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नागों की उत्पत्ति: नाग वंश की शुरुआत कैसे हुई ?

नागों की उत्पत्ति: नाग वंश की शुरुआत कैसे हुई ?

नागों की उत्पत्ति: नाग वंश की शुरुआत कैसे हुई ?
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नागों की उत्पत्ति: नाग वंश की शुरुआत कैसे हुई ?

नागों की उत्पत्ति: नाग वंश की शुरुआत कैसे हुई ?

भारतीय संस्कृति में नाग केवल सर्प नहीं हैं – वे शक्ति, रहस्य और आस्था का प्रतीक हैं। नागों की कहानियाँ सिर्फ कथा नहीं, एक पूरा अध्यात्म हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि ये नाग आए कहां से? उनकी शुरुआत कैसे हुई?

इस प्रश्न का उत्तर हमें ले चलता है समय के उस विराट काल में, जब सृष्टि का आरंभ हुआ था और देवताओं के साथ-साथ अद्भुत जीवों का भी जन्म हो रहा था।

कश्यप ऋषि और कद्रू: नाग वंश की जड़ें

सृष्टि के आदि पुरुष ब्रह्मा के मानस पुत्र थे कश्यप ऋषि। वे अत्यंत तपस्वी और ज्ञानवान माने जाते हैं। उनकी कई पत्नियाँ थीं, जिनमें दो नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं – कद्रू और विनता।

कद्रू एक विशेष वरदान की इच्छुक थीं। उन्होंने पति कश्यप से कहा, “मैं चाहती हूँ कि मेरे गर्भ से हज़ार तेजस्वी, बलवान और अमर संतानें उत्पन्न हों।”
कश्यप ने उन्हें वरदान दिया, और समय आने पर कद्रू से हज़ार नाग पुत्रों का जन्म हुआ, जो नाग वंश के नाम से प्रसिद्ध हुए।

इन नागों का रूप अद्भुत था – उनके फन चमकते थे, नेत्र अग्नि जैसे दहकते थे, और उनका तेज देखते ही बनता था।

कौन-कौन थे प्रमुख नाग?

इन हज़ार नागों में से कुछ विशेष नाग आज भी हमारे धर्मग्रंथों में पूजे जाते हैं:

  • शेषनाग: यही वो दिव्य नाग हैं, जिनके फनों पर यह धरती टिकी हुई मानी जाती है। भगवान विष्णु इन्हीं की शय्या पर योगनिद्रा में रहते हैं।

  • वासुकी: समुद्र मंथन में देवताओं और दैत्यों ने वासुकी को रस्सी बनाया था। उन्होंने यह कार्य सहज भाव से स्वीकार किया।

  • तक्षक: ये वही नाग हैं जिन्होंने राजा परीक्षित को अपने विष से मृत्यु दी थी।

  • कालिया: जिन्होंने यमुना नदी को जहरीला कर दिया था, लेकिन श्रीकृष्ण ने इन्हें पराजित करके जीवनदान दिया।

इनके अलावा पद्म, अश्वतर, धृतराष्ट्र, और कम्बल जैसे नागों का भी उल्लेख मिलता है, जो अत्यंत शक्तिशाली और पूजनीय माने जाते हैं।

सर्प यज्ञ और नागों का संकट

महाभारत में एक मार्मिक प्रसंग आता है – राजा जनमेजय का सर्पसत्र
जनमेजय के पिता परीक्षित को तक्षक नाग ने डंसा था। पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने एक महायज्ञ का आयोजन किया, जिसमें पृथ्वी के सभी नागों को आहुति देने का निश्चय किया गया।

जब हज़ारों नाग यज्ञ में खिंचे चले आ रहे थे, तब महर्षि आस्तीक ने आगे बढ़कर यह यज्ञ रुकवाया।
उनकी बुद्धि और वाणी में इतना प्रभाव था कि जनमेजय ने यज्ञ रोक दिया। तभी से नाग जाति का संहार रुका और वे आज तक धरती पर जीवित हैं।

धर्म और श्रद्धा में नागों का स्थान

भारत में नाग केवल कथा के पात्र नहीं हैं — वे हमारे आराध्य भी हैं।

  • भगवान शिव के गले में लिपटा हुआ नाग उनकी तपस्या और नियंत्रण का प्रतीक है।

  • नागपंचमी के दिन देशभर में नाग देवता की पूजा होती है।

  • शेषनाग की मूर्तियाँ कई मंदिरों में मिलती हैं, जहाँ भक्त सिर झुकाते हैं।

नाग, केवल सर्प नहीं — हमारे संस्कार का हिस्सा

नागों की उत्पत्ति की यह कथा केवल एक पुरानी कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति की जड़ से जुड़ी हुई है।
ये नाग हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति में हर जीव की भूमिका है – चाहे वह देवता हो या नाग। उनका सम्मान, उनकी पूजा हमारे धार्मिक संतुलन का हिस्सा है।

इसलिए अगली बार जब आप किसी नाग की मूर्ति देखें या नागपंचमी का पर्व आए, तो केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि ज्ञान के साथ भी सिर झुकाएं – क्योंकि उनके पीछे छिपी है एक पुरानी, पवित्र और अद्भुत गाथा।

~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो

Editorial Review Note

Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. .

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June 11, 2025 3 min read
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