काठिया बाबा : महात्मा रामदास की गायत्री भक्ति
वृन्दावन में एक परमसिद्ध महात्मा थे। नाम तो उनका था – महात्मा रामदास, परंतु वे लकड़ी की लंगोट धारण करते थे। इसी कारण काठिया बाबा के नाम से ही प्रसिद्ध थे। काठिया बाबा ने अपनी साधना की सफलता का वर्णन इन शब्दों में किया है – “विद्या पाने के उपरांत मैं गुरु के पास से वापस अपने घर आया तब सर्वप्रथम मुझे गायत्री मंत्र सिद्ध करने की इच्छा हुई।”
हमारे बगीचे के पास एक बड़ा वट वृक्ष था उसी के नीचे शापोद्धार कवच आदि विधि विधान के साथ गायत्री मंत्र का जप, अनुष्ठान आरंभ किया। 75 हजार मंत्र जप कर चुकने पर आकाशवाणी हुई – बेटा! शेष जप ज्वालामुखी पर जाकर कर, तुझे सिद्धि मिलेगी। आकाशवाणी से स्वाभाविक ही मुझ में उल्लास उमड़ा।
आनंदित भाव से मैं ज्वालामुखी की ओर चला, साथ में मेरा समवय भतीजा था। हमारे यहाँ से ज्वालामुखी ३५-४० मील दूर है। मार्ग में एक तेजपुंज महात्मा मिले। उनके प्रति मेरे मन में आकर्षण हुआ और मैंने उनसे वैराग्य की दीक्षा ली। दीक्षा लेने से मेरे भर्तीजे ने मना किया, मैंने उसकी नहीं मानी।
तब वह लौटकर गाँव गया और पिताजी को ले आया। मुझे संन्यासी बने देख पिताजी दुखी हुए। वे मुझे पुनः संसारी बनने का आग्रह करने लगे। डराया भी, जब उनके सभी प्रयास निष्फल हो गये तब वे मेरे गुरुदेव से कहकर मुझे अपने गाँव ले गए। वहाँ वट-वृक्ष के नीचे मैंने आसन लगाया व साधना शुरू की।
रात्रि में आकाश-मंडल को भेदकर गायत्री देवी प्रकट हुई और बोली-वत्स ! मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ वर माँग। मैंने साष्टांग प्रणाम कर कहा-माँ! मैं तो वैराग्य ले चुका हूँ, अब कोई कामना नहीं। बस आप प्रसन्न रहें यही विनम्र प्रार्थना है। ‘एबमस्तु’ कहकर देवी अंतध्यान हो गई। गायत्री की सिद्धि प्राप्त कर लेने पर काठिया बाबा को और कुछ पाना बाकी न रहा। वे आप्तकाम हो गए, उन्हें दूर दृष्टि प्राप्त हो गई थी। वे कोई भी बात जान लेते थे, शिष्यों पर आये संकटों को दूर कर देते थे।
उनकी वाणी-सिद्धि विलक्षण थी। महापुरुष-संत की तरह स्वयं को छुपाने की यह शक्ति बाबा में अनुपम थी द्रव्य का अभाव उनके यहाँ कभी नहीं रहा। उनकी लकड़ी की लँगोटी को देखकर सब लोग आश्चर्य में डूब जाते थे।
सेवक लोग समझते थे कि बाबाजी ने सोने की मुहरें इकट्ठी की हैं, उन्हें छुपाने के लिए यह लकड़ी की लँगोटी बनवाई है। लोभ-लालच में पड़कर उनके सेवकों ने उन्हें तीन बार दो-दो तोला जहर दिया, तब भी उन पर विशेष असर इस विष का नहीं हुआ। तब लोगों ने उनकी शक्ति का अनुभव किया। उनका आत्मतेज प्रचण्ड था, उनके सामने पहुंचने वाला उनसे अभिभूत हो जाता था।।
-अखंड ज्योति पत्रिका अप्रैल, 1999
Editorial Review Note
Written by Religion World — Bhavya Srivastava is the founder of Religion World and a veteran journalist with over 18 years of experience across broadcast, print, and digital media. A founding member of the International Association of Religion Journalists (IARJ), he has spent much of his career reporting on and producing content about religion, faith, and spirituality. View full profile →.
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