और पूजन सामग्री
गौरी व्रत में प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान कर के माँ पार्वती की पूजा की जाती है। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री होती है:
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हल्दी, कुंकुम, चावल (अक्षत)
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सुहाग सामग्री (लाल चूड़ी, बिंदी, सिंदूर आदि)
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पुष्पमाला, घी का दीपक, फल एवं मीठा भोग
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माँ गौरी की मूर्ति या चित्र
पूजन में “ॐ गौरीपतये नमः” या “ॐ उमायै नमः” मंत्र का जाप किया जाता है। पाँचों दिन भक्ति भाव से व्रत कथा सुनी जाती है जिसमें पार्वती जी की तपस्या, शिव विवाह और आशीर्वाद का वर्णन होता है।
गुजरात और अन्य राज्यों में उत्सव जैसा माहौल
गौरी व्रत विशेष रूप से गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में श्रद्धा से मनाया जाता है। कन्याएं पारंपरिक परिधान पहनकर समूहों में पूजा करती हैं, लोकगीत गाती हैं और सामूहिक कथाएँ सुनती हैं। कई मंदिरों में माँ गौरी की “डोली यात्रा” भी निकाली जाती है जो पूरे गांव या शहर का आशीर्वाद बन जाती है।
गौरी व्रत – केवल विवाह की नहीं, आत्मबल की साधना
यह व्रत केवल विवाह की कामना नहीं है, बल्कि यह कन्याओं को संयम, श्रद्धा और आत्मबल की ओर ले जाने वाली एक साधना है। पाँच दिन तक व्रत, संयमित आहार, नियमबद्ध दिनचर्या और ईश आराधना के माध्यम से कन्याओं को मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक शक्ति मिलती है। यह एक ऐसी परंपरा है जो नारी शक्ति के जागरण का प्रतीक बन चुकी है।
क्या आप भी माँ गौरी से आशीर्वाद लेने को तैयार हैं?
गौरी व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, यह एक नारी के श्रद्धा, विश्वास और धैर्य की परीक्षा भी है। माँ गौरी हर उस कन्या की प्रार्थना सुनती हैं जो सच्चे मन से उनका ध्यान करती है। अगर आप भी जीवन में एक समझदार, स्नेही और संस्कारी जीवनसाथी की कामना रखती हैं, तो इस व्रत के माध्यम से माँ गौरी की कृपा ज़रूर प्राप्त करें।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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